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क्या सही, क्या गलत ?

क्या सही क्या गलत का फरक
जाने देखने वाले कि नजर
क्या बयान देती है ये हलक
करके साजिश जुबा से मिलकर
क्या सही क्या गलत क्या सही क्या गलत

बंद आँखों के कर के पटल
सख्त तालों से दिल को जकड़
पालता फिर रहा है भरम
जीत जाएगा कल सारा जग
है भरम, कर शरम, जा समझ, क्या सही.. क्या गलत..

झूठ ही झूठ है हर तरफ
सत्य खोजता है खुदको दर-बदर
रार कर, हार कर, खुदको गुमराह कर
चल पड़ा है उस डगर, जिसपे झूठ राहबर
क्या सही क्या गलत क्या सही क्या गलत

खुदसे से खुदको मारकर, खुद पे खुदको लादकर
सत्य की लाश में, झूठ के प्राण भर
प्राण के भार सह, जिंदा लाश बन कर
सब्र को बाँध कर, साँसों को साधकर
चल रहा हूँ किधर ना पता, क्या सही.. क्या गलत..

जिंदा लाश बन कर, लाश के प्राण बन
चल रहा राह पर, मर रहा राह पर
अब न कोई है डर, न ही कोई भरम
गलत भी सत्य है, सत्य भी है गलत
क्या सही क्या गलत क्या सही क्या गलत

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© Arvind Maurya

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माना क्यूँ ।

कहा था मैंने मान लिया मेरी गलती है।

पर तूने क्यों मान लिया तेरी गलती है।

क्यों न जानना चाहा तूने क्या सच्ची है।

मैने तुझसे बात जो यो ही कह रखी है।

बिना ज्ञान के बात मानना दोष है तेरा।

बिना जाँच के राह पे चलना खोट है तेरा।

तू जो चाहे दिल से मुझको बक सकता है।

खोटा सिक्का, झूठा कुछ भी कह सकता है।

पर जो मान्यता थी तेरी तुझपर यों हावी।

वही पड़ी है आज तेरे जीवन पर भारी।

जिसने कहा जो मान लिया,

सत्य का न पहचान किया।

सीधी खोपड़ी होने पर भी,

बुद्धि का अपमान किया।

खुदकी गिरेबां नही झाँकत,

मुझपर उँगली तान दिया।

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© Arvind Maurya

काली और रंगीली ।

रंग बिरंगी पेंसिले, आज भी मुझको याद है।
सतरंगी नोंको की रंगाई, का हर किस्सा याद है।

कोरे कागज पर वो सुंदर, रंग-बिरंगे चित्र बनाती।
कोरे कागज को रंग थक कर, दीवारों पर हुनर दिखाती।

दीवारों पर ज्यादा घिसती, पर उसमें रोमांच थी पाती।
पाकर बड़ा कैनवस पेंसिल, लटके-झटके खूब दिखाती।

अपने लटको झटको से, रंगीली काली को चिढ़ाती।
देखके उनके लटके झटके, काली की पीड़ा बढ़ जाती।

देखभाल न होने पर, इधर उधर वो लुढ़क थी जाती
मानो जैसे नशे में धुत हो, लोट रहा हो कोई शराबी।गिर गिर कर अंदर ही अंदर, टूट-टूट कर बिखर थी जाती।

जब भी उसको गढ़ने जाता, नोंक लुढक कर बाहर आती।
मैं ये माजरा समझ न पाती, काली पर थी खूबझल्लाती।

छील छील कर छोटा करके, कुछ दिन में ही फेंक बहाती
बेचारी काली दुखिया पर, अनजाने में जुल्म मैं ढाती।

बार बार ऐसा होता था, हर काली के साथ।
टूट टूट कर बिखर वो जाती, रंगीली के साथ।

मुझको भी दुख होता था, देखके उनका हाल।
पर मैं भी कुछ कर ना पाती, हाथ पे रखे हाथ।

जब रंगीली ख़तम हो जाती, घिसकर पूरा साफ।
तब काली को वापस मिलती, अपनी पुरानी मान।

तब काली की नोंक हो जाती, जैसे तेज कटार।
एक बार गढ़ने पर करती, हफ्ते भर तक काम।

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© Arvind Maurya

मर्यादा की जंजीर ।

मेरे दिल मे हलचल करती, हर धड़कन है आहे भरती।
जो लहू नसों में दौड़ रही, उबल उबल फफका करती।

यह जीवन है उपहार तेरा,जो प्राण को लज्जा से भरती
इस देह में कैसे प्राण रुके, यह सोच शरम से मैं मरती।

तू बना भेड़िया मैं हिरनी, तेरे भुजबल में थी शक्ति।
तिस पर तेरी कामाशक्ति, मैं तुझसे कैसे लड़ सकती।

अनुनय विनय से नही बात बनी, मैं तेरे आगे हार गई।
जीवन का थोड़ा मोह किया, तभी आज ये ग्लानि हुई।

परवाह नही करती जो मैं, उस धारदार हथियार का।
जिसको ग्रीवा पर रख तूने,वो कुत्सित अत्याचार किया

तो दिल मेरा खुद से खुदको, देता ना धिक्कार कामिनी
प्राण भले ही आज न होते,बन जाती एक और दामिनी

लोगसभी सम्मान से तकते,फ़ोटो पर तेरे हार भी रखते
हाथ में लेकर मोमबत्तियां, रात रात जगराते करते।

लेकिन तू अब भी जिंदा है, लगता है ना शर्मिंदा है।
तू अब भी कैसे हँस सकती,लगता ये इसका धंधा है।

सब लोग कसीदे पढ़ते है, जो मन मे आए कहते है।
मैं भी इन सब की आदी हो,इन सब को सुनती जाती हूँ

ऊपर से बुझती लगती हूँ,पर अंदर बहुत ही भभकी हूँ।
जो गलती थी अब उसकी सजा, बस पूरी होने को ही थी

तुम रांड मुझे कहते हो तो,लो रांड ही अब मैं बनती हूँ।
तुम पशुओ की आहुति का,अब हवन कुंड मैं रचती हूँ।

मेरे प्रतिशोध की ज्वाला में जल,भस्मिभूत हो जाओगे।
तब परिभाषा रणचंडी का,सपने में भी ना बिसराओगे।

मैं खुद भी इस ज्वाला में जल, भास्मिभूत हो जाऊंगी।
कल तक जो ताने कसते थे, उनकी देवी बन जाऊंगी।

जो ऐसा मैं कर पाई तो, मरकर भी मैं जी जाऊंगी।
जो इससे मैं विचलित हूँ तो, जिंदा लाश बन जाऊंगी।

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© Arvind Maurya

वो मंजर ।

हाथ के लिखें पर कोई काबू नही।
माथे की सिलवटे वापस जाती नही।
जो मंजर गुजर कर निकल जाता है।
वो घड़ी लौट कर फिर है आती नही।

वो हँसी, वो खुशी, माँ के गोद की लोरी।
वो परियाँ, वो बगियाँ, वो चाँदनी रतियाँ।
अब भूलकर कहीं भी नज़र आती नही।
जो मंजर गुजर कर निकल जाता है।
वो घड़ी लौट कर फिर है आती नही।

अब खंजर सभी मन मे धर कर फिरे।
दूजे को जज्ब करने की फिदरत भरे।
और मंजर कभी सामने वो दिखे।
तब याद आते है दिन जो रंगीन थे।
जब रंगों से सिकवे-गिले मिटते थे।

मंजर वैसा ही है, रंग भी लाल है।
रंगों से अबभी मिटते गिले-सिकवे है।
पर रंगीनी अब थोड़ी गाढी हुई।
लाल रंग का जगह है लहू ले गई।

लोगो की प्यास अब रोके रुकती नही।
धरती भी प्यास से अब तड़प है रही।
ये सब इंसानो की कारस्तानी ही है।
जो धरती का भी सारा जल पी गई।

वो लबा लब भरी, साफ सुथरी नदी
अब कहीं देखने को, है मिलती नही
वो जो मंजर गुजर कर निकल जाता है।
वो घड़ी लौट कर फिर है आती नहीं।

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© Arvind Maurya

अब सामना होगा

फटे हुए चीथड़ों में, जब कोई आता है।

पेट को दिखाकर के, हाथ को फैलाता है।

आँखो में उसके दिल का, हाल नज़र आता है।

मुझको अपने मानव, होने पे शर्म आता हैं।

मेरे उर में थोड़ा-सा, उधम-सा मच जाता हैं।

दिल ये सहम जाता है, दिल ये घबराता है।

क्या जवाब दूंगा मैं, कैसे ना कहूंगा मैं।

उसका भी खुदका भी, सामना करूँ कैसे।

तेरे हाल दिखता है, मैं न बता सकता हूँ।

कैसे कहूँ फटेहाल, तेरे जैसा मैं भी हूँ।

एक एक पैसे को, कैसे मैं तरसता हूँ।

बस ये सोच लाज है, छोटा परिवार है।

थोड़ा सम्मान है, उसी की ही आन है।

मैं न फटा दिखता हूँ, बाकी समान है।

चाहता हूँ भर दूँ पेट, तेरा अपना काटकर।

लेकिन दिल घबराता, कल का खयाल कर।

बीवी है बच्चे है, उनको मुहाल कर।

दान नही कर सकता, तेरे इस हाल पर।

नज़र ना मिलाऊँगा, झिड़कर भगाऊंगा।

आरोप थोपकर मैं, तुझको टाल जाऊँगा।

धंधा ये गंदा है, भीख और भिखारी का।

फोकट की लत है जड़, सारी बीमारी का।

इतनी बात कहकर तो, उसको टाल जाऊँगा।

पर खुद की नजरों में, खुद ही गिर जाऊंगा।

दिल थोड़ा घबराएगा, तरस भी तो आएगा

पर न हार मानूँगा, आज उसको टालूँगा।।

अभी मैं खोया था, अपने विचारों में।

तब तक वो पहुँच गया, चेतना के द्वारों पे।

उसने ज्यों ही दस्तक दी, दिल मेरा घबरा गया।

हाथो को जेबों की, छोर तक पहुँचा गया।

वहाँ खोजबीन करके, कुछ रुपये झाड़ गया।

फिर से कहानी को, वहीं पहुँचा गया।

नया मोड़ देने से, मन को बहका गया।

अब जो कल ये आएगा, झिड़ककर भगाऊंगा।

कल मैं कहानी का, रुख ही मोड़ जाऊंगा।

कल इसको निश्चय ही, झिड़ककर भगाऊंगा।

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© Arvind Maurya

शुक्रिया गुरुवर

शुक्रिया गुरुवर हमे गढ़ने की खातिर

शुक्रिया इस रूप को मढ़ने की खातिर

शुक्रिया मोती-मणि जड़ने की खातिर

शुक्रिया उस ज्ञान की बारिश की खातिर

शुक्रिया पशु को मनुज की मान खतिर

शुक्रिया गुरुवर हमे सहने की खातिर

शुक्रिया हर एक उस फटकार खातिर

शुक्रिया हर एक उस आघात खातिर

शुक्रिया प्रस्तर में इस बदलाव ख़ातिर

सड़क के पत्थर को गढ़, मंदिरों में लाने खातिर

नमन शत-शत बार गुरुवर।

नमन शत-शत बार गुरुवर।

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© Arvind Maurya