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फेंकासुर

रोका कलम को किसने,
ताक़त   नही  है  तुझमे,
कहता   है    बंदिशें   है,
जिसे  थोपी  तूने खुदपे।

धोका मिला  फलक पे,
गिर  जाऊंगा  गगन  से,
कहता  है  पंख नाजुक,
जिसे  नोंचा तूने खुदसे।

मेरे  काँपते   कदम  ये,
हिम्मत  नही  है  तुझमे,
कहता   है   भेड़ियाँ  है,
जिसे  पाला तूने खुदसे।

कोई तुझसे क्या चुराए,
ओ  कौड़ियो  के महँगे।
ले  दे  के  एक  कटोरा,
तू   माँगता  है  जिसमे।

कोई तुझसे क्या छुपाए,
दो   आँख   वाले   अँधे।
सब    सामने   है    तेरे,
फिर भी वहम है मन में।

कहता है मोती- माणिक,
जड़वाऊंगा    महल   में।
थोड़ा   ईंट   पत्थरो   से,
ज़रा  नीव  पहले  भर ले।

कहता  है  रौंद   दूँगा,
दुनिया कदम तले मै।
घुटनो से पहले उठके,
पंजो  पे ज़रा चल ले।

कामपंथी लिब्रांडू

तुम प्रश्न बड़े ही करते हो।
तुम खुद को ज्ञानी कहते हो।
क्यों गीत ये गाना ज़रूरी है?
क्या गान राष्ट्र की धुरी है?
क्या मुझको प्रेम नही माँ से?
क्या दर्शाना ये ज़रूरी है ?

अरे!………..
ये गान तेरे सम्मान में है,
हम लोगों की ही शान में है।
इन नदियों के आभार पे है,
इन वृक्षों की शीतल छाँव पे है।
कोई धरती माँ थोड़े ही है,
तू ही माँ भी है, तू ही बाप भी है।
तू इतनी बात न समझ सका,
किस बात का तुझको गुमान ये है।

क्यों, क्या, कब, कैसे, कहते हो,
तुम प्रश्न नए नित गढ़ते हो,
दूजों पर मढ़ते रहते हो,
भीतर से कुढ़ते रहते हो।
सम्मान तुम्हारा कहीं नहीं,
बस भौं भौं करते रहते हो।

अरे!…………..
एक समाधान बतला दो तुम,
एक राह जरा दिखला दो तुम।
क्षणभर में पंगू चंगा हो,
इस उपचार बता दो तुम।
मैं नतमस्तक ही जाऊंगा,
तुम्हे पुष्पहार पहनाऊंगा,
तब तेरे सारे प्रश्नों का,
अनुमोदन मैं कर जाऊंगा।

पर नशे में होकर धुत्त दुष्ट,
नव परिभाषाएं रचते हो।
वो समझ से मेरे परे रहीं,
तुम खुद भी कहां समझते हो।
दायित्व से होकर मुक्त दुष्ट,
अधिकार की आशा रखते हो।

जिस थाली में भोजन करते,
तुम छेद उसी में करते हो।
काले को उजला कहते हो,
उजले को काला कहते हो।
जब भी मुँह से कुछ बकते हो,
बस हाय रे तौबा कहते हो।

हथियार थमा कर बच्चों को,
तुम देश अस्थिर करते हो।
लाल सलामी दे देकर,
इस देश को छलनी करते हो।
रक्तपिपाशु  दानव  तुम,
मानवाधिकार पर लड़ते हो।

संविधान की रक्षा का तुम,
स्वांग खूब क्या रचते हो।
जला मशाले, लगा के नारे,
टुकड़े- टुकड़े कहते हो।
बाबा-बापू की ओट में छिप,
तुम वार उन्ही पर करते हो।

काँव काँव कू कू

इच्छओं  के  बीज  कहाँ  कभी  मरते है,
जो लड़ते है  सुखभोग वही तो करते हैं।
इच्छओं  के  दास  जो  बनकर  रहते  हैं,
भोग-भोग सुख, सुख से वंचित रहते हैं।

समय से लड़ कर सत्य राह जो चलते है,
समय को  करके बस  में राह वे गढ़ते हैं।
समय  देख  गदहे  को  बाप जो कहते है,
बिना  लड़े  ही  जग  को बस में करते हैं।

बस  अपनी  अपनी जो कर्तव्य फिरते है,
कुल  के  नाश  का कारण वे ही बनते हैं।
बस अपना गुण-दोष जो  परखा करते है,
कुल  के  भाग्य  विधाता  वे  ही  बनते हैं।

आँख  मूंदकर  कदमताल  जो  करते है,
खाकर  ठोकर  औंधे  मुँह  वे  गिरते  हैं।
आँख  खोलकर  दिवास्वपन जो रचते है,
सत्य के सम्मुख सिर पर हाथ पटकते हैं।

चाँद पे रखकर पैर जो उछला करते है,
धरती  पर  घुटनो  के बल वे चलते हैं।
घुटनो  पर  भी  जो टक्कर दे सकते है,
वही  निखरकर  चाँद  सितारे बनते हैं।

देख  तमाशा  ताल जो ठोंका करते है,
बने तमाशा आज वे खुद ही फिरते हैं।
देख  तमाशा फाँस  जो फेंका करते है,
बने   मदारी   नाच   नचाया  करते  है।

शेर  खाल  में  भेड़  राज जो करते है,
आफत सिर आते घिघियाने लगते हैं।
शेर  मगर  से  बैर  जो जल में करते है,
अगर मगर के बिना मृत्यु से मिलते हैं।

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© Arvind Maurya

निरखते लिखते

खुद को लिखते रहो, खुद से कहते रहो ।
कुछ तो लिखते रहो, कुछ तो कहते रहो ।

प्यार-तकरार  लैला   या   मजनू  पे हो
रात   काली अंधेरी   या   जुगनू   पे हो
रात  दिन  शाम  चढ़ती  दोपहरी  पे हो
बहती कल-कल नदी या उफनती पे हो
खुद को लिखते रहो, कुछ तो कहते रहो ।।

बन सिपाही कलम लेके लड़ते रहो
बिन डरे  धीर  धीरे  से  चलते  रहो
घुटनो पर ही सही, आगे बढ़ते रहो
नित  निरंतर  नए  दाँव  चलते रहो
खुद को लिखते रहो, कुछ तो कहते रहो ।।

धार कर वार कर  जख्म  करते रहो
भ्रष्ट लंका दहन  कर के  चलते बनो
इस लगन की अगन में यूँ जलते रहो
सुध  रहे  न  रहे   बोध   करते  चलो
खुद को लिखते रहो, कुछ तो कहते रहो ।।

रस  अलंकर  छंदो  को   चखते  रहो
बिन  विशेषण  के  भी रास रचते रहो
सब लुटा के भी अव्यय से दिखते रहो
कर्म  करके   क्रिया   में  निखरते  रहो
खुद को लिखते रहो, कुछ तो कहते रहो ।।

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© Arvind Maurya

भ्रमित भस्मित भूप

जो होगा देखा जाएगा, तो देखता ही रह जाएगा
पड़ शरण भाग्य के, भाल के बल झुक जाएगा
हर कोई तेरे ऐंड़ पे रखकर पैर तुझे दिखलाएगा
कर्म के हाथों आँसू तू , पोंछता ही रह जाएगा
बतलाएगा औकात, कि था तू क्या,तो क्या रह जाएगा
क्या क्या करने तू आया था,क्या क्या करके तू जाएगा
जो होगा देखा जाएगा, तो देखता ही रह जाएगा ।।

जो होगा देखा जाएगा, तो देखता ही रह जाएगा
तेरे अंदर का ये दम्भ, करेगा मंद, राख हो जाएगा
ये भ्रष्ट करे चैतन्य, दिखे ना स्पष्ट, यूहीं भिड़ जाएगा
खुद ही खुद से लड़-लड़ करके,लथपथ होकर गिर जाएगा
थककर डरकर मढ़कर सबपर, दोषमुक्त हो जाएगा
पैर की जूती सिर पर रखकर, भाग खड़ा हो जाएगा
जो होगा देखा जाएगा, तो देखता ही रह जाएगा ।।

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© Arvind Maurya

बेताज बहाना

बिना ज्ञान के कर्म किए जा, जाकर डूब कहीं पर मर जा ।
मार-काट और त्राहि कर्म तो, कर्म से अच्छा पंगू बन जा ।
परनाले में पानी प्रवाहित, पर उसमे जीवन न मिलता ।
सद् से ग़र सम्बन्ध न हो तो, कर्म भला किस काम का करना ।
कर्म किए जा और जिये जा, सद्कर्मो पर जोर दिए जा ।

हर आतंकी-चोर-लुटेरा, भाग्य के सिर पर फोड़ ठीकरा ।
तान के सीना या रो रोकर, कर्म को अपने उचित ही कहता ।
जीवन जी ले खुश हो करके, पर दूजों का ख़्याल भी करले ।
कर्म किये जा सोच न उसमे, पर सद् का मिश्रण भी करले ।
कर्म किए जा और जिये जा, सद्कर्मो पर जोर दिए जा ।

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© Arvind Maurya

चेतन चेतक

अभी तो रात बाकी है,
नई शुरुआत क्या करना ।
पुरानी जंग जारी है,
नई आगाज क्यों करना ।
पुराने घाव ताजे है,
नए अब जख्म मत सहना।
दया का भाव है उत्तम ,
किफ़ायत से खरच करना ।
लकड़बग्घों की घड़ियाली,
सिसकती आह से बचना ।
पड़े जो पाँव ढीले तो,
पुनः इतिहास तुम पढ़ना ।
गुरु गोविन्द राणा सा,
तेज परताप तुम रखना ।
गुरु अर्जुन माँ सीता सा,
धैर्य को बाँध कर रखना ।
कर्म करना, धर्म धरना,
भाग्य के हाथ मत पड़ना ।
न कोई लोभ न लालच,
न ज्यादा फल की हो चाहत ।
बस अपनी आन की ख़ातिर,
उसी पहचान की ख़ातिर,
सुबह तक जान से लड़ना ।
अंत तक शान से लड़ना ।
इसी मिट्टी से जीवन है।
इसी मिट्टी में है मरना ।

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© Arvind Maurya

रंग रंजन

रंग की जो बात करूँ,
तीन ही तो है प्रधान ।
हरित- नील- लाल वर्ण,
चराचर है विद्यमान ।

सारे दृश्य-दृष्टि- सृष्टि,
इनसे मिलके खिलें आज।
भाव- कर्म- ज्ञान के हर,
कृत्य के ये कर्मकार ।

हरिया को हरिहर कर,
हरिहर को हरिया कर।
हरि हरित उपवन में,
ऋतुओं की लड़ियाँ भर।

पतझड़ में सूखा कर,
बारिश में गीला कर।
मधुमाद आते ही,
पुष्प विविध बढियाँ भर।

सुरचाप अम्बर में,
दृश्य एक विहंगम भर।
पदचाप आँगन में,
नववधू के रुनझुन कर।

तृष्णा जो आँखों मे,
सजल तृप्त नदियाँ भर।
हिय के झंझावत में,
झपक नृत्य उड़िया कर।

जीवन की क्रीड़ा में,
रंगों से लीला कर ।
कृष्ण पीत अम्बर में,
इन्दर को गीला कर ।

हर एक जीवन में,
मृतप्राय कण- कण में,
श्याम कभी श्वेत कभी,
बेरंग रंगीला कर।

भर- भर रंग भर कर कर,
रंग- भंग कर कर कर।
कभी कभी फीका कर,
कभी चटक-तीखा कर।

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© Arvind Maurya

सज्जन का मन

खाए है इतने धोखे, मन ये हार गया है
खुद के कहे पे खुदको, न विश्वास रहा है
झूठा मैं बन गया हूँ, खुद की निगाह में
दिल भी नही है चलता, अपनी ही बात पे
वादे है सारे टूटे, सपने पड़े हैं फिके
कुछ खुद की रहनुमाई, कुछ गैर के करम से

जिस ओर नजर पड़ती, बस भेड़िये ही दिखते
आँख में भरके पानी, घड़ियाल से सिसकते
मौका जरा भी लगता, थोड़ा भी ना हिचकते
जबतक न जज़्ब करदे, तबतक नही बिखरते
हर एक कतरा आँसू, चख चख के हैं गटकते
फिर खोल को बदलकर, सुथरे बड़े ही दिखते

मेरे हश्र पे ये हँसकर, धीरे से तंज कसते
करनी करी जो तूने, फिर क्यों न ऐसे मरते
हाय राम ये दरिंदा, तौबा करम पे इसके
जिनके करम कुटिल हो, ऐसे ही मौत मरते
शैतान के कारिंदे, मुझको दरिंदा कहते
मेरे जनाज़े आकर, मन मन ही खूब हँसते
आँखों मे भरके पानी, घड़ियाल से सिसकते

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© Arvind Maurya

किताब की बात

किताबें बात करना चाहती है।
समझता क्या उन्हें इंसान समझना चाहती है
पढ़ाकर खुदको मनकी थाह लेना चाहती है
बिना आवाज के कुछ बात करना चाहती है
किताबें सब के दिल पर राज करना चाहती है

किताबें बात करना चाहती है।
प्यार में डूब कर भी तैरना वो चाहती है।
आँसू की मझधार में हँसना चाहती है।
बिना आधार के संसार रचना चाहती है।
बिना साँसों के भी वो प्राण भरना चाहती है।

किताबें बात करना चाहती है।
करे काबू किसे कैसे वो सबकुछ जानती है
राख से आग भड़काना है कैसे जानती है
भड़कती आग को काबू में लाना जानती है
खुदी से खुद को कैसे बांटना वो जानती है

किताबें बात करना चाहती है।
बिना रंगों के जीवन को वो रंगना जानती है
बिना आँखो के आगे देखना वो जानती है
बिना हथियार के ही वार करना जानती है
बिना स्याही के वो इतिहास लिखना जानती है

किताबे याद कराना चाहती है।
हमें इतिहास सुनाना चाहती है।
हमें भावी दिखाना चाहती है।
दिखाकर यह, बताकर सब
दो पाँवों के, पशु हम सब
का करना चाहे, कायाकल्प
किताबें बात कर कर कर।

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© Arvind Maurya