Tag Archives: Kavita Hindi

फेंकासुर

रोका कलम को किसने,
ताक़त   नही  है  तुझमे,
कहता   है    बंदिशें   है,
जिसे  थोपी  तूने खुदपे।

धोका मिला  फलक पे,
गिर  जाऊंगा  गगन  से,
कहता  है  पंख नाजुक,
जिसे  नोंचा तूने खुदसे।

मेरे  काँपते   कदम  ये,
हिम्मत  नही  है  तुझमे,
कहता   है   भेड़ियाँ  है,
जिसे  पाला तूने खुदसे।

कोई तुझसे क्या चुराए,
ओ  कौड़ियो  के महँगे।
ले  दे  के  एक  कटोरा,
तू   माँगता  है  जिसमे।

कोई तुझसे क्या छुपाए,
दो   आँख   वाले   अँधे।
सब    सामने   है    तेरे,
फिर भी वहम है मन में।

कहता है मोती- माणिक,
जड़वाऊंगा    महल   में।
थोड़ा   ईंट   पत्थरो   से,
ज़रा  नीव  पहले  भर ले।

कहता  है  रौंद   दूँगा,
दुनिया कदम तले मै।
घुटनो से पहले उठके,
पंजो  पे ज़रा चल ले।

उष्ट्रो कह दो उष्ट्रो उष्ट्रो

हम  दबा  दबा कर रह गए,
वे खोल खोलकर कह गए।
हम डाल पकड़ कर रह गए,
वे  पात- पात  पर  चढ़ गए।

हम खोद के कुआँ थम गए,
वे  बूँद- बूँद  हर  छक  गए।
हम अब- तब करते रहे गए,
वे ज्यों के त्यों सब कर गए।

हम  मर्यादा  में  बँध  गए,
वे खुला तमाशा कर गए।
हम  गाल  बढ़ाते  रह गए,
वे  थप्पड़  से मुँह रंग गए।

हम सच कहने से डर गए,
वे झूठ बोलकर अड़ गए।
हम  बाजू खोकर चुप रहे,
वे नख कटने पर लड़ गए।

हम  रण  में  गाँधी बन गए,
वे छल-बल से सब हर गए।
हम   राम  भरोसे  रह  गए,
वे  राम  नाम  सच कर गए।

हम  जाति-पात  में  बँट  गए,
वे दास बनाकर कर चल गए।
हम  तिलक  पोतते  रह  गए,
वे   लहू   से   धरती  रंग  गए।

हम मातृ शक्ति की पूजा में,
दिन  रात  निरंतर  रम गए।
वे बहू-बेटियों को नंगा कर,
हरम  खचाखच   भर  गए।

हम खुद ही मियाँ मिठ्ठू बन,
जयघोष  ही  करते  रहे गए।
वे काबुल और कंधार कराची,
बंग   भूमि   तक   बस   गए।

काँव काँव कू कू

इच्छओं  के  बीज  कहाँ  कभी  मरते है,
जो लड़ते है  सुखभोग वही तो करते हैं।
इच्छओं  के  दास  जो  बनकर  रहते  हैं,
भोग-भोग सुख, सुख से वंचित रहते हैं।

समय से लड़ कर सत्य राह जो चलते है,
समय को  करके बस  में राह वे गढ़ते हैं।
समय  देख  गदहे  को  बाप जो कहते है,
बिना  लड़े  ही  जग  को बस में करते हैं।

बस  अपनी  अपनी जो कर्तव्य फिरते है,
कुल  के  नाश  का कारण वे ही बनते हैं।
बस अपना गुण-दोष जो  परखा करते है,
कुल  के  भाग्य  विधाता  वे  ही  बनते हैं।

आँख  मूंदकर  कदमताल  जो  करते है,
खाकर  ठोकर  औंधे  मुँह  वे  गिरते  हैं।
आँख  खोलकर  दिवास्वपन जो रचते है,
सत्य के सम्मुख सिर पर हाथ पटकते हैं।

चाँद पे रखकर पैर जो उछला करते है,
धरती  पर  घुटनो  के बल वे चलते हैं।
घुटनो  पर  भी  जो टक्कर दे सकते है,
वही  निखरकर  चाँद  सितारे बनते हैं।

देख  तमाशा  ताल जो ठोंका करते है,
बने तमाशा आज वे खुद ही फिरते हैं।
देख  तमाशा फाँस  जो फेंका करते है,
बने   मदारी   नाच   नचाया  करते  है।

शेर  खाल  में  भेड़  राज जो करते है,
आफत सिर आते घिघियाने लगते हैं।
शेर  मगर  से  बैर  जो जल में करते है,
अगर मगर के बिना मृत्यु से मिलते हैं।

______________________________________

© Arvind Maurya

धुर धुरी

बिन आलोचना सम्मान में क्या रखा है।
बिन अपयश के यशगान में क्या रखा है।
बिन आँसू के चीत्कार में क्या रखा है।
बिन अठ्ठाहस उपहास में क्या रखा है।

बिन लगे भूख के पकवान में क्या रखा है।
बिन कड़वाहट सुस्वाद में क्या रखा है।
बिन साजन के श्रृंगार में क्या रखा है।
बिन रंगों के सुरचाप में क्या रखा है।

बिन ढले रात के प्रभात में क्या रखा है।
बिन तारो के आकाश में क्या रखा है
बिन लगे धूप के छाँव में क्या रखा है।
बिन पत्तो के बागान में क्या रखा है।

बिन माँ बाप के परिवार में क्या रखा है।
बिन अपराध के इंसाफ में क्या रखा है।
बिन हैवानियत इंसान में क्या रखा है।
बिन मर्यादा श्रीराम में क्या रखा है।

बिन सजे धार के तलवार में क्या रखा है।
बिन लहरों के पतवार में क्या रखा है।
बिन आघात के उपचार में क्या रखा है।
बिन चाहत के उत्साह में क्या रखा है।

______________________________________

© Arvind Maurya

निरखते लिखते

खुद को लिखते रहो, खुद से कहते रहो ।
कुछ तो लिखते रहो, कुछ तो कहते रहो ।

प्यार-तकरार  लैला   या   मजनू  पे हो
रात   काली अंधेरी   या   जुगनू   पे हो
रात  दिन  शाम  चढ़ती  दोपहरी  पे हो
बहती कल-कल नदी या उफनती पे हो
खुद को लिखते रहो, कुछ तो कहते रहो ।।

बन सिपाही कलम लेके लड़ते रहो
बिन डरे  धीर  धीरे  से  चलते  रहो
घुटनो पर ही सही, आगे बढ़ते रहो
नित  निरंतर  नए  दाँव  चलते रहो
खुद को लिखते रहो, कुछ तो कहते रहो ।।

धार कर वार कर  जख्म  करते रहो
भ्रष्ट लंका दहन  कर के  चलते बनो
इस लगन की अगन में यूँ जलते रहो
सुध  रहे  न  रहे   बोध   करते  चलो
खुद को लिखते रहो, कुछ तो कहते रहो ।।

रस  अलंकर  छंदो  को   चखते  रहो
बिन  विशेषण  के  भी रास रचते रहो
सब लुटा के भी अव्यय से दिखते रहो
कर्म  करके   क्रिया   में  निखरते  रहो
खुद को लिखते रहो, कुछ तो कहते रहो ।।

______________________________________

© Arvind Maurya

बेताज बहाना

बिना ज्ञान के कर्म किए जा, जाकर डूब कहीं पर मर जा ।
मार-काट और त्राहि कर्म तो, कर्म से अच्छा पंगू बन जा ।
परनाले में पानी प्रवाहित, पर उसमे जीवन न मिलता ।
सद् से ग़र सम्बन्ध न हो तो, कर्म भला किस काम का करना ।
कर्म किए जा और जिये जा, सद्कर्मो पर जोर दिए जा ।

हर आतंकी-चोर-लुटेरा, भाग्य के सिर पर फोड़ ठीकरा ।
तान के सीना या रो रोकर, कर्म को अपने उचित ही कहता ।
जीवन जी ले खुश हो करके, पर दूजों का ख़्याल भी करले ।
कर्म किये जा सोच न उसमे, पर सद् का मिश्रण भी करले ।
कर्म किए जा और जिये जा, सद्कर्मो पर जोर दिए जा ।

______________________________________

© Arvind Maurya

चेतन चेतक

अभी तो रात बाकी है,
नई शुरुआत क्या करना ।
पुरानी जंग जारी है,
नई आगाज क्यों करना ।
पुराने घाव ताजे है,
नए अब जख्म मत सहना।
दया का भाव है उत्तम ,
किफ़ायत से खरच करना ।
लकड़बग्घों की घड़ियाली,
सिसकती आह से बचना ।
पड़े जो पाँव ढीले तो,
पुनः इतिहास तुम पढ़ना ।
गुरु गोविन्द राणा सा,
तेज परताप तुम रखना ।
गुरु अर्जुन माँ सीता सा,
धैर्य को बाँध कर रखना ।
कर्म करना, धर्म धरना,
भाग्य के हाथ मत पड़ना ।
न कोई लोभ न लालच,
न ज्यादा फल की हो चाहत ।
बस अपनी आन की ख़ातिर,
उसी पहचान की ख़ातिर,
सुबह तक जान से लड़ना ।
अंत तक शान से लड़ना ।
इसी मिट्टी से जीवन है।
इसी मिट्टी में है मरना ।

______________________________________

© Arvind Maurya

फुर्सत की बात

तुमको इतनी भी फुर्सत नही मिल रही,
खुदसे खुदके लिए बात कुछ कर सके ।

हाथ मे हाथ गैरों के रख कर चले,
अपने हाथों से पूंछा क्या चाहत उसे ।
दिल लगाने की कोशिश में दर-दर फिरे,
खुदके दिल से क्या पूंछा वो चाहे किसे ।

पलकों पे कितनों को ही बिठाते चलें,
बेवजह टाँग हरदम अड़ाते चलें,
चलते चलते लगी एक ठोकर गिरें,
बंद आँखों को मुजरिम बनाने लगे ।

तुमको इतनी भी फुर्सत नही मिल रही,
खुदसे खुदके लिए बात कुछ कर सके ।

______________________________________

© Arvind Maurya

रंग रंजन

रंग की जो बात करूँ,
तीन ही तो है प्रधान ।
हरित- नील- लाल वर्ण,
चराचर है विद्यमान ।

सारे दृश्य-दृष्टि- सृष्टि,
इनसे मिलके खिलें आज।
भाव- कर्म- ज्ञान के हर,
कृत्य के ये कर्मकार ।

हरिया को हरिहर कर,
हरिहर को हरिया कर।
हरि हरित उपवन में,
ऋतुओं की लड़ियाँ भर।

पतझड़ में सूखा कर,
बारिश में गीला कर।
मधुमाद आते ही,
पुष्प विविध बढियाँ भर।

सुरचाप अम्बर में,
दृश्य एक विहंगम भर।
पदचाप आँगन में,
नववधू के रुनझुन कर।

तृष्णा जो आँखों मे,
सजल तृप्त नदियाँ भर।
हिय के झंझावत में,
झपक नृत्य उड़िया कर।

जीवन की क्रीड़ा में,
रंगों से लीला कर ।
कृष्ण पीत अम्बर में,
इन्दर को गीला कर ।

हर एक जीवन में,
मृतप्राय कण- कण में,
श्याम कभी श्वेत कभी,
बेरंग रंगीला कर।

भर- भर रंग भर कर कर,
रंग- भंग कर कर कर।
कभी कभी फीका कर,
कभी चटक-तीखा कर।

______________________________________

© Arvind Maurya

गिरता ज्वार

ऐ जिंदगी, तू ही बता, क्यों है खफ़ा, क्या की ख़ता,
आँखों मे क्यू, पानी भरा, यूँ ना सता, अब दे बता,
ज़ालिम जहां, सारा यहां, तू भी न कर, मुझको जुदा,
मेरी साँस को, तेरी आस है,मेरे दिल को उसकी,चाह है
ऐ जिंदगी, ऐ जिंदगी, ऐ जिंदगी, ऐ जिंदगी…

मेरी आह में, वो नाम है, पर जिंदगी गुमनाम है
मेरी आह को आवाज दे, ऐ जिंदगी तू साथ दे
मेरी अर्ज तू स्वीकार ले, मेरे जिस्म में थोड़ी जान दे
मनहूसियत को त्याग के, होंठो को तू मुस्कान दे
ऐ जिंदगी, ऐ जिंदगी, ऐ जिंदगी, ऐ जिंदगी…

जरा याद कर उस दौर को,जब हम मिले उस मोड़ पर,
तूने दिया झकझोर कर, एक लात माँ के कोख पर,
वो खुश थी तेरी चोट पर, मेरी सिसकियों की शोर पर,
खामोश कर ग़र् जाएगी, मेरी माँ दुखी हो जाएगी
ऐ जिंदगी, ऐ जिंदगी, ऐ जिंदगी, ऐ जिंदगी…

तू उसका कुछ तो ख्याल कर,ऐ जिंदगी मुझे माफ़ कर
मेरे हाथ को तू थाम कर, मेरे अक्स पर कुछ काम कर
कुछ रंग इसमे झोंक दे, थोड़ी प्राणवायु धौंक दे
तेरा दास मैं बन जाऊँगा, तेरे गुण सदा मैं गाऊँगा
ऐ जिंदगी, ऐ जिंदगी, ऐ जिंदगी, ऐ जिंदगी…

______________________________________

© Arvind Maurya