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उष्ट्रो कह दो उष्ट्रो उष्ट्रो

हम  दबा  दबा कर रह गए,
वे खोल खोलकर कह गए।
हम डाल पकड़ कर रह गए,
वे  पात- पात  पर  चढ़ गए।

हम खोद के कुआँ थम गए,
वे  बूँद- बूँद  हर  छक  गए।
हम अब- तब करते रहे गए,
वे ज्यों के त्यों सब कर गए।

हम  मर्यादा  में  बँध  गए,
वे खुला तमाशा कर गए।
हम  गाल  बढ़ाते  रह गए,
वे  थप्पड़  से मुँह रंग गए।

हम सच कहने से डर गए,
वे झूठ बोलकर अड़ गए।
हम  बाजू खोकर चुप रहे,
वे नख कटने पर लड़ गए।

हम  रण  में  गाँधी बन गए,
वे छल-बल से सब हर गए।
हम   राम  भरोसे  रह  गए,
वे  राम  नाम  सच कर गए।

हम  जाति-पात  में  बँट  गए,
वे दास बनाकर कर चल गए।
हम  तिलक  पोतते  रह  गए,
वे   लहू   से   धरती  रंग  गए।

हम मातृ शक्ति की पूजा में,
दिन  रात  निरंतर  रम गए।
वे बहू-बेटियों को नंगा कर,
हरम  खचाखच   भर  गए।

हम खुद ही मियाँ मिठ्ठू बन,
जयघोष  ही  करते  रहे गए।
वे काबुल और कंधार कराची,
बंग   भूमि   तक   बस   गए।

धुर धुरी

बिन आलोचना सम्मान में क्या रखा है।
बिन अपयश के यशगान में क्या रखा है।
बिन आँसू के चीत्कार में क्या रखा है।
बिन अठ्ठाहस उपहास में क्या रखा है।

बिन लगे भूख के पकवान में क्या रखा है।
बिन कड़वाहट सुस्वाद में क्या रखा है।
बिन साजन के श्रृंगार में क्या रखा है।
बिन रंगों के सुरचाप में क्या रखा है।

बिन ढले रात के प्रभात में क्या रखा है।
बिन तारो के आकाश में क्या रखा है
बिन लगे धूप के छाँव में क्या रखा है।
बिन पत्तो के बागान में क्या रखा है।

बिन माँ बाप के परिवार में क्या रखा है।
बिन अपराध के इंसाफ में क्या रखा है।
बिन हैवानियत इंसान में क्या रखा है।
बिन मर्यादा श्रीराम में क्या रखा है।

बिन सजे धार के तलवार में क्या रखा है।
बिन लहरों के पतवार में क्या रखा है।
बिन आघात के उपचार में क्या रखा है।
बिन चाहत के उत्साह में क्या रखा है।

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© Arvind Maurya

आ री सजनी

झम झम करके बरसे बदरा
बदरा बरसे झम झम कर के
झम झम झम झम बरसे बदरा
मिलै नाहिं कहिं ओट रे

छम छम करके बाजै पैजनियां
बाजै पैजनियां छम छम करके
छम छम छम छम बाजै पैजनियां
मनवा होवै विभोर रे
मिलै नाहिं कहिं ओट रे

थम थम पग धरि
पग धरि थम थम
थम थम थम थम पग पग धरि कर
सजनी चली मोरि ओर रे
मनवा होवै विभोर रे
मिलै नाहिं कहिं ओट रे

धक धक बढ़ि घटि
बढ़ी घटि धक धक
धक धक धक धक बढ़ि घटि धक धक
धड़कन करि रहि शोर रे
नाचै मन बनि मोर रे
मनवा होवै विभोर रे
मिलै नाहिं कहिं ओट रे

थर थर तन मन
तन मन थर थर
थर थर थर थर तन मन थर थर
काँप रहा हर पोर रे
तन पे नही कोई जोर रे
नाचै मन बनि मोर रे
मनवा होवै विभोर रे
मिलै नाहिं कहिं ओट रे

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© Arvind Maurya

सज्जन का मन

खाए है इतने धोखे, मन ये हार गया है
खुद के कहे पे खुदको, न विश्वास रहा है
झूठा मैं बन गया हूँ, खुद की निगाह में
दिल भी नही है चलता, अपनी ही बात पे
वादे है सारे टूटे, सपने पड़े हैं फिके
कुछ खुद की रहनुमाई, कुछ गैर के करम से

जिस ओर नजर पड़ती, बस भेड़िये ही दिखते
आँख में भरके पानी, घड़ियाल से सिसकते
मौका जरा भी लगता, थोड़ा भी ना हिचकते
जबतक न जज़्ब करदे, तबतक नही बिखरते
हर एक कतरा आँसू, चख चख के हैं गटकते
फिर खोल को बदलकर, सुथरे बड़े ही दिखते

मेरे हश्र पे ये हँसकर, धीरे से तंज कसते
करनी करी जो तूने, फिर क्यों न ऐसे मरते
हाय राम ये दरिंदा, तौबा करम पे इसके
जिनके करम कुटिल हो, ऐसे ही मौत मरते
शैतान के कारिंदे, मुझको दरिंदा कहते
मेरे जनाज़े आकर, मन मन ही खूब हँसते
आँखों मे भरके पानी, घड़ियाल से सिसकते

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© Arvind Maurya

धूल में बच्चा खड़ा है।

गरज रहा है बादल, जाने क्या पता, है आसमां ने की खता या डरा सहमा रो रहा है, खो रहा है मोतियों को ।
जो चुनी थी, सूर्य के संग, हवा से मिल।
उड़ रहा था जंगलो, गिरियों, पहाड़ो और समतल खेत बागानों के ऊपर।
दे रहा था छाँव धवला को धवल हो।
चर रही थी तिनके जो तपती दोपहरी।
खुशी से वो रेंकती थी, देख बादल को दुआएं दे रही थी।
डर रही है अब जो अपनी बाड़ में छिप आड़ में वो ताकती है जागती है फिर भी सपना मानती है।
रात की काली घटा को, जटा को लहरा रही जो, रो रही चिल्ला रही जो, सो रहे बच्चों के मन में, खौफ भरती जा रही।
आ रही बूंदे ज्यों छप्पर बेधती है, छेड़ती है राग मिलकर बर्तनों से, नर्तकों से थिरक पड़ते फेंकने को।
कोने में रक्खी हुई उस बाल्टी को, जो लबालब भर गया है, भर गया है, भर गया है, परे हट कितना बड़ा है, कितनों को भरना घड़ा है।
लगता है सूखा पड़ेगा,इससे ज्यादा क्या पड़ेगा,धूल में बच्चा खड़ा है,आँख में पानी भरा है।
बदरा, बालक, बाल्टी को-
आज क्यूं रोना पड़ा है ?
पानी क्यूं खोना पड़ा है ?
मोती क्यूं खोना पड़ा है ?

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© Arvind Maurya

महतारी

तू बड़ी ज़ालिम है, तू बड़ी जुल्मी है।

खुद की आहुति करके, तू नवजीवन रचती है।

हाँ तू ही कर सकती है, इतना सब सह सकती है।

पाती रहती है ज़ख्म कई, पर हँसती ही रहती है।

माँ तू ही कर सकती, खुद सूली चढ़ सकती है।

इतना सब सह सकती है, पर चूँ तक ना करती है।

तू सच मे ज़ालिम है, तू सच मे जुल्मी है।

मैं तेरा ही अंश जो ठहरी, कैसे बच सकती हूँ।

रीस-रीस कर जख्म तेरे, मुझे टीस से भरती है।

मैं हाथ पे धरकर हाथ, बात वो याद करती हूँ।

झुकाकर सिर दबा पलके, आँख से धार गिरती है।

भीगकर प्यार की बारिश में, मैं खुशहाल दिखती हूँ।

मैं तुझसे प्यार करती हूँ, पर न इजहार करती हूँ।

मैं तुझसे प्यार करती हूँ, मैं तुझको याद करती हूँ।

चाँद से दूर जानकर ही, चमक तारों की फबती है।

अमावस की ही रातों में , तू मुझसे बात करती है।

चमकती है दमकती है, निखरकर खूब दिखती है।

टिमक कर स्याह रातों का, तू यूं उपहास करती है।

तू बात करती है, मैं तुझको याद करती हूँ।

तू मेरी राह तकती थी, मैं तेरी राह तकती हूँ।

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© Arvind Maurya

क्या सही, क्या गलत ?

क्या सही क्या गलत का फरक
जाने देखने वाले कि नजर
क्या बयान देती है ये हलक
करके साजिश जुबा से मिलकर
क्या सही क्या गलत क्या सही क्या गलत

बंद आँखों के कर के पटल
सख्त तालों से दिल को जकड़
पालता फिर रहा है भरम
जीत जाएगा कल सारा जग
है भरम, कर शरम, जा समझ, क्या सही.. क्या गलत..

झूठ ही झूठ है हर तरफ
सत्य खोजता है खुदको दर-बदर
रार कर, हार कर, खुदको गुमराह कर
चल पड़ा है उस डगर, जिसपे झूठ राहबर
क्या सही क्या गलत क्या सही क्या गलत

खुदसे से खुदको मारकर, खुद पे खुदको लादकर
सत्य की लाश में, झूठ के प्राण भर
प्राण के भार सह, जिंदा लाश बन कर
सब्र को बाँध कर, साँसों को साधकर
चल रहा हूँ किधर ना पता, क्या सही.. क्या गलत..

जिंदा लाश बन कर, लाश के प्राण बन
चल रहा राह पर, मर रहा राह पर
अब न कोई है डर, न ही कोई भरम
गलत भी सत्य है, सत्य भी है गलत
क्या सही क्या गलत क्या सही क्या गलत

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© Arvind Maurya

दुष्चक्र

जब से जितेन ने यह नौकरी पकड़ी है तब से उसकी जिंदगी नरक सी बन गई है। आफिस से घर जाते वक्त जितेन अपनी नौकरी और जिंदगी के बारे में सोच रहा है- “सुबह से लेकर देर रात तक गदहे की तरह काम करो फिर भी जिंदगी तंगहाल हो तो ऐसा काम करने का क्या फायदा। बचपन मे पढ़ाई खेलना कूदना छोड़कर मेहनत से पढ़ाई लिखाई किया ताकि जवानी में मजे करेंगे भले ही बचपन थोड़ा फिका हो जाए तो क्या। ये दिन देखने के लिए थोड़े ही इतनी मेहनत की और आज भी कर रहे है। पहले सोचते थे पढ़ लिख लेंगे, नौकरी करेंगे, सम्मान मिलेगा। घंटा सम्मान मिल रहा है। सम्मान के नाम पर ऑफिस का चपरासी दिन भर में एक दो बार चाय पूछ जाता है। इसके अलावा जो खातिरदारी होती है वो तो बताने लायक भी नही है। अब मैं निश्चय करता हूँ कि ये नौकरी छोड़ दूँगा। ये ओहदा मेरे लिए बना ही नही है।

घर पहुंचते पहुंचते जितेन थक कर चूर हो जता है।घर पहुंचते ही सोफे के सामने पड़े मेज पर मोबाइल निकालकर फेंकता है और निढाल होकर धड़ाम से सोफे पर लेट जाता है। अब भी जितेन के चेहरे पर चिंता की लकीरें साफ झलक रहीं है। बालों पर हाथ फेरते हुए, एक गहरी साँस लेकर छोड़ता है और लेटे-लेटे ही पैर से पैर के जूते निकालने का प्रयास करता है। जूता निकालने के लिए वो थोड़ा संघर्ष करता है। क्योंकि जूता नही निकलता है, इसीलिए उसका चेहरा और तमतमा जाता है।

थोड़े संघर्ष के बाद एक पैर का जूता आधा निकलता है तो उसके चेहरे पर हल्की राहत भरी मुस्कान फैल जाती है, मानो कोई जंग जीत गया हो।ठीक उसी वक़्त मेज पर रखा उसका फ़ोन बज उठता है। फ़ोन मेज पर कंपन (वाइब्रेट) करते हुए जैसे ही बजता है, वैसे ही जितेन की मुस्कान सिकन में तब्दील हो जाती है।जितेन सोफे पर लेटे लेटे ही लापरवाही से फ़ोन उठाकर, “हेलो कौन है?” दूसरी तरफ से एक भारी आवाज उसकी बात बीच मे ही काट कर बोलती है – ” खामोश….मेरी बात ध्यान से सुनो। आज तुम्हारी किस्मत तुमसे भीख माँगने आई है और तुमको चुनना है कि तुम उसको कितना दे सकते हो।

जितेन का इतना सुनना था कि उसके कान खड़े हो गए। वो पलक झपकते ही उठ कर बैठ गया। वह ज्यों ही उठा उसका जूता जोकि आधा निकला था, जाकर एक फूलदान पर लगता है। फूलदान गिरकर टूकड़े टूकड़े हो जाता है।

वह ज्यों उठता है तो देखता है कि उसका मोबाइल मेज पर पड़ा हुआ बज रहा है और घड़ी में बारह बज रहे है। उसका दिमाग चकरा जाता है। वो घबरा जाता है कि उसके साथ ये क्या हो रहा है। वो तो अभी फ़ोन पर बात कर रहा था
होता यूं है कि वो जब काम से वापस आता है तो सोफे पर पड़ते ही जूते निकालते निकालते सो जाता है और ये बातचीत सपने में हो रही होती है और अब जाकर उसकी नींद खुली है।

वह ज्यों ही फ़ोन उठाता है तो दूसरी तरफ से वही भारी आवाज फिरसे बोलना शुरू करती है जो सपने में उससे बात कर रही होती है- “मेरे सवाल का अगर तुमने सही जवाब दिया तो तुम्हारी जिंदगी बदल जाएगी।” इतना सुनना था कि जितेन के होश उड़ गए। क्योंकि पिछले एक हफ्ते से उसको यह व्यक्ति रोज रात के बारह बजे फोन कर रहा है।

जितेन चिढ़ते हुए गुस्से में बोलता है – ” भाई मैं एक हफ्ते से तुम्हारे सवालों के जवाब दे रहा हूँ। तुम जो सवाल पूछ रहे हो वो तो किसी स्कूल में भी नही पढ़ाया जाता है। तुम कौन हो? तुम्हारा उद्देश्य क्या है?

तुम पूछते हो- “हाथी और कुत्ते की लड़ाई में कौन जीतेगा?” मैं कहता हूँ भाई हाथी का लड़ना समझ में आता है लेकिन कुत्ता वो लड़ाई क्यों लड़ेगा जो उसके लिए जितना असंभव हो। और वैसे भी इनकी कोई जातीय दुश्मनी तो है नहीं।
तुम पूछते हो- “ऊँट पर बैठे इंसान को कुत्ता कैसे कटेगा?” अरे भाई! दाँत से कटेगा वो तलवारबाजी थोड़ी जानता है।
तुम पूछते हो – “कुत्ता हड्डी क्यों चबाता है?” अरे भाई ! कुत्ता हड्डी नही चबाता है। वो हड्डी से घिसकर अपने दाँत तेज करता है, जिससे अगर तुम्हारे जैसा कोई कुत्ता उसका दिमाग चबाना चाहे तो उसको सबक सिखाए।
यह बताओ तुमको कुत्तो में इतनी रूचि क्यों है?

दूसरी तरफ से वही भारी आवाज और भी गंभीरता से आई – “शाँत…… आज तुम्हारे लिए ये मेरा आखिरी सवाल है। अगर इसका सही जवाब दिया तो तुम्हारी भाग्यरेखा चमक उठेगी। क्या तुम तैयार हो?” जितेन अनमने मन से अपनी स्वीकृति स्वरूप लंबा सा हाँ….. बोल देता है।

दूसरे तरफ से आवाज आती है; तो ध्यान से सुनो – “मान लो अगर किसी कुत्ते को पर (पंख) लग जाए तो क्या करना चाहिए? उसकी पूँछ काट देनी चाहिए या गले मे पट्टा डाल देना चाहिए।”

ज्यों ही जितेन सवाल सुनता है; उसका चेहरा तमतमा जाता है। जितेन चीख पड़ता है- “कुत्ता ! कुत्ता ! कुत्ता ! अब मै इसका जवाब नही दूँगा। अब तुम बताओ; कुत्ता कुत्ते की मौत क्यों मरता है? इंसान कुत्ते की औलाद कैसे हो सकती है? तुम इंसान के रूप में कुत्तेश्वर हो क्या? क्या तुम कुत्ते की तरह…..

दूसरी तरफ की आवाज जितेन की आवाज बीच मे ही काटकर और भारी आवाज में बोलती है- शाँत……

उसकी आवाज सुनकर जितेन अपने आप को संभालते हुए और अपने को सामान्य करते हुए बोलता है – ” भाई मैं हिंसा में विश्वास नही रखता, इसीलिए कुत्ते की पूंछ काटने की बजाए मैं उसको पट्टा पहनना चाहूंगा।” जवाब देने के बाद जितेन फिर से अपना संतुलन खोते हुए चीखकर बोला – ” हाँ भाई! खोल दिया मेरी किस्मत का ताला, बना दिया मुझे बादशाह। इन बेकार सवालो का कोई मतबल भी है?”

दूसरी तरफ से आवाज आई – आज तुमने कुत्ते के गले मे पट्टा पहनाया है। कल तुम्हारे गले मे भी पट्टा पहनाया जाएगा” जितेन जवाब सुनकर अवाक रह गया। इसके बाद टूँ टूँ करके फ़ोन कट गया।

मेज पर पड़ी डिजिटल घड़ी में सुबह के 10 बज रहे है। जितेन सोफे पर सो रहा है। खिड़की से छनकर आ रही सूरज की तेज धूप से जितेन पसीने से तर-बतर हो गया है। करवट बदलते ही वो धड़ाम से नीचे गिर पड़ता है। उसकी नींद टूट जाती है। वो आँखे मींचते हुए उठता है और अपने चारों तरफ देखता है। उसके दोनों पैरों में जूते हैं। फूलदान भी एकदम ठीक ठाक है। वो सिर पकड़ कर बैठ जाता है और बड़बड़ाता है- “आज फिर से वही बुरा सपना।” तभी मेज पर पड़े मोबाइल की घंटी फिर से बज उठती है।

मोबाइल पर बॉस का नंबर फ़्लैश हो रहा है। बॉस का नंबर देखते ही जितेन एकदम सतर्क हो जाता है। उसकी सारी निद्रा और आलस्य उड़न छू हो जाती है।जितेन फ़ोन उठाकर अपने बॉस का अभिवादन करता है। उधर से उसके बॉस का जवाब आता है – ” जितेन! तुम्हारे मेहनत और प्रगति (परफॉरमेंस) को देखते हुए मैनेजमेंट ने तुम्हे पट्टा पहनाने…. ओह सॉरी, प्रमोट करने का निर्णय लिया है।
जितेन स्तब्ध होकर शून्य में देखता रह जाता है।

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© Arvind Maurya

माना क्यूँ ।

कहा था मैंने मान लिया मेरी गलती है।

पर तूने क्यों मान लिया तेरी गलती है।

क्यों न जानना चाहा तूने क्या सच्ची है।

मैने तुझसे बात जो यो ही कह रखी है।

बिना ज्ञान के बात मानना दोष है तेरा।

बिना जाँच के राह पे चलना खोट है तेरा।

तू जो चाहे दिल से मुझको बक सकता है।

खोटा सिक्का, झूठा कुछ भी कह सकता है।

पर जो मान्यता थी तेरी तुझपर यों हावी।

वही पड़ी है आज तेरे जीवन पर भारी।

जिसने कहा जो मान लिया,

सत्य का न पहचान किया।

सीधी खोपड़ी होने पर भी,

बुद्धि का अपमान किया।

खुदकी गिरेबां नही झाँकत,

मुझपर उँगली तान दिया।

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© Arvind Maurya

काली और रंगीली ।

रंग बिरंगी पेंसिले, आज भी मुझको याद है।
सतरंगी नोंको की रंगाई, का हर किस्सा याद है।

कोरे कागज पर वो सुंदर, रंग-बिरंगे चित्र बनाती।
कोरे कागज को रंग थक कर, दीवारों पर हुनर दिखाती।

दीवारों पर ज्यादा घिसती, पर उसमें रोमांच थी पाती।
पाकर बड़ा कैनवस पेंसिल, लटके-झटके खूब दिखाती।

अपने लटको झटको से, रंगीली काली को चिढ़ाती।
देखके उनके लटके झटके, काली की पीड़ा बढ़ जाती।

देखभाल न होने पर, इधर उधर वो लुढ़क थी जाती
मानो जैसे नशे में धुत हो, लोट रहा हो कोई शराबी।गिर गिर कर अंदर ही अंदर, टूट-टूट कर बिखर थी जाती।

जब भी उसको गढ़ने जाता, नोंक लुढक कर बाहर आती।
मैं ये माजरा समझ न पाती, काली पर थी खूबझल्लाती।

छील छील कर छोटा करके, कुछ दिन में ही फेंक बहाती
बेचारी काली दुखिया पर, अनजाने में जुल्म मैं ढाती।

बार बार ऐसा होता था, हर काली के साथ।
टूट टूट कर बिखर वो जाती, रंगीली के साथ।

मुझको भी दुख होता था, देखके उनका हाल।
पर मैं भी कुछ कर ना पाती, हाथ पे रखे हाथ।

जब रंगीली ख़तम हो जाती, घिसकर पूरा साफ।
तब काली को वापस मिलती, अपनी पुरानी मान।

तब काली की नोंक हो जाती, जैसे तेज कटार।
एक बार गढ़ने पर करती, हफ्ते भर तक काम।

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© Arvind Maurya