Tag Archives: कविता

आ री सजनी

झम झम करके बरसे बदरा
बदरा बरसे झम झम कर के
झम झम झम झम बरसे बदरा
मिलै नाहिं कहिं ओट रे

छम छम करके बाजै पैजनियां
बाजै पैजनियां छम छम करके
छम छम छम छम बाजै पैजनियां
मनवा होवै विभोर रे
मिलै नाहिं कहिं ओट रे

थम थम पग धरि
पग धरि थम थम
थम थम थम थम पग पग धरि कर
सजनी चली मोरि ओर रे
मनवा होवै विभोर रे
मिलै नाहिं कहिं ओट रे

धक धक बढ़ि घटि
बढ़ी घटि धक धक
धक धक धक धक बढ़ि घटि धक धक
धड़कन करि रहि शोर रे
नाचै मन बनि मोर रे
मनवा होवै विभोर रे
मिलै नाहिं कहिं ओट रे

थर थर तन मन
तन मन थर थर
थर थर थर थर तन मन थर थर
काँप रहा हर पोर रे
तन पे नही कोई जोर रे
नाचै मन बनि मोर रे
मनवा होवै विभोर रे
मिलै नाहिं कहिं ओट रे

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© Arvind Maurya

सज्जन का मन

खाए है इतने धोखे, मन ये हार गया है
खुद के कहे पे खुदको, न विश्वास रहा है
झूठा मैं बन गया हूँ, खुद की निगाह में
दिल भी नही है चलता, अपनी ही बात पे
वादे है सारे टूटे, सपने पड़े हैं फिके
कुछ खुद की रहनुमाई, कुछ गैर के करम से

जिस ओर नजर पड़ती, बस भेड़िये ही दिखते
आँख में भरके पानी, घड़ियाल से सिसकते
मौका जरा भी लगता, थोड़ा भी ना हिचकते
जबतक न जज़्ब करदे, तबतक नही बिखरते
हर एक कतरा आँसू, चख चख के हैं गटकते
फिर खोल को बदलकर, सुथरे बड़े ही दिखते

मेरे हश्र पे ये हँसकर, धीरे से तंज कसते
करनी करी जो तूने, फिर क्यों न ऐसे मरते
हाय राम ये दरिंदा, तौबा करम पे इसके
जिनके करम कुटिल हो, ऐसे ही मौत मरते
शैतान के कारिंदे, मुझको दरिंदा कहते
मेरे जनाज़े आकर, मन मन ही खूब हँसते
आँखों मे भरके पानी, घड़ियाल से सिसकते

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© Arvind Maurya

भूला अलबेला

रजस भोग की शुभ बेला में,
तमस ने क्योंकर घेरा है ।
मतिभ्रम से निर्णय मुश्किल,
क्या करना और क्या त्यजना हैं ।
जिजीविषा अब भूल रही,
सम्बन्ध क्या तन और मन का है ।
इस काया का अब क्या होगा,
जब तमस ने इसको घेरा है।
उड़ने को उन्मुक्त गगन में,
प्राण ने भी मुँह फेरा है।।

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© Arvind Maurya

सेठ की ऐंठ

तेरी लाठी मेरी भैंस, तेरी धौंस तो तेरी ही भैंस।
मुझ अंधे की लाठी हैं भैंस,इसके अलावे कोई न टेक
मेरी गइया मेरा बैल, इनको भी लो साथ लपेट।
गइया को है भैंस से प्रेम, भैंस करे है मुझसे प्रेम।
बैल करे है सबसे प्रेम, सो मुझको है उससे प्रेंम।
तोड़ो ना परिवार ए सेठ, मुझको भी लो साथ लपेट।
मैं खाऊंगा आधा पेट ,इनका खाना हो भरपेट।
बस इतनी दरख्वास्त थी सेठ, तेरी लाठी तेरी भैंस।
🤗🤗🤗

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© Arvind Maurya

कतार

कतार में इंसान है।
कातर होता प्राण है।
टिकट की दरकार है।
पर ज्यादा न आसार है।
इस सर्पिल लाइन में,
विष भरा अपार है।
दाएँ-बाएँ हर तरफ से,
उठ रही फुफकार है।
बड़े बड़े नेवले भी,
आकर मांगे छाँव है।
आदर्श लोकतंत्र,
यहाँ बरकरार है।
कुछ में उत्साह है।
कुछ का बुरा हाल है
समय का अभाव है।
सबका यही भाव है।

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© Arvind Maurya

किताब की बात

किताबें बात करना चाहती है।
समझता क्या उन्हें इंसान समझना चाहती है
पढ़ाकर खुदको मनकी थाह लेना चाहती है
बिना आवाज के कुछ बात करना चाहती है
किताबें सब के दिल पर राज करना चाहती है

किताबें बात करना चाहती है।
प्यार में डूब कर भी तैरना वो चाहती है।
आँसू की मझधार में हँसना चाहती है।
बिना आधार के संसार रचना चाहती है।
बिना साँसों के भी वो प्राण भरना चाहती है।

किताबें बात करना चाहती है।
करे काबू किसे कैसे वो सबकुछ जानती है
राख से आग भड़काना है कैसे जानती है
भड़कती आग को काबू में लाना जानती है
खुदी से खुद को कैसे बांटना वो जानती है

किताबें बात करना चाहती है।
बिना रंगों के जीवन को वो रंगना जानती है
बिना आँखो के आगे देखना वो जानती है
बिना हथियार के ही वार करना जानती है
बिना स्याही के वो इतिहास लिखना जानती है

किताबे याद कराना चाहती है।
हमें इतिहास सुनाना चाहती है।
हमें भावी दिखाना चाहती है।
दिखाकर यह, बताकर सब
दो पाँवों के, पशु हम सब
का करना चाहे, कायाकल्प
किताबें बात कर कर कर।

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© Arvind Maurya

बक सुकूँ

बड़ा सुकूँ मिलता है
जब हर कोई बक-बक बाते करता है।

चुप रहने से
मन मोटा होता है
जब कोई भी कुछ कहने से बचता है।

चुप रहना, कुछ भी ना कहना
बिना कहे सब कुछ है कहता।
बाते करना, बक-बक करना
कहकर भी कुछ ना कह सकना
बातों का यह खेल अजब-सा
समझे विरले ही कब-कब क्या
कितना, किसको, कैसे कहना
या फिर जीभ को रोके रखना

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© Arvind Maurya