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कैसे हो- वो बच्चा- हम जैसा-

किसी मनुष्य का जन्म उसकी जननी और उसके परिजनों के जीवन के सबसे बड़े दिनों में से एक होता हैं। सामाजिक और आर्थिक कारणों तथा प्रथाओं के मद्देनजर, बालिका अथवा बालक पैदा होने की स्थिति में खुशी का स्तर अलग अलग होता है। शिशु के जन्म के समय की खुशी और खुशी को मनाने के के स्तर से ही उसके भविष्य के बारे में काफी कुछ अनुमान लगाया जा सकता है। ज्यादा दूर के भविष्य को तो नही पर निकट भविष्य को काफी हद तक अनुमानित किया जा सकता है। किसी के दूर के भविष्य पर भी उसके प्रारंभिक जीवन का असर काफी गहरा होता है इसीलिए ये कहा जा सकता है कि उत्तरवर्ती जीवन काल को भी कुछ हद अनुमानित किया जा सकता है।

यहाँ पर यह बात ध्यान दिलाने योग्य है कि जीवन से मतलब उसके आर्थिक पहलू से कम और सामाजिक पहलू से ज्यादा है और उससे भी महत्वपूर्ण उसके व्यक्तिगत व्यक्तित्व और नैतिक पहलू से है।

शिशु के जन्म से 1 वर्ष तक उसके लालन पालन का बड़ी सतर्कता और लगन के साथ ध्यान दिया जाता है। इस दौरान परिवार के कुछ वयस्को की बाल सुलभ प्रवृतियां पुनः उद्दीप्त हो जाती है और कई लोगों का तोतलापन शिशु की वाक् चेस्टा को भी पीछे छोड़ देता है। इसके साथ साथ बालक के अति सामान्य बोध को विकसित करने का प्रयास भी शुरू हो जाता है, जोकि समाजीकरण से पूर्व की प्रक्रिया होती है, जिसे परिवारीकरण कहना गलत नही होगा। शिशु को इस प्रक्रिया का बोध चेतन रूप से शून्य होता है पर अचेतन रूप में वो बहुत कुछ ग्रहण कर रहा होता है। इस समय शिशु जो कुछ भी ग्रहण कर रहा होता है वो उसके जीवन के उत्तर काल के निर्णय निर्धारण को निर्धारित करते है क्योंकि इसी समय शिशु को अचेतन रूप से बोध होना प्रारम्भ हो जाता है कि उसे क्या करना चाहिए और क्या नहीं।

निर्णय निर्धारण ऐसी प्रक्रिया है जिसमे एक व्यक्ति प्रस्तुत परिस्थिति में दिए गए या उपलब्ध विकल्पों में से सबसे उत्तम का चुनाव करने का प्रयास करता है। निर्णय निर्धारण मूल रूप से अचेतन मस्तिष्क की जिम्मेदारी होती है, जिसमे व्यक्ति एक वरीयता क्रम में कम जरूरी तथा ज्यादा जरूरी विकल्पों को स्थान देता है। एक व्यक्ति के लिए क्या जरूरी और क्या गैरजरूरी है ये इस बात पर निर्भर करता है कि किस तरह से उसका लालन पालन और समाजीकरण हुआ है और किन किन चीजों को उसके समाज और परिवार ने उसके लिए नाजिर के रूप में प्रस्तुत करते हुए महत्वपूर्ण बताया। इस तरह शैशवास्था से किशोरावस्था तक आते उनकी अपनी खुद की एक पूर्णरूपेण स्वतंत्र निर्णय निर्धारण प्रणाली विकसित हो जाती है।

1 वर्ष के पश्चात शिशु का सामना धीरे-धीरे कुछ नई-नई और ज्यादा वृहद परिस्थितियों से होता है। अब शिशु को चतुष्पदी से द्विपदी करने का अभ्यास प्रारम्भ हो जाता है। इस अभ्यास के दौरान कुछ द्विपदी स्वयं चतुष्पदी बन जाते है। यह समय परिवार के बड़े बुजर्गो के लिए बड़ा ही रोचक होता है। नवजीवन का चीजो को देखने, सुनने, बोलने, समझने, की उत्सुकता उसकी बड़ी-बड़ी आँखों मे झलकता है, जिसे देखकर सभी अपने-अपने थोथे ज्ञान से नवजीवन को अभिसिंचित करने को उत्सुक हो जाते है। इस तरह शिशु का सामना जीवन के पहले शारीरिक और मानसिक अभ्यास से होता हैं जोकि अब जीवनपर्यन्त चलने ही वाला है।

1 वर्ष से 4-5 वर्ष तक सुनने, बोलने, चलने, समझने का अभ्यास कराया जाता है पर इस अभ्यास की कठोरता समय के साथ साथ तीव्र होती जाती है। माता पिता को लगता है कि जीवन संघर्ष में आगे बढ़ने के लिए एक शिशु को अपने समकक्ष से आगे रहना चाहिए। इस जीवन संघर्ष की दौड़ को जीतने और जिताने का इच्छा ही इस अभ्यास की तीव्रता और कठोरता को निर्धारित करती है।

बालक को कहा पता होता है कि वो फर्राटा नही मैराथन दौड़ में भाग ले रहा है जिसका कोई अंत नही है। काफी लंबे समय तक बालक को इस भ्रम में रखा जाता है कि आगे दिखने वाली रेखा को पार करते ही दौड़ समाप्त हो जाएगी और अगर दम बांध कर दौड़ गए तो जीत तुम्हारे कदमो में होगी। पर जैसे ही वो सामने वाली रेखा को पर करता है तो उसे बताया जाता है कि ये नही इसके आगे वाली रेखा, विजय रेखा है। उस रेखा को पार करते ही एक नई रेखा को विजय रेखा बताया जाता है और इस तरह से इस भ्रम का क्रम काफी लंबा चलता है। कुछ समय बाद उसे पता चल जाता है कि इस दौड़ का कोई अंत नही, न ही इसकी कोई विजय रेखा है। लेकिन ये भ्रम उसके अंदर वहम का रूप ले चुका होता है इसलिए वो दौड़ता ही रहता है कि शायद अगली रेखा विजय रेखा हो जहाँ पर उसके इस जीवन को पूर्ण विश्राम मिले। पर हम सबको पता है कि उसका विश्राम स्थल उसकी शव शैय्या ही है जिसकी तरफ वो अंधाधुंध दौड़ा जा रहा है। भ्रम को एकबारगी तथ्यों की सहायता से तोड़ा जा सकता है पर वहम को तोड़ने के लिए कोई भी तर्क और तथ्य नाकाफी है।

4 या 5 वर्ष का होने के बाद बालक अथवा बालिका की औपचारिक शिक्षा प्रारम्भ होती है; जोकि किसी विद्यालय में नामांकन कराके किया जाता है। अन्य बालको और शिक्षकों की सोहबत में अब बालक का समाजीकरण एक चरणबद्ध तरीके से प्रारंभ हो जाता है। नए नए हमजोली बनने का क्रम शुरू होता है, जिनका अचार-विचार-वय-व्यवहार-उत्साह-ललक-समझ काफी मिलती जुलती है। इन सब के बीच विद्यालय में बालक अपनी तारतम्यता एवं समन्वय का अभ्यास उन परिस्थितियों में करना सीखता है जहाँ पर उसकी इच्छा-अनिच्छा को दरकिनार कर सभी पर एक समान नियम लागू होते है। इस तरह अलग अलग परिवारों और अलग अलग पारिवारिक माहौल से आए बच्चे आपस से विचार-व्यवहार का आदान-प्रदान करके अपने अपने विशिष्ट व्यक्तित्व के शिल्पकार खुद बनने लगते है। ये प्रक्रिया 4/5 से 12/14 वर्ष की उम्र तक चलती रहती है और जैसे जैसे किशोरावस्था बच्चे के जीवन मे दस्तक देना शुरू करती है वैसे वैसे उसके अंदर ही अंदर पक रहा व्यक्तित्व भी बाहर आने के लिए दस्तक देना शुरू कर देता है।

12-18 वर्ष के बीच का समय बालक के उस नव उन्मादी व्यक्तित्व का होता है जिसका विकास 5-12 वर्ष के बीच होता है। इस दौरान वो अपने अलग विचारो और मान्यताओं को बिना किसी लाग-लपेट के व्यक्त करना शुरू कर देता है। माता पिता को लगता है कि बालक का ये व्यवहारिक परिवर्तन यकायक हुए जैविक परिवर्तनों के कारण हुआ है, परंतु वास्तविकता तो कुछ और होती है। इसलिए माता पिता लगता है कि बच्चो में उत्पन्न इन नई विद्रोही प्रवृतियों का दमन जितनी जल्दी कर दिया जाए उतना ही अच्छा है। इस क्रम में माता पिता कठोरता से पेश आना शुरू कर देते है औए जाने अनजाने में अपने ही बच्चो के दुश्मन बन जाते है। ऐसी स्थिति का सामना उन माता पिता को करना पड़ता है जो शुरू में तो अपने बच्चो की बाल प्रवृतियों का निरक्षण कर उनको समन्वयित और मार्गदर्शित नही करते है। माता पिता अपने बच्चो का पालन पोषण किस तरह करते है, इसका सीधा संबंध उनके खुद के पालन पोषण से होता है। दूसरे तरह के माता पिता जो शुरू से ही अपने बच्चो में नैतिकता का पुट भरते रहते है और सही गलत में भेद करने की शिक्षा देते रहते है, उन्हें इस दौरान ज्यादा चिंतित नही होना पड़ता है।

अब तक माता पिता ने बच्चो के साथ क्या किया, कैसे किया, इन सब बातों से चिंतित होने का कोई फायदा तो नही है। इसीलिए अब इन सब से इतर माता पिता कोे बहुत ही सावधानी से बच्चो की मनोस्थिति और व्यहवार पर बारीकी से निरीक्षण कर उनको सही और गलत में अंतर करने की क्षमता विकसित करने में मार्गदर्शन करें। इस करने पर निःसंदेह काफी सुधार की गुंजाइश रहेगी और कुछ समय पश्चात वो खुद से ही सही और गलत में भेद करना सीख जाएगा और ज़रूरी और गैरज़रूरी चीजो को प्राथमिकता के आधार पर महत्व देना शुरू कर देगा जोकि दोनो के लिए अच्छा ही होगा।

18 वर्ष के पश्चात तो घड़ा पक कर रंगा जा चुका होता है। अब इसने जो रूप,रंग,आकर धारण कर लिया होता है, उसमे ज्यादा फेरबदल की गुंजाइस नही होती है। अब इसपर ही कई अलग अलग तरह के डिज़ाइन बनाए जा सकते है। इसी तरह युवावस्था तक आते आते बच्चो में मूलभूत व्यवहारिक और नैतिक गुण ठोस रूप लेकर काफी हद तक स्थिर हो जाते है अर्थात उनके व्यक्तित्व का अभिन्न अंग हो जाते है, जिसमे ज्यादा फेरबदल की गुंजाइश नही होती है।

आज एक समाज के रूप में हम उन्नत हो रहे है। उन्नति का अर्थ है सकारात्मक बदलाव जो जीवन को उच्च से उच्चतर की ओर उन्मुख करे पर हम अपने बच्चो को अगर उन्ही पुराने ढर्रे पर चलने के लिए मजबूर करेंगे तो ये एक तनातनी बनकर रह जाएगी जिसमें किसी का लाभ नही होगा। इसका मतलब ये कतई नही है कि अपने बच्चो को मनमानी करने दे बल्कि हमे चाहिए कि बच्चो को जीवन का ज्ञान दे और हम ऐसा तभी कर पाएंगे जब हम खुद जीवन के नैसर्गिक रूप को समझेंगे, जोकि सभी के लिए सर्वोत्तम होगा। बच्चे पालना कोई एक दिन का खेल नही है बल्कि एक माता पिता को एक अच्छा बच्चा समाज को देने के लिए पूरी तन्मयता से अपने जीवन के कम से कम 18 साल कुर्बान करने के लिए तैयार रहना होगा।

किसी त्रुटि के लिए क्षमा करें।

धन्यवाद।

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© Arvind Maurya

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