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सार्वजनिक संपत्ति के प्रति विमुखता क्यों ?

धन-संपत्ति, प्रतिष्ठा किसे प्रिय नही होती है। लेकिन धन संपत्ति और प्रतिष्ठा का मजा तब ही है जब इनपर आधिकार हो या इनके प्रति अपनत्व का भाव हो। दूसरों की संपत्ति और समृद्धि से लोगो मे ईर्ष्या पैदा होती है। अगर संपत्ति आप के दुश्मन की हो तो पूछना ही क्या। ऐसी संपत्ति को लोग फूटी आँखो देखना पसंद नही करते और मौका मिलते है उसको नुकसान पहुँचाना तो एक सहज मानवीय प्रवृत्ति है, जिसे मानव अपने उत्पत्ति के समय से ही अर्जित करते आ रहा है जोकि उसे अपने आप को जीवन संघर्ष में बनाए रखने के लिए ज़रूरी था।

ये कोई नई बात नही है। यह सर्वविदित है कि शक्तिशाली ही सदैव से शासक रहा है और शोषक का पर्यायवाची रहा है। लेकिन बहुत कम लोग को संज्ञानात्मक रूप से इस बात का ज्ञान होता है कि शासित सदैव से कमजोर रहा है और शोषित का पर्यायवाची रहा है।

इस तरह से अचेतन रूप से हम सब को पता होता है कि शक्तिशाली ही शासक और शोषक होता है जबकि कमजोर शासित और शोषित होता है। इसी वजह से शक्तिशाली समूह अपना प्रभुत्व कायम रखने के लिए दूसरे कमजोर समूहों को दबाते है। ठीक उसी तरह कमजोर वर्ग शक्तिशाली समूह को किसी तरह से नीचे लाना चाहता है ताकि वो उनपर हावी ना हो सके। कहीं न कहीं इन्ही सब के बीच में ही भारत मे सार्वजनिक संपत्ति के प्रति लोगो की लापरवाही का कारण भी छुपा हुआ है।

शक्ति के प्रतीक और मानदंड समय के साथ साथ बदलते रहते है। पूर्व में बाहुबल, धार्मिक सत्ता, ज्ञान आदि शक्ति के प्रतीक और मानदंड थे, परंतु वर्तमान में धन-संपदा ही शक्ति के प्रतीक और मानदंड के रूप में स्थापित है, क्योंकि आज के युग मे कुछ भी प्राप्त किया सकता है।

आप को लग रहा होगा कि इन सब बातों का लोगो के सार्वजनिक संपत्ति के प्रति लापरवाही और विमुखता से क्या संबंध हैं। लेकिन मैं आप को आश्वस्त करना चाहूँगा कि समस्या की जड़ यहीं से शुरू होती है। अब मैं पुनः विषय पर लौटता हूँ।

सार्वजनिक सम्पत्ती से आशय उन साधनों से है जिसका उपभोग सभी जनमानस बिना किसी भेदभाव के समान रूप से करते है और सार्वजनिक संपत्ति का निर्माण आमजनों के धन-सहयोग से ही होता है।

अन्य विकसित देशों की तुलना में भारत मे सार्वजनिक सार्वजनिक संपत्तियों के प्रति विमुखता और लापरवाही का स्तर ज्यादा है। इसके बहुत से सामाजिक, आर्थिक, नैतिक, व्यावहारिक, कारण है, जिन्हें हम वर्तमान में देख पाते है लेकिन इसकी वास्तविक जड़ें साम्राज्यवादी शासन के दौर से जुड़ी हुई है। ब्रिटिश शासन के दो सौ वर्षों के शासन के दौरान, सत्ता और सरकार शोषण का पर्यायवाची बन चुका था। ब्रिटिशो के दमनकारी और तथाकथित लोकतांत्रिक शासन के दौरान भारतीय जनमानस पर सरकार की जो छवि बनी कमोबेश आज भी वैसे ही है। जिस तरह पूर्व में सरकार को जनता का शोषक माना जाता था वैसे ही वर्तमान में लोकतांत्रिक सरकारों को जनता का अर्थ चूषक ही माना जाता है।आजादी के 70 साल बाद भी भारतीय शासक वर्ग और सरकारें अपने लोगो के मन-मस्तिष्क से सरकार की पुरानी छवि नही उतार पाई

सरकार की छवि धूमिल होने की नींव, आजादी मिलने के कुछ वर्ष पूर्व ही पड़नी शुरू हो गई थी। हुआ यूं कि हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने लोगो के सामने आजादी का जो स्वरूप प्रस्तुत किया था वो भिन्न-भिन्न था। आजादी को लोगो ने रामराज्य के रूप में अपने मन-मस्तिष्क में प्रतिष्ठित किया था। लेकिन आजादी जो विभत्स रूप धारण करके आई, उसने लोगो के अंतर्मन पर बहुत आघात किया। आजादी के बाद जिस तरह के राष्ट्रीय चेतना का विकास होना चाहिए था वो नही हो पाया, क्योंकि देश का एक तबका इस आजादी से शायद खुद को जोड़ नही पा रहा था। कुछ अन्य वर्ग भी थे जो आजादी के इस स्वरूप से संतुष्ट नही थे। इस नई बनी देशी सरकार और सत्ता को अंग्रेजो का स्थानापन्न मात्र माना गया और छिटपुट विरोध और विद्रोह के स्वर भी उठे। आगामी वर्षो में असफल होती सरकारी नीतियों और और लगभग उसी तरह की सरकारी कार्यशैली ने लोगो के इस विश्वास को और पुख्ता किया।

कुल मिलाकर जनता खुद को सरकार से नही जोड़ पाई या फिर यों कहें कि सरकार जनता को खुद से जोड़ पाने में असफल रही। इस भेद के कारण ही जनता और सरकार के बीच की दूरी बढ़ती रही और परिणामस्वरूप सरकार को जनता से एकदम अलग-थलग माना जाने लगा।

इसी बीच लोगो ने एक बहुत ही विकट अवधारणा बनानी शुरू कर दी कि राष्ट्र निर्माण का सारा दायित्व केवल सरकार का है। लोगो का मानना था कि यदि ब्रिटिश सरकार हमारी सारी परेशानियों का कारण हो सकती है तो हमारी खुद की बनाई सरकार इन सब परेशानियों का निवारण क्यों नही हो सकती है। यह अवधारणा बहुत ही घातक सिद्ध हुई। इस तरह से जो लोग सरकार में विश्वास रखते थे और जो सरकार लोग सरकार में में विश्वास नही रखते थे; दोनो ही सरकार से दूर होते चले गए।

लोगो को पता होना चाहिए कि सृजन में सालो साल लग जाते है और विध्वंस में छण भर भी नही लगता। आजादी के बाद राष्ट्र सृजन के पथ पर चल रहा था, जिसमे सभी के सहयोग और समय की आवश्यकता थी। जनसहयोग के पहलू को जब सरकार ने ही नज़रअंदाज कर दिया तो जनता से क्या आशा की जा सकती थी। विकास के औद्योगिक मॉडल का चुनाव उस समय की एक बहुत बड़ी भूल थी। जब लोग भूखे मर रहे हो, धनोपार्जन के लिए कोई साधन न हो, जनता बेकारी का शिकार हो उस समय इंसानो पर मशीनों को तहरीज देना सभी दृष्टिकोणों से गलत था।

इस तरह सरकार और जनता; दोनो ने ही अपने दायित्वों न ही समझा और जिन दायित्वों का भान था, उसका भी सही तरीके से निर्वाह नही कर पाए। दायित्वों के उचित निर्धारण और निष्पादन के आभाव में लक्ष्य और वादे पूरे नही हो पा रहे थे, जिसके कारण धीरे-धीरे असंतोष बढ़ने लगा।

कालांतर में इसी असंतोष के कारण ही बहुत सारी सरकारें गिरती बनती रहीं लेकिन लोगो की अपेक्षाओं पर कोई खरी नही उतरी। लंबे समय तक एक दल विशेष पर लोगो का विश्वास अनायास ही बना रहा। इसका कारण उस समय के राजनीतिक परिदृश्य में किसी सशक्त विपक्ष का न होना भी हो सकता है। यह बात भी एक तरह से आत्मघाती ही सिद्ध हुई। बिना ज्यादा प्रयास और सशक्त विपक्ष के आभाव में आसानी से शासन मिलते रहने से शासक वर्ग में एक आत्ममुग्धता का भाव उत्पन्न हो गया। इस आत्ममुग्धता के कारण सरकार थोड़ी असावधान और लापरवाह हो गई, जिसके परिणामस्वरूप विकास का पूरा चक्र ढुलमुल गति से चलने लगा।

इसका दुष्प्रभाव पूरे सरकारी तंत्र में फैल गया। योजनाओं में बंदर-बाँट शुरू हो गया। जो एक बार राजनीतिक प्रतिनिधि चुन लिया जाता उसकी सामाजिक और आर्थिक स्थिति आश्चर्यजनक रूप से ऊपर उठ जाती थी। लोगो को भी इस घालमेल का भान होने लगा था। इन बातों ने सरकार और पूरी सरकारी व्यवस्था की साख पर बट्टा लगाने का काम किया। राजनीति समाजसेवा से व्यवसाय का रूप ले चुकी थी।

इस तरह सरकार लोगो की होते हुए भी लोगो की नही रही। लोगो ने अपने आप को सरकारी तंत्र से पूरी तरह से अलग कर लिया। लोग सरकार के प्रति उदासीन हो गए। लोगो मे अपने अधिकारों के प्रति अचेतना होने के कारण सरकार और उसका तंत्र निरंकुश होकर जवाबदेही से लगभग मुक्त-सा हो गया था।

आम लोगो मे यह मनोभावना बलवती होने लगी की सरकार और उसका पूरा तंत्र भ्रष्ट और चोर है। इसीलिए चोर की गठरी पर हाथ साफ करने किसी भी तरह से गलत नहीं है। इसी कारण लोग सार्वजनिक संपत्ति का नुकसान करने या चोरी करने के पश्चात भी किसी तरह का अपराध बोध महसूस नहीं करते और न ही इसे नैतिक रूप से गलत मानते है। आज यह स्थिति इतनी विकराल हो गई है कि नैतिक और अनैतिक आचरण के बीच की रेखा बहुत धूमिल हो गई है। इसीलिए आज हम देखते है कि लोगो में सार्वजनिक संपत्ति के प्रति लापरवाही और उदासीनता बहुत ज्यादा बढ़ गई है।

जनता अपने हर गलत आचरण को सही ठहराने के लिए इसका ठीकरा सरकार पर फोड़ती है और सरकार अपनी कमियों को छुपाने के लिए जनता, जागरूकता और जनधन की कमी पर ठीकरा फोड़ती है।

आज हमें ज़रूरत है कि दूसरे की आँख का तिनका देखने की बजाए अपनी आँखो में पड़े लट्ठ को देखे। तभी हम एक आदर्श देश और समाज का निर्माण कर पाएंगे जो सभी प्रकार से सम्पन्न हो।

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© Arvind Maurya

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UPSC: सिविल सेवा में सीधी भर्ती पर कोहराम क्यों ?

प्रथमदृष्टया सरकार का यह कदम मुझे भी बहुत ही बुरा लगा कि ऐसा हो जाएगा वैसा हो जाएगा पर जब एक जिम्मेदार नागरिक के रूप में मैंने इसपर विचार करना शुरू किया तो वही कदम मुझे स्वागतयोग्य लगने लगा। आपमेंसे बहुत सारे लोग भी कही न कही इसी दुविधा में फंसे होंगे कि निगले या उगले अर्थात आलोचना कर या इसे स्वीकार कर ले। आइए इसी पहलू पर थोड़ी सार्थक चर्चा करने का प्रयास करते है।

वर्तमान में हम एक देश के रूप में अपने समकालीन देशो से कई मायनों में बहुत पिछड़े है चाहे वो आर्थिक,सामाजिक,तकनीकी या वैज्ञानिक हो बशर्ते हम अपना संदर्भ बिंदु पाकिस्तान को न माने। पिछले 70 सालों में कितनी ही सरकार आई और चली गई पर उनके वादे और मुद्दे आज भी वही के वही है। अशिक्षा,भूखमरी,गरीबी,कुपोषण, आदि। कुल मिला जुला कर एक सम्मानजनक जीवन स्तर के उपलब्धता की गारंटी। इसी पर सरकारें बनी-गिरी और फिर से बनी पर अच्छे दिन मुंगेरी लाल के हसीन सपनो की तरह ही रह है जो अब तक सच होने से रहा। जब हमें लगा अच्छे दिन लाना इस सरकार के बस की बात नही है तो सत्ता दूसरे के हाथ मे दे दी,फिर जब लगा इसके बस का नही है तो फिर से पहले वाले को बिठा दिया। नई सरकार पुराने सरकार के कामों की समीक्षा करती और उन गलतियों से बचना चाहती जो पिछली सरकार ने किए थे। लेकिन कोई न कोई कमी रह ही जाती और लक्ष्य पूरे नही हो पाते। सालो साल यह क्रम ऐसे ही चलता रहा, बीच मे कुछ ढांचागत परिवर्तन हुए जिससे उम्मीद की किरण दिखी लेकिन अंत मे नतीजा ढाक के तीन पात ही रहा और कोई भी सरकार उस दुखती रग को पकड़ नही पाई । कुछ ने पहचाना भी उसको ठीक करने की कोशिश भी की लेकिन इतना दर्द मिला कि फिर से उसको हाथ लगाने की हिम्मत नही पड़ी।

जब हम सरकार की बात करते है तो हमारे दिमाग मे भाजपा, कांग्रेस, एडीएमके, डीएमके, तृणमूल,लोजपा, माकपा, भाकपा, आदि के नाम ही आते है और हम भैया, दीदी, मोदी, अम्मा, राहुल, आदि के नाप पर आकर सिमट जाते है। वर्तमान में स्थिति तो और भी हास्यास्पद है क्योंकि लोगो ने सरकार के नाम को संकुचित करके केवल मोदी रख दिया है। चाहे शिक्षित हो या अशिक्षित, अमीर हो या गरीब, किसी के भी जीवन मे कहीं भी, कभी भी, कोई भी, परेशानी आ जाए उसका जिम्मेदार सिर्फ और सिर्फ एक इंसान नरेंद्र मोदी है। लेकिन शिक्षित लोगो को तो इस बात की जानकारी होनी ही चाहिए कि सरकार मोदी के अलावा भी और बहुत से लोगो से मिलकर बनती है। मोदी खुद कोई भी बदलाव नही ला सकते बल्कि वो बदलाव की पहल करते है या फिर यू कहे कि वो बदलाव से होने वाले प्रभावो की जिम्मेदारी लेते है। सरकार में मोदी जी का उतनी ही जिम्मेदारी है जितनी रिजर्व बैंक द्वारा जारी किए गए नोटो पर हस्ताक्षर करने पर गवर्नर की होती है। दोनो ही विश्वास पर चलते है।

सरकार का एक बहुत बड़ा हिस्सा नौकरशाही के रूप में विधयिका के मुखौटे के पीछे छिपा रहता है, जिसे न ही सीधे तौर पर किसी कार्य का श्रेय दिया जाता है और ना ही सीधे तौर पर उन्हें दोषी ठहराया जाता है लेकिन हर एक परिवर्तन में चाहे उसका प्रभाव कैसा भी हो , में वे सीधे तौर पर भाग लेते है अर्थात परिवर्तन के असली वाहक नौकरशाह ही होते है।

इसतरह एक बात गौर करने वाली है कि जनता सरकारी ढाँचे के केवल एक छोटे से हिस्से ‘विधयिका’ को अदलती बदलती रहती है जिसका जमीनी बदलाव से सीधा संबंध नही है और एक बड़े परिवर्तन की आशा रखती है। जबकि दूसरी तरफ सरकार का एक बहुत बड़ा हिस्सा जिसका जमीनी परिवर्तन में बहुत बड़ा हाथ होता है, नौकरशाही के रूप में जनता की ओर लगभग दायित्वहीन सा है। मतलब पूरी उल्टी गंगा बह रही है। जिसका दायित्व जन कार्यो को सीधे तौर कार्यांवित करना है उसकी जनता की तरफ कोई जवाबदेही ही नही है। माने की काम कॉन्ट्रैक्ट की तर्ज पर हो रहा है जहाँ पर आप अपने यहाँ काम पर आए मजदूर को सीधे नही बोल सकते बल्कि आपको उसकी शिकायत कांट्रेक्टर के पास करनी होगी।

इस तरह जवाबदेही के अभाव में नौकरशाही में शिथिलता और लालफीताशाही जैसी कमियां खुद ब खुद आ जाती है, जोकि अन्तोगत्वा विकास की गति को प्रभावित करता है। अभी पिछले 4 सालो से जो भी ढाँचागत परिवर्तन हो रहे है वो ठीक उसी तरह है जैसे हम हर 5 साल में करते है लेकिन ये परिवर्तन उससे काफी ज्यादा स्थायी और प्रभावशाली है जिसका असर हाल फिलहाल में तो हम देख नहीं पा रहे है लेकिन भविष्य में इसका बहुत सकारात्मक असर होगा। संक्रमण काल मे चीजे एक तरह से प्रायोगिक दौर से गुजरती है जो थोड़ी कष्टकर होती है लेकिन ये कष्ट धीरे धीरे जाता रहता है। जीएसटी से लेकर आईटी जितने भी परिवर्तन हुए और हो रहे है ये एक नए भारत की तस्वीर गढ़ रहे है। पिछले 4 साल से हर उस दुखती नब्ज की जांच-पड़ताल और इलाज पर बराबर ध्यान दिया गया है जिसको छेड़ना पिछली सरकार अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारना समझती थी।

सिविल सेवा में सीधी भर्ती का निर्णय उसी जांच-पड़ताल और इलाज की एक कड़ी है जो देश की बीमारी दूर करने के लिए पिछले 4 साल से चल रहा है। इसको भाजपा का अपने कार्यकाल के अंतिम वर्ष में लाने का भी एक महत्वपूर्ण कारण है, क्योकि आईएएस लॉबी अगर विरोध और असहयोग पर आमादा हो जाए तो भी सरकार के कार्यक्रमों को ज्यादा प्रभावित न कर पाए। आईएएस लॉबी द्वारा इसका विरोध करने का सीधा सा कारण है कि अब उनके कार्यक्षमता और कार्यकुशलता की तुलना सीधी भर्ती हुए दक्ष प्राइवेट सेक्टर के कर्मियों से होगी जोकि निसंदेह ज्यादा मेहनती होते है। उनसे पटखनी खाने से अच्छा अपनी इज्जत और मौको को बरकरार रखने के लिए आलोचना करना उनके लिए ज्यादा हितकर है। इसीलिए किसी के ऊलजलूल बातो में न आए।

अगर आप इसे अभी तक पॉलिटिकली मोटिवेटेड मान रहे है तो मैं इसी बात को थोड़ी दूसरी तरह से समझाने का प्रयत्न करूँगा।

लोग हमेशा सरकार को कोसते रहते है कि सरकार काम नही कर रही है। देश विकास नही कर रहा है। हमे नौकरी नही मिल रही है। लेकिन जब एक प्रगतिशील सरकार कोई प्रगतिशील कदम उठाती है तो बहुत सारे लोग आदतन उसकी निंदा करना शुरू कर देते है। हम इसे आया गया मानकर गाहे बगाहे निंदा करते रहते है। लेकिन हमें ध्यान रखना चाहिए कि बेवजह की गई निंदा से सरकार का मनोबल थोड़ा टूटता है,जिसका दूरगामी दुष्परिणाम अन्तोगत्वा जनता को ही भुगतना पड़ता है,क्योकि भविष्य में सरकारे इनसे सबक लेकर लंबे समय तक कोई कोई प्रगतिशील कदम उठाने से बचती है और जब कुछ करने को खास नही होता तो अच्छे अच्छे घोटाले करती है। कुछ समय बाद जब जनता की नींद खुलती है तो वे उन अधिकारों के लिये आंदोलन करते है जो उन्हें स्वाभाविक रूप से प्राप्त हो सकती थी।
इसीलिए क्यों कुछ बचे खुचे अच्छे इंसानो को बदनाम करके उनके मनोबल और कार्यक्षमता को नकारात्मक रूप से प्रभावित करे।
जहाँ तक बात इस भर्ती की है तो मैं आपलोगो को एक सामान्य समझ की छोटी सी बात बताना चाहता हूँ। आप लोग ही बताइए की अगर जानवरो का डॉक्टर इंसानो का इलाज करे तो क्या होगा । खैर इसमे भी कुछ गनीमत है कि उसके नाम के आगे डॉक्टर लगा हुआ है। लेकिन अगर दर्जी शाल्य चिकित्सा करने लगे तो क्या होगा। यहाँ पर एक बात ध्यान दीजिएगा की विशिष्ट योग्यता रखने वाले लोगो को भी अगर उनके विशिष्टतम क्षेत्र से इतर अदल बदल कर काम दिया जाएग तो परिणाम सिफर ही आएगा।
ठीक उसी तरह अब तक प्रशासनिक सेवा में बेमेल पदों और उनके प्रभारियों की एक लंबी फेहरिस्त है जैसे कि चिकित्सा क्षेत्र के विशेषज्ञ को सूचना एवं संचार का सचिव बना दिया गया, अर्थशास्त्र के विशेषज्ञ को उड्डयन का प्रभार दे दिया गया। इस वास्तव में होता आया है और ये सूची काफी लंबी जाती है।
अब आप ही बताइए इन परिस्थियों में योजनाओं-परियोजनाओं की गुणवत्ता कैसी होगी। जब ऊपर से ही पकड़ ढीली होगी तब बीच मे लालफीताशाही होगी ही और 4 साल की परियोजना को पूरा होने में 14 साल लगेंगे। इससे संसाधन,समय और धन की बर्बादी ही होगी।
हमारी परियोजनाओं को पूरा होने में इतना लंबा समय क्यों लगता है क्या आपने कभी सोचा है। मैं बताता हूँ। क्योकि परियोजनों में परियोजना कार्य अर्थात सर्वेक्षण,निरीक्षण,उपलब्धता,आदि का गलत अनुमान लग जाता है जोकि निःसंदेह अनुभवहीनता और अनुशासनशीलता की कमी की वजह से होता है।
मैं ऐसा बिल्कुल नही कहता कि देश मे अब तक कुछ भी नही हुआ हमने कोई विकास नही किया लेकिन यह बात भी तो उतनी ही सही है कि हमने बहुत कुछ भी तो नही किया है। इसीलिए अगर हम उसी 70* साल पुराने ढर्रे पर चलकर विकास की आशा रखते है तो मुझे लगता है कि ये खुद के साथ धोखा देने वाली बात हुई। इसीलिये अच्छे बदलाव के लिए कुछ कदम उठाने ही पड़ेंगे और किसी न किसी को ये काम तो करना ही पड़ेगा। क्योंकि विकास तो 70 साल पुरानी परिपाटी पर चल कर पाया नही जा सकता अगर ऐसा होना ही होता तो आज किसी बात का रोना ही नही होता।
आखिर में इतना ही कहूंगा , “बोलने वाले से ज्यादा होशियार* सुनने वाला होना चाहिए और काम करने से ज्यादा होशियार काम कराने वाले को होना चाहिए।” हम भारत देश के लोग काम काम कराने वाले और सरकार काम करने वाली है। इसीलिए ईमानदार सरकार के काम को हमेशा रोकना टोकन मतलब अपने विकास को रोकना टोकना है।
धन्यवाद

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© Arvind Maurya

कैसे हो- वो बच्चा- हम जैसा-

किसी मनुष्य का जन्म उसकी जननी और उसके परिजनों के जीवन के सबसे बड़े दिनों में से एक होता हैं। सामाजिक और आर्थिक कारणों तथा प्रथाओं के मद्देनजर, बालिका अथवा बालक पैदा होने की स्थिति में खुशी का स्तर अलग अलग होता है। शिशु के जन्म के समय की खुशी और खुशी को मनाने के के स्तर से ही उसके भविष्य के बारे में काफी कुछ अनुमान लगाया जा सकता है। ज्यादा दूर के भविष्य को तो नही पर निकट भविष्य को काफी हद तक अनुमानित किया जा सकता है। किसी के दूर के भविष्य पर भी उसके प्रारंभिक जीवन का असर काफी गहरा होता है इसीलिए ये कहा जा सकता है कि उत्तरवर्ती जीवन काल को भी कुछ हद अनुमानित किया जा सकता है।

यहाँ पर यह बात ध्यान दिलाने योग्य है कि जीवन से मतलब उसके आर्थिक पहलू से कम और सामाजिक पहलू से ज्यादा है और उससे भी महत्वपूर्ण उसके व्यक्तिगत व्यक्तित्व और नैतिक पहलू से है।

शिशु के जन्म से 1 वर्ष तक उसके लालन पालन का बड़ी सतर्कता और लगन के साथ ध्यान दिया जाता है। इस दौरान परिवार के कुछ वयस्को की बाल सुलभ प्रवृतियां पुनः उद्दीप्त हो जाती है और कई लोगों का तोतलापन शिशु की वाक् चेस्टा को भी पीछे छोड़ देता है। इसके साथ साथ बालक के अति सामान्य बोध को विकसित करने का प्रयास भी शुरू हो जाता है, जोकि समाजीकरण से पूर्व की प्रक्रिया होती है, जिसे परिवारीकरण कहना गलत नही होगा। शिशु को इस प्रक्रिया का बोध चेतन रूप से शून्य होता है पर अचेतन रूप में वो बहुत कुछ ग्रहण कर रहा होता है। इस समय शिशु जो कुछ भी ग्रहण कर रहा होता है वो उसके जीवन के उत्तर काल के निर्णय निर्धारण को निर्धारित करते है क्योंकि इसी समय शिशु को अचेतन रूप से बोध होना प्रारम्भ हो जाता है कि उसे क्या करना चाहिए और क्या नहीं।

निर्णय निर्धारण ऐसी प्रक्रिया है जिसमे एक व्यक्ति प्रस्तुत परिस्थिति में दिए गए या उपलब्ध विकल्पों में से सबसे उत्तम का चुनाव करने का प्रयास करता है। निर्णय निर्धारण मूल रूप से अचेतन मस्तिष्क की जिम्मेदारी होती है, जिसमे व्यक्ति एक वरीयता क्रम में कम जरूरी तथा ज्यादा जरूरी विकल्पों को स्थान देता है। एक व्यक्ति के लिए क्या जरूरी और क्या गैरजरूरी है ये इस बात पर निर्भर करता है कि किस तरह से उसका लालन पालन और समाजीकरण हुआ है और किन किन चीजों को उसके समाज और परिवार ने उसके लिए नाजिर के रूप में प्रस्तुत करते हुए महत्वपूर्ण बताया। इस तरह शैशवास्था से किशोरावस्था तक आते उनकी अपनी खुद की एक पूर्णरूपेण स्वतंत्र निर्णय निर्धारण प्रणाली विकसित हो जाती है।

1 वर्ष के पश्चात शिशु का सामना धीरे-धीरे कुछ नई-नई और ज्यादा वृहद परिस्थितियों से होता है। अब शिशु को चतुष्पदी से द्विपदी करने का अभ्यास प्रारम्भ हो जाता है। इस अभ्यास के दौरान कुछ द्विपदी स्वयं चतुष्पदी बन जाते है। यह समय परिवार के बड़े बुजर्गो के लिए बड़ा ही रोचक होता है। नवजीवन का चीजो को देखने, सुनने, बोलने, समझने, की उत्सुकता उसकी बड़ी-बड़ी आँखों मे झलकता है, जिसे देखकर सभी अपने-अपने थोथे ज्ञान से नवजीवन को अभिसिंचित करने को उत्सुक हो जाते है। इस तरह शिशु का सामना जीवन के पहले शारीरिक और मानसिक अभ्यास से होता हैं जोकि अब जीवनपर्यन्त चलने ही वाला है।

1 वर्ष से 4-5 वर्ष तक सुनने, बोलने, चलने, समझने का अभ्यास कराया जाता है पर इस अभ्यास की कठोरता समय के साथ साथ तीव्र होती जाती है। माता पिता को लगता है कि जीवन संघर्ष में आगे बढ़ने के लिए एक शिशु को अपने समकक्ष से आगे रहना चाहिए। इस जीवन संघर्ष की दौड़ को जीतने और जिताने का इच्छा ही इस अभ्यास की तीव्रता और कठोरता को निर्धारित करती है।

बालक को कहा पता होता है कि वो फर्राटा नही मैराथन दौड़ में भाग ले रहा है जिसका कोई अंत नही है। काफी लंबे समय तक बालक को इस भ्रम में रखा जाता है कि आगे दिखने वाली रेखा को पार करते ही दौड़ समाप्त हो जाएगी और अगर दम बांध कर दौड़ गए तो जीत तुम्हारे कदमो में होगी। पर जैसे ही वो सामने वाली रेखा को पर करता है तो उसे बताया जाता है कि ये नही इसके आगे वाली रेखा, विजय रेखा है। उस रेखा को पार करते ही एक नई रेखा को विजय रेखा बताया जाता है और इस तरह से इस भ्रम का क्रम काफी लंबा चलता है। कुछ समय बाद उसे पता चल जाता है कि इस दौड़ का कोई अंत नही, न ही इसकी कोई विजय रेखा है। लेकिन ये भ्रम उसके अंदर वहम का रूप ले चुका होता है इसलिए वो दौड़ता ही रहता है कि शायद अगली रेखा विजय रेखा हो जहाँ पर उसके इस जीवन को पूर्ण विश्राम मिले। पर हम सबको पता है कि उसका विश्राम स्थल उसकी शव शैय्या ही है जिसकी तरफ वो अंधाधुंध दौड़ा जा रहा है। भ्रम को एकबारगी तथ्यों की सहायता से तोड़ा जा सकता है पर वहम को तोड़ने के लिए कोई भी तर्क और तथ्य नाकाफी है।

4 या 5 वर्ष का होने के बाद बालक अथवा बालिका की औपचारिक शिक्षा प्रारम्भ होती है; जोकि किसी विद्यालय में नामांकन कराके किया जाता है। अन्य बालको और शिक्षकों की सोहबत में अब बालक का समाजीकरण एक चरणबद्ध तरीके से प्रारंभ हो जाता है। नए नए हमजोली बनने का क्रम शुरू होता है, जिनका अचार-विचार-वय-व्यवहार-उत्साह-ललक-समझ काफी मिलती जुलती है। इन सब के बीच विद्यालय में बालक अपनी तारतम्यता एवं समन्वय का अभ्यास उन परिस्थितियों में करना सीखता है जहाँ पर उसकी इच्छा-अनिच्छा को दरकिनार कर सभी पर एक समान नियम लागू होते है। इस तरह अलग अलग परिवारों और अलग अलग पारिवारिक माहौल से आए बच्चे आपस से विचार-व्यवहार का आदान-प्रदान करके अपने अपने विशिष्ट व्यक्तित्व के शिल्पकार खुद बनने लगते है। ये प्रक्रिया 4/5 से 12/14 वर्ष की उम्र तक चलती रहती है और जैसे जैसे किशोरावस्था बच्चे के जीवन मे दस्तक देना शुरू करती है वैसे वैसे उसके अंदर ही अंदर पक रहा व्यक्तित्व भी बाहर आने के लिए दस्तक देना शुरू कर देता है।

12-18 वर्ष के बीच का समय बालक के उस नव उन्मादी व्यक्तित्व का होता है जिसका विकास 5-12 वर्ष के बीच होता है। इस दौरान वो अपने अलग विचारो और मान्यताओं को बिना किसी लाग-लपेट के व्यक्त करना शुरू कर देता है। माता पिता को लगता है कि बालक का ये व्यवहारिक परिवर्तन यकायक हुए जैविक परिवर्तनों के कारण हुआ है, परंतु वास्तविकता तो कुछ और होती है। इसलिए माता पिता लगता है कि बच्चो में उत्पन्न इन नई विद्रोही प्रवृतियों का दमन जितनी जल्दी कर दिया जाए उतना ही अच्छा है। इस क्रम में माता पिता कठोरता से पेश आना शुरू कर देते है औए जाने अनजाने में अपने ही बच्चो के दुश्मन बन जाते है। ऐसी स्थिति का सामना उन माता पिता को करना पड़ता है जो शुरू में तो अपने बच्चो की बाल प्रवृतियों का निरक्षण कर उनको समन्वयित और मार्गदर्शित नही करते है। माता पिता अपने बच्चो का पालन पोषण किस तरह करते है, इसका सीधा संबंध उनके खुद के पालन पोषण से होता है। दूसरे तरह के माता पिता जो शुरू से ही अपने बच्चो में नैतिकता का पुट भरते रहते है और सही गलत में भेद करने की शिक्षा देते रहते है, उन्हें इस दौरान ज्यादा चिंतित नही होना पड़ता है।

अब तक माता पिता ने बच्चो के साथ क्या किया, कैसे किया, इन सब बातों से चिंतित होने का कोई फायदा तो नही है। इसीलिए अब इन सब से इतर माता पिता कोे बहुत ही सावधानी से बच्चो की मनोस्थिति और व्यहवार पर बारीकी से निरीक्षण कर उनको सही और गलत में अंतर करने की क्षमता विकसित करने में मार्गदर्शन करें। इस करने पर निःसंदेह काफी सुधार की गुंजाइश रहेगी और कुछ समय पश्चात वो खुद से ही सही और गलत में भेद करना सीख जाएगा और ज़रूरी और गैरज़रूरी चीजो को प्राथमिकता के आधार पर महत्व देना शुरू कर देगा जोकि दोनो के लिए अच्छा ही होगा।

18 वर्ष के पश्चात तो घड़ा पक कर रंगा जा चुका होता है। अब इसने जो रूप,रंग,आकर धारण कर लिया होता है, उसमे ज्यादा फेरबदल की गुंजाइस नही होती है। अब इसपर ही कई अलग अलग तरह के डिज़ाइन बनाए जा सकते है। इसी तरह युवावस्था तक आते आते बच्चो में मूलभूत व्यवहारिक और नैतिक गुण ठोस रूप लेकर काफी हद तक स्थिर हो जाते है अर्थात उनके व्यक्तित्व का अभिन्न अंग हो जाते है, जिसमे ज्यादा फेरबदल की गुंजाइश नही होती है।

आज एक समाज के रूप में हम उन्नत हो रहे है। उन्नति का अर्थ है सकारात्मक बदलाव जो जीवन को उच्च से उच्चतर की ओर उन्मुख करे पर हम अपने बच्चो को अगर उन्ही पुराने ढर्रे पर चलने के लिए मजबूर करेंगे तो ये एक तनातनी बनकर रह जाएगी जिसमें किसी का लाभ नही होगा। इसका मतलब ये कतई नही है कि अपने बच्चो को मनमानी करने दे बल्कि हमे चाहिए कि बच्चो को जीवन का ज्ञान दे और हम ऐसा तभी कर पाएंगे जब हम खुद जीवन के नैसर्गिक रूप को समझेंगे, जोकि सभी के लिए सर्वोत्तम होगा। बच्चे पालना कोई एक दिन का खेल नही है बल्कि एक माता पिता को एक अच्छा बच्चा समाज को देने के लिए पूरी तन्मयता से अपने जीवन के कम से कम 18 साल कुर्बान करने के लिए तैयार रहना होगा।

किसी त्रुटि के लिए क्षमा करें।

धन्यवाद।

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© Arvind Maurya

ये सृजन कहीं विध्वंस न हो।

कुछ मानवीय गुणो को सास्वत मानकर जिनके कारण कुछ विशेष नैतिक आचरणों का पालन संभव नहीं था; उसके लिए कुछ परम्पराए और मान्यताए बनाई गई, जिससे कि सामाजिक और प्राकृतिक व्यस्थाओं का संचालन नैसर्गिक रूप से बिना किसी टकराव के संपन्न हो सकें।ये मान्यताएं एवं परम्पराए समाज के कोप से इंसान को और इंसान के लोभ से प्रकृति को बचाने के लिए स्थापित की गई थी। इन पम्पराओ और मान्यताओं को आधुनिक लोग रूढ़िवादी मानते है। इन तथाकथित आधुनिक लोगो का पुरानी परम्पराओ तथा मान्यताओं को रूढ़िवादी कहना, स्वयं में एक रूढ़िवादी मान्यता है जो बिना किसी तार्किक और प्रामाणिक आधार के गढ़ी गई है ।

आज का आधुनिक मानव जो अपने आप को सबसे बुद्धिमान और श्रेष्ठ मानता है, नें वास्तव में अबतक के इतिहास में पृथ्वी का सबसे ज्यादा नुकसान किया है। इससे पूर्व किसी भी जीवन-धारी ने भी पृथ्वी को इतने संकट में नहीं डाला था जितना कि इस तथाकथित आधुनिक मानव ने डाला है।

हम इंसान धरती पर पनपे सभी तरह के जीवन मे अपने आप को श्रेष्ठ मानते है, क्योंकि हमारा ही सिर ऊर्ध्वाधर हो पाया है। हम सोच सकते है। हम सही-गलत में अंतर कर पाते है। हम सभ्य और सामाजिक है। हम व्यस्थित-सुरक्षित घरो में रहते है, जहाँ p की सुरक्षा और गरिमा को बनाए रखने के लिए सभी साधन उपलब्ध होते है। हमारे बनाए सामाजिक ढांचे में सभी वर्गानुसार जीवन-संघर्ष में भाग लेकर अपने पुरुषार्थ से जीवन को एक ऊँचा स्थान प्रदान करते है। लेकिन विडम्बना ये है कि इतना सब कुछ होने के बावजूद एक बहुत बड़ा वर्ग अभी भी जीवन के मूलभूत साधन नही जुटा पा रहा है। ऐसा नही है कि उसमें पुरुषार्थ नहीं है बल्कि वो वर्ग ही मूलभूत जीवन के साधनों को तैयार करने में सबसे ज्यादा मेहनत करता है। फिर भी उसको अत्यंत दयनीय अवस्था में जीवनयापन करना होता है। ऐसा होने के दो कारण है; पहला, कुछ बहुत ही कम लोगो का संसाधनों के एक बड़े भाग पर अधिक अधिकार; दूसरा, जनसंख्या और उपलब्ध संसाधनों के अनुपात में भारी अंतर का होना है। इन सब के बीच दूसरे जीव-जंतुओं की क्या दशा हो सकती है, ये बताने की ज़रूरत नही है।

दूसरी तरफ सुख, सन्तुष्टि, साख, सम्मान के नए नए प्रतिमान गढ़े जा रहे हैं, जिन्हें बहुत लुभावने तरीको से प्रस्तुत किया जा रहा है। इन आभासी प्रतिमानों को जीवन का मूल लक्ष्य मानकर, इन्हें पाने के लि पूरा जी जान लगा देता है। जब इन प्रतिमानों के अनुरूप अपनी जीवन शैली को बनाने की दौड़ शुरू होती है, तो एक बहुत बड़ी आकस्मिक माँग उठती है, जिसकी पूर्ति प्राकृतिक चक्र को बनाए रखकर नही की जा सकती है। तब जाकर नए-नए तरीकों को अपनाकर इस आकस्मिक अप्राकृतिक माँग को पूरी करने की कोशिश की जाती है।इस बढ़ी हुई माँग की पूर्ति के लिए जो नए-नए तरीके ईजाद किए और अपनाए जाते है, उन्हें मानव दम्भ से फूलकर सृजन की संज्ञा देता है। ये साधन बढ़ी हुई माँग को कुछ ही समय तक पूरा कर पाते है, क्योंकि मनुष्य के ज़रूरत की एक सीमा होती है जिन्हे पूरा किया जा सकता है। लेकिन लालच की कोई सीमा नही होती जिसकी पूर्ति असंभव है।

इस तरह लोभ लालच पर आधारित ये प्रतिमान पूरी मानवता को एक भयंकर दुष्चक्र में गूँथते जाते है जोकि धरती पर जीवन के लिए एक बहुत ही बड़ा खतरा लेकर आ रहा है।

आधुनिक मानव जाति आज जिस बात की सबसे ज्यादा डींगे हाँकती है, वो उसके सृजन की क्षमता ही है। पर इस सृजन ने जीवन को इतना दुष्कर और जटिल बना दिया है कि व्यक्ति अपनी नैसर्गिकता को त्यागकर कई प्रकार की छद्म और आभासी अभिलाषाओं की पूर्ति के लिए जहाँ-तहाँ भटक रहा है। अभिलाषाओं की पूर्ति के लिए भटकाव की जो चरणबद्ध प्रक्रिया शुरू होती है, वही जीवन की सभी अव्यस्थाओं की जन्मदात्री और प्रकृति की प्रनहंता हैं। इस अव्यस्था की चरणबद्ध प्रक्रिया बहुत पहले शुरू हो गई थी; लेकिन अब जाकर यह स्पष्ट रूप से दिख रही है क्योकि यह तथाकथित सृजन का चक्र बिना किसी रुकावट के एक लंबे समय से अत्यंत तीव्रता से घूम रहा है और इस सृजन चक्र के दुष्प्रभावों को मापने के साधन भी उपलब्ध हैं।

इस मानव कृत सृजन-चक्र ने प्राकृतिक सृजन-चक्र को रोककर अपने कब्जे में लेने का जो दुस्साहस किया है; प्रकृति समय-समय पर उसका प्रतिकार करती रहती है, लेकिन अब तक इसपर मनुष्य की पकड़ ठीक ठाक रही हैं, इसीलिए ज्यादा नुकसान नहीं उठाना पड़ा है। लेकिन प्रकृति के धैर्य को जिस तरह से इंसान लगातार चुनौती दे रहा है, उससे प्रतीत होता है कि प्रकृति के सब्र के बाँध को टूटने में ज्यादा वक़्त नहीं लगेगा, जोकि मानवता के लिए किसी महानाशकारी महाप्रलय से कम नही होगा।

इसीलिए किसी भावी संकट को टालने के लिए मनुष्य को मानवीकृत सृजन के चक्र की गति को नियंत्रित करके प्राकृतिक सृजन चक्र को गतिमान करना ही होगा। हर बीतते पल के साथ इस दुष्चक्र को रोक पाना मुश्किल होगा, इसीलिए पूरे विश्व समुदाय को इस पर त्वरित एवं प्रभावी कार्यवाही की अतिआवश्यकता है।

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RAPE IN INDIA : MISCONCEPTION AND SOLUTION

People are crying everywhere that as a nation we are not able to save our daughters from Heinous Crime like Rape and blaming Government and Law & order failure for these Crimes.
Crying for Justice! Justice! for the rape victims.
Does victims really get justice by these means ?The Justice about everyone is talking is just a calculated compensation on the basis of a Particular Set of Rules which are broadly acceptable for the people of a country.
This justice can’t bring back her/his Modesty*,Aliveness and Life.

Victim of any crime can never get justice but Compensation.

In the case of rape, The Justice become more Pygmy & irrelevant for victims. Victims are Marginalised socially,mentally,physically by Society and Family* intentionally and unintentionally.
So The justice or Compensation a big chunk of society is demanding is not Sufficient.

The Only Justice we can Provide our Sisters, Mothers, Daughters, Friends, Children is feeling of Safeness, Surety, Salvation at anytime, anywhere,with whomsoever in the country.
In this Surety, Safeness, and Salvation there is a role of government and law & order maintaining agencies but not whole.

Rape is a Social and Moral evil not a national as it is said.
It has not any link with development, prosperity, GDP of a nation.
Only the perception changes towards the rape from country to country.
Whatever the economic condition and hard rules the democratic countries have still Rape exist.

In the case of rape 98% Offenders were someone known to the victim. In other words the offenders were those on whom victims keep faith or believe in someway.
That’s why I am saying that role of government and law&order maintaining agency become very limited in case of rape

So the role of each and every Family extends very much to inculcate ethical values in their children which will work as a guiding principle whenever any deviation strickes them to do anything wrong.
For personal profit people trend to differentiate in good and bad crime.
In the same way, knowingly or unknowing parents inculcate an idea of good wrong and bad wrong in our children by our actions or thoughts. Which is obvious that they receive from their parents.
In course of time line between good and bad fades and leads to a criminal mind.

Parents,Family,Teachers,Elders,Society & Government must make consensus on Universally Acceptable Ethical Values for inculcating in children which can be applied across the Country without any hesitation on the basis of community, religion, caste, class.

If terrorists can make Suicide Bombers in limited resources, Why we can’t make Good Citizens with unlimited* resources
We have to Sacrifice our petty selfishness and autistic thought process to gain personal benefits.
That’s all we have to Contribute for our nation. We Can. We Can.

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© Arvind Maurya