Category Archives: कहानियाँ

दुष्चक्र

जब से जितेन ने यह नौकरी पकड़ी है तब से उसकी जिंदगी नरक सी बन गई है। आफिस से घर जाते वक्त जितेन अपनी नौकरी और जिंदगी के बारे में सोच रहा है- “सुबह से लेकर देर रात तक गदहे की तरह काम करो फिर भी जिंदगी तंगहाल हो तो ऐसा काम करने का क्या फायदा। बचपन मे पढ़ाई खेलना कूदना छोड़कर मेहनत से पढ़ाई लिखाई किया ताकि जवानी में मजे करेंगे भले ही बचपन थोड़ा फिका हो जाए तो क्या। ये दिन देखने के लिए थोड़े ही इतनी मेहनत की और आज भी कर रहे है। पहले सोचते थे पढ़ लिख लेंगे, नौकरी करेंगे, सम्मान मिलेगा। घंटा सम्मान मिल रहा है। सम्मान के नाम पर ऑफिस का चपरासी दिन भर में एक दो बार चाय पूछ जाता है। इसके अलावा जो खातिरदारी होती है वो तो बताने लायक भी नही है। अब मैं निश्चय करता हूँ कि ये नौकरी छोड़ दूँगा। ये ओहदा मेरे लिए बना ही नही है।

घर पहुंचते पहुंचते जितेन थक कर चूर हो जता है।घर पहुंचते ही सोफे के सामने पड़े मेज पर मोबाइल निकालकर फेंकता है और निढाल होकर धड़ाम से सोफे पर लेट जाता है। अब भी जितेन के चेहरे पर चिंता की लकीरें साफ झलक रहीं है। बालों पर हाथ फेरते हुए, एक गहरी साँस लेकर छोड़ता है और लेटे-लेटे ही पैर से पैर के जूते निकालने का प्रयास करता है। जूता निकालने के लिए वो थोड़ा संघर्ष करता है। क्योंकि जूता नही निकलता है, इसीलिए उसका चेहरा और तमतमा जाता है।

थोड़े संघर्ष के बाद एक पैर का जूता आधा निकलता है तो उसके चेहरे पर हल्की राहत भरी मुस्कान फैल जाती है, मानो कोई जंग जीत गया हो।ठीक उसी वक़्त मेज पर रखा उसका फ़ोन बज उठता है। फ़ोन मेज पर कंपन (वाइब्रेट) करते हुए जैसे ही बजता है, वैसे ही जितेन की मुस्कान सिकन में तब्दील हो जाती है।जितेन सोफे पर लेटे लेटे ही लापरवाही से फ़ोन उठाकर, “हेलो कौन है?” दूसरी तरफ से एक भारी आवाज उसकी बात बीच मे ही काट कर बोलती है – ” खामोश….मेरी बात ध्यान से सुनो। आज तुम्हारी किस्मत तुमसे भीख माँगने आई है और तुमको चुनना है कि तुम उसको कितना दे सकते हो।

जितेन का इतना सुनना था कि उसके कान खड़े हो गए। वो पलक झपकते ही उठ कर बैठ गया। वह ज्यों ही उठा उसका जूता जोकि आधा निकला था, जाकर एक फूलदान पर लगता है। फूलदान गिरकर टूकड़े टूकड़े हो जाता है।

वह ज्यों उठता है तो देखता है कि उसका मोबाइल मेज पर पड़ा हुआ बज रहा है और घड़ी में बारह बज रहे है। उसका दिमाग चकरा जाता है। वो घबरा जाता है कि उसके साथ ये क्या हो रहा है। वो तो अभी फ़ोन पर बात कर रहा था
होता यूं है कि वो जब काम से वापस आता है तो सोफे पर पड़ते ही जूते निकालते निकालते सो जाता है और ये बातचीत सपने में हो रही होती है और अब जाकर उसकी नींद खुली है।

वह ज्यों ही फ़ोन उठाता है तो दूसरी तरफ से वही भारी आवाज फिरसे बोलना शुरू करती है जो सपने में उससे बात कर रही होती है- “मेरे सवाल का अगर तुमने सही जवाब दिया तो तुम्हारी जिंदगी बदल जाएगी।” इतना सुनना था कि जितेन के होश उड़ गए। क्योंकि पिछले एक हफ्ते से उसको यह व्यक्ति रोज रात के बारह बजे फोन कर रहा है।

जितेन चिढ़ते हुए गुस्से में बोलता है – ” भाई मैं एक हफ्ते से तुम्हारे सवालों के जवाब दे रहा हूँ। तुम जो सवाल पूछ रहे हो वो तो किसी स्कूल में भी नही पढ़ाया जाता है। तुम कौन हो? तुम्हारा उद्देश्य क्या है?

तुम पूछते हो- “हाथी और कुत्ते की लड़ाई में कौन जीतेगा?” मैं कहता हूँ भाई हाथी का लड़ना समझ में आता है लेकिन कुत्ता वो लड़ाई क्यों लड़ेगा जो उसके लिए जितना असंभव हो। और वैसे भी इनकी कोई जातीय दुश्मनी तो है नहीं।
तुम पूछते हो- “ऊँट पर बैठे इंसान को कुत्ता कैसे कटेगा?” अरे भाई! दाँत से कटेगा वो तलवारबाजी थोड़ी जानता है।
तुम पूछते हो – “कुत्ता हड्डी क्यों चबाता है?” अरे भाई ! कुत्ता हड्डी नही चबाता है। वो हड्डी से घिसकर अपने दाँत तेज करता है, जिससे अगर तुम्हारे जैसा कोई कुत्ता उसका दिमाग चबाना चाहे तो उसको सबक सिखाए।
यह बताओ तुमको कुत्तो में इतनी रूचि क्यों है?

दूसरी तरफ से वही भारी आवाज और भी गंभीरता से आई – “शाँत…… आज तुम्हारे लिए ये मेरा आखिरी सवाल है। अगर इसका सही जवाब दिया तो तुम्हारी भाग्यरेखा चमक उठेगी। क्या तुम तैयार हो?” जितेन अनमने मन से अपनी स्वीकृति स्वरूप लंबा सा हाँ….. बोल देता है।

दूसरे तरफ से आवाज आती है; तो ध्यान से सुनो – “मान लो अगर किसी कुत्ते को पर (पंख) लग जाए तो क्या करना चाहिए? उसकी पूँछ काट देनी चाहिए या गले मे पट्टा डाल देना चाहिए।”

ज्यों ही जितेन सवाल सुनता है; उसका चेहरा तमतमा जाता है। जितेन चीख पड़ता है- “कुत्ता ! कुत्ता ! कुत्ता ! अब मै इसका जवाब नही दूँगा। अब तुम बताओ; कुत्ता कुत्ते की मौत क्यों मरता है? इंसान कुत्ते की औलाद कैसे हो सकती है? तुम इंसान के रूप में कुत्तेश्वर हो क्या? क्या तुम कुत्ते की तरह…..

दूसरी तरफ की आवाज जितेन की आवाज बीच मे ही काटकर और भारी आवाज में बोलती है- शाँत……

उसकी आवाज सुनकर जितेन अपने आप को संभालते हुए और अपने को सामान्य करते हुए बोलता है – ” भाई मैं हिंसा में विश्वास नही रखता, इसीलिए कुत्ते की पूंछ काटने की बजाए मैं उसको पट्टा पहनना चाहूंगा।” जवाब देने के बाद जितेन फिर से अपना संतुलन खोते हुए चीखकर बोला – ” हाँ भाई! खोल दिया मेरी किस्मत का ताला, बना दिया मुझे बादशाह। इन बेकार सवालो का कोई मतबल भी है?”

दूसरी तरफ से आवाज आई – आज तुमने कुत्ते के गले मे पट्टा पहनाया है। कल तुम्हारे गले मे भी पट्टा पहनाया जाएगा” जितेन जवाब सुनकर अवाक रह गया। इसके बाद टूँ टूँ करके फ़ोन कट गया।

मेज पर पड़ी डिजिटल घड़ी में सुबह के 10 बज रहे है। जितेन सोफे पर सो रहा है। खिड़की से छनकर आ रही सूरज की तेज धूप से जितेन पसीने से तर-बतर हो गया है। करवट बदलते ही वो धड़ाम से नीचे गिर पड़ता है। उसकी नींद टूट जाती है। वो आँखे मींचते हुए उठता है और अपने चारों तरफ देखता है। उसके दोनों पैरों में जूते हैं। फूलदान भी एकदम ठीक ठाक है। वो सिर पकड़ कर बैठ जाता है और बड़बड़ाता है- “आज फिर से वही बुरा सपना।” तभी मेज पर पड़े मोबाइल की घंटी फिर से बज उठती है।

मोबाइल पर बॉस का नंबर फ़्लैश हो रहा है। बॉस का नंबर देखते ही जितेन एकदम सतर्क हो जाता है। उसकी सारी निद्रा और आलस्य उड़न छू हो जाती है।जितेन फ़ोन उठाकर अपने बॉस का अभिवादन करता है। उधर से उसके बॉस का जवाब आता है – ” जितेन! तुम्हारे मेहनत और प्रगति (परफॉरमेंस) को देखते हुए मैनेजमेंट ने तुम्हे पट्टा पहनाने…. ओह सॉरी, प्रमोट करने का निर्णय लिया है।
जितेन स्तब्ध होकर शून्य में देखता रह जाता है।

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© Arvind Maurya

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सलीक़े का सबक़।

“अरे! भई सलीक़ा नाम की भी कोई चीज़ होती है। कौन-सी चीज़ कब, कहाँ, कैसे रखें ये सलीक़ा कब सीखोगें आप लोग। सलीक़ा होने पर सहूलियत होती है भई। लगता है मेरे कब्र में जाने के बाद ही ये सलीक़ा आपलोग सीख पाऐंगे।” आज बाबा जी की कही हुई यह बात मुझे अनायास ही नही याद आ गई थी। आँखो में थोड़ा पानी आने से आँखो की चमक बढ़ गई थी लेकिन मेरा दिल जैसे अँधेरे कुँए में डूबा जा रहा था। बात ही कुछ ऐसी थी कि आज बाबा याद आ ही गए। आज का दिन मेरी जिंदगी के सबसे बड़े दिनों में से था और समय मुझको सलीके की अहमियत बताने पर उतारू था। हुआ यूं था कि आज मेरा साक्षात्कार था! सिविल सेवा का साक्षात्कार! मेरे सपनों का वास्तविकता से साक्षात्कार। लेकिन मेरे दस्तावेजों की फाइल कही दिख नहीं रही थी। बिस्तर, आलमारी, रसोई, हर जगह तलाश किया लेकिन फाइल नदारद थी। अभी रात में सोते वक्त सब बिस्तर पर ही तो पड़ा हुआ था। रात भर में फ़ाइल को पंख तो नही लग गए।

जैसे जैसे समय बीत रहा था, वैसे वैसे मेरी धड़कन बढ़ती जा रही थी। पूरे घर मे कोहराम मचा हुआ था। कोई भी अपने को कोलम्बस से कम नही समझ रहा था। खोजी अभियान बहुत ही जोर शोर से चल रहा था। हर पल कोई न कोई आँखो में चमक लिए मेरे हाथ मे एक काजग थमाकर पूछता,” ये हैं क्या?”और मैं जैसे ही ना मे सिर हिलाता तो ऐसा लगता उनके हाथ में पड़ा ओलंपिक का गोल्ड मेडल मिट्टी का लोंदा हो गया हो। जैसे जैसे सूरज चढ़ रहा था वैसे वैसे मेरा हृदय डूबा जा रहा था। जैसे जैसे जाड़े का सूरज कोहरे को काट कर रौशनी बिखेर रहा था वैसे वैसे मेरे मन मे अंधकार पसरे जा रहा था। सभी बदहवास से हो गए थे, किसी को कुछ सूझ नही रहा था। घर का चप्पा चप्पा खंगाला जा चुका था। कोई ढांढस बढ़ा रहा था तो कोई मुझे निशाने पर ले रहा था। “भाई एक फ़ाइल नहीं संभाल सकते जिला क्या ख़ाक संभालेंगे। हो न हो इसमे इनके किसी मित्र का हाथ है। वे आवारा क्यों चाहेंगे कि इसका भला हो। अरे अंदर ही अंदर किसी की कोई जलन रही होगी, आज मौका देखते ही लपक लिया।” देखते ही देखते मुझसे पूछताछ शुरू हो गई,”कल कौन कौन मुझसे रात में मिलने आया था, कब गया कैसे गया, किसका घर कहाँ हैं, आदि आदि।” मैं भी झल्ला गया। थोड़ा चीखते हुए, थोड़े ही शब्दों में मैने सबका प्रतिकार किया,”रात को सोते वक्त दस्तावेजो की फ़ाइल मेरे बिस्तर पर ही थी; अनर्गल बात न करे; न मैं नशा करता हूँ और ना ही अंधा हूँ।”

आज तो दोपहरी से पहले ही सूर्यदेव बहुत तेज चमक रहे थे मानो मुझपर मुस्कुरा रहे हो। जाड़े की धूप सबको बड़ी सुहानी लग रही थी लेकिन मैं पसीने से तर-बतर हुए जा रहा था। मन मानने को तैयार ही नही था कि मैं साक्षात्कार नही दे पाऊंगा। एक बार फिर से मैंने सारा घर उलट पलट दिया लेकिन परिणाम ढाक के तीन पात ही निकला। बाहर भाभी का छोटा लड़का चीख चीख कर रो रहा था और अंदर मैं अंदर ही अंदर दहाड़े मार कर चीख रहा था। तभी मुख्य दरवाजे पर एक गाड़ी आकर रुकी और लगातार हॉर्न मारने लगी। मैं लपककर मुख्य दरवाजे की ओर बढ़ता हूँ तो बेचैनी और भी बढ़ जाती है क्योंकि ये तो छुटकी की स्कूल वैन थी। बिना समय वैन के आने से मेरे मन में आशंकाओं के बादल और भी गहरा गए। छुटकी के स्कूल की छुट्टी तो 1:30 बजे होती है और अभी तो 10:30 ही बजे थे। इस वक्त मैं अपने साक्षात्कार के बारे में सबकुछ भूल चुका था, बस मन ही मन छुटकी के कुशल की प्रार्थना कर रहा था। मुख्य द्वार के झरोखे से देखता हूँ तो वहाँ पर उल्टी तरफ मुँह करके कोई महिला खड़ी थी। उन्होंने सफेद साड़ी पहन रखी थी। एकबार को मेरा कालेज धक कर गया, आशंकाएं पुख्ता रूप अख्तियार करने को आमादा थी पर मन के एक कोने में अभी भी आशा थी।

ऐसा हम सब के साथ होता है कि जब कभी कोई अनहोनी हो जाती है उसके कुछ दिनों तक हर काम मे किसी अनहोनी का भय लगा ही रहता है। भले ही उसके लिए कोई पुख्ता कारण न हो फिर भी एक संशय बना रहता है। यहाँ तो एक अनहोनी अभी हो ही रही थी उसपर ऐसा आकस्मिक संयोग मन को विचलित करने वाला ही होता है।

बाहर जाने पर देखता हूँ कि वो तो छुटकी के स्कूल की प्रधानाचार्या है। मैं उनसे कुछ पूछता उससे पहले उन्होंने मुझपर सवाल दाग दिया,” आपको पता है छुटकी आज स्कूल क्या लेकर आई थी? आपलोग कैसे अभिभावक है? बच्चो का थोड़ा भी ख्याल नही की बच्चा क्या करता है? हम लोग सबकुछ तो सीखा नही सकते, थोड़ा सलीक़ा तो आपलोग भी सीखा ही सकते है। आप लोग…” उनकी बात को बीच में ही काटकर मैनें पूछा,”छुटकी कहाँ है? छुटकी हैं कहाँ?” उनको मेरे सवाल का जवाब देने की ज़रूरत नही पड़ी। मेरा जवाब मेरे सामने आ चुका था। वैन के पिछले दरवाजे से छुटकी उछलते-कूदते बाहर आई । मेरी खुशी का कोई ठिकाना नही था। मैंने छुटकी को उठाकर आसमान में उछाल दिया फिर सीने से लगाकर दुलारने पुचकारने लगा। पलकों के दरवाजों ने आंसुओ का जो सैलाब रोका हुआ था वो अब उनसे और नही रोका गया। बाँध का फाटक टूट चुका था जिसने आँखो और चेहरे को आँसुओ के सैलाब से तर कर दिया। मेरा सारा बोझ जैसे उतर गया था। अब मन बहुत ही हल्का हो गया था, दिल मे एक सुकून था। अब मुझे अपने दस्तावेजों के खोने और साक्षात्कार के न होने का कोई गम नही था। मेरी छुटकी मेरे सामने जो थी।

तभी वैन का दरवाजा बंद होने की धपाक की आवाज के मेरा ध्यान उस तरफ आकृष्ट किया। प्रधानाचार्या वैन में बैठ चुकी थी। मै प्रश्नवाचक दृष्टि से उनकी तरफ देखकर प्रश्न फेंकने ही वाला था लेकिन उससे पहले उन्होंने मुझे जवाब थमा दिया। उस वक्त प्रधानाचार्या मुझे साक्षात माँ सरस्वती का अवतार लग रही थी। जब वो मेरे दस्तावेज की फ़ाइल मुझे दे रहीं थीं तब फ़ाइल से टकराकर सूर्य की जो किरणे मुझपर पड़ रही थी वो ऐसी लग रही थी मानो उनके हाथ से एक तेज प्रस्फुटित होकर मुझपर पड़ रहा हो और मुझे अपने आशीर्वाद से अभिसिंचित कर रही हो। जब उन्होंने हाथ हिलाकर जाने का इशारा किया तो लगा मुझे तथास्तु कहकर मनोकामना पूर्ण होने का वरदान दे रही हो।

गाड़ी के जाते ही मैं सरपट भागा, झटपट तैयार हुआ और कुछ ही देर में मेरी गाड़ी शाहजहाँ रोड पर फर्राटे भर रही थी। मेरा मन हल्का था। न कुछ खोने का डर था, न कुछ पाने का उतावलापन। मैं अपनी मोटरसाइकिल पर सवारी का मजा ले रहा था। धूप और चटक हो गई थी और मेरा मन भी…

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© Arvind Maurya

अश्रुत कथा श्रवण कुमार की : तब और अब

श्रवण कुमार को हम सभी मातृ-पितृ भक्त के रूप में जानते है। हम सभी जानते ही है कि उनके माता पिता अंधे थे, पर जिसका लड़का श्रवण कुमार हो उसके सभी अंग बेकार हो जाए और शरीर मे केवल प्राण भर ही हो तो भी कोई दुख नही हो सकता और उनकी तो केवल* आँख ही नही थी। श्रवण कुमार ने अपने माता पिता को कंधे पर बिठाकर बहुत सारे तीर्थो का दर्शन कराया।

लेकिन हममे से बहुत कम लोग जानते है कि तीर्थ पर जाने की इच्छा वास्तव में उनके माता पिता को नही थी अपितु श्रवण कुमार की थी कि वो अपने माता पिता को तीर्थो के दर्शन कराए। उनके माता पिता कार्य की दुष्कर्ता और बच्चे के कष्ट को देखते हुए तीर्थ पर जाने से मना भी कर रहे थे। माता पिता इतने निष्ठुर नही होते की अपने बच्चो को कष्ट देकर अपने पाप दूर करे,वैसे ही श्रवण कुमार के माता पिता भी थे। मातृ पितृ ऋण की दुहाई देते हुए जब श्रवण कुमार ने बहुत अनुनय विनय किया तब कही जाकर उनके माता पिता जाने को तैयार हुए। निःसंदेह श्रवण कुमार में सुसंस्कारों के बीज पड़े हुए हुए थे और वो बहुत आज्ञाकारी थे । परंतु किस तात्कालिक घटना की वजह से संस्कारो के बीज प्रफुस्टित हो कर पौधे में तब्दील हो गए और श्रवण कुमार ने अपने माता पिता को कांवर में बिठाकर, कंधे पर उठाकर तीर्थो के दर्शन करने का इतना दुःसाहसिक और कठोर निर्णय लिया। प्रचलित रूप में इस विषय पर कही पर ज्यादा प्रकाश नही डाला गया है इसलिए मैं इस अप्रचलित पक्ष प्रकाश डालूंगा।

श्रवण कुमार अपने माता-पिता के साथ एक सुखद जीवन व्यतीत कर रहे थे। घर गृहस्ती का सारा काम; रसोई से लेकर जीविकोपार्जन तक खुद ही करते थे। माता पिता को किसी तरह का कष्ट न हो इसका हमेशा ख्याल करते और उन्हें खुश रखने का हर संभव प्रयास करते थे। समय अपनी चाल चल रहा था, श्रवण कुमार यौवन के प्रथम चरण में और उनके माता पिता वयपन के प्रथम चरण में प्रवेश पा रहे थे। श्रवण कुमार यौवन के ओज तेज से पुष्ट और उनके माता पिता वयपन के शक्ति ह्रास से जीर्ण शीर्ण हो रहे थे। अब माता पिता को बच्चे के विवाह की चिंता सताने लगी और उन्होंने कई बार इसकी चर्चा श्रवण से करने की कोशिश भी की पर उन्होंने हमेशा विवाह को बाधक बताते हुए चर्चा को माता पिता के इच्छित निष्कर्ष पर पहुचने नही दिया। माता पिता बच्चे के यौवन को अपने अपने सेवा स्वार्थ में नष्ट होते नही देखना चाहते थे इसीलिए उन्होंने एक आखिरी अकाट्य हथियार इस्तेमाल किया।

एक सनातनी कर्म से एकबारगी मुकर सकता है पर धर्म से कभी नही मुकर सकता। धर्म एक सनातनी के जीवन का आधार और संस्कार उसके आभूषण होते है। संस्कार ही एक सनातनी के इहलौकिक और पारलौकिक जीवन को अलंकृत और यशश्वी करते है। विवाह भी सोलह संस्कारो में से एक है इसीलिए कोई* भी विवाह से बच नही सकता और श्रवण के साथ भी ऐसा ही होना था । सनातनी के लिए शादी करना और संतानोत्पत्ति करना केवल संस्कार ही नही बल्कि माता पिता के ऋण से उऋण होने का साधन भी है। माता पिता ने जब श्रवण को उस मातृ पितृ ऋण का बोध कराया तो भक्त बालक के विवाह से बचने की सभी दलीले धरी रह गई। अब विवाह अटल और निकट था।

पुत्र की सहमति के पश्चात विवाह के लिए पूर्व निर्धारित कन्याओ की कुंडली से श्रवण के गुणो का मिलान होने लगा। कुंडली मिलान के पश्चात एक सुकन्या से विवाह का मुहूर्त तय किया गया। विवाह बड़े धूमधाम से सम्पन्न हुआ। माता पिता बहुत खुश थे और हो भी क्यों न अब उनके पुत्र को चूल्हे बर्तन से छुटकारा मिल जाएगा, संगिनी के संग जीवन के बहुतेरे रंग तरंग देखेगा, कुछ वर्षों में घर मे बच्चो की किलकारिया गूजेंगी। इन्ही का विचार करके माता पिता फूले नही समा रहे थे पर विधाता श्रवण कुमार के माता पिता के विचारों से कोई इत्तेफाक नही रखते थे। उन्हें तो कुछ और ही खेल सूझ रहा था।

विवाह के पश्चात के कुछ दिनो का उमंग और खुमार समय के साथ साथ फीका पड़ने लगा और जीवन पुनः रोजमर्रा के ढर्रे पर चलने लगा। पत्नी ने घर बार का काम संभाल लिया। घरेलू काम का बोझ हटने से अब श्रवण कुमार जीविकोपार्जन के लिए ज्यादा समय बाहर बिताने लगे। नववधू अपनी तरफ से पूरा प्रयास करती की वो सभी काम सही ढंग से करे पर वो श्रवण के माता पिता को उस तरह से सुख नही पहुचा पाती जैसा कि उन्हें आशा थी। उन्हें कोई न कोई कमी रह ही जाती थी जिसकी मूक अभिव्यक्ति किसी न किसी प्रकार से हो ही जाती थी। धीरे धीरे इस मूक असंतोष ने प्रकट रूप लेना प्रारम्भ कर दिया। ठीक इसी तरह सुकुमारी बहू को भी दो विकलांग लोगो की सेवा करना बहुत ही कष्टकर होने लगा था। उसके सारे उपाय श्रवण के माता पिता को संतोष नही दे पा रहे थे। इस स्थिति ने बहु के धैर्य को तोड़ दिया और गाहे बगाहे वो भी अपना असंतोष प्रकट करने लगी।

इस तरह दोनो पक्षो का मन एक दूसरे के लिए मैला हो गया और धीरे धीरे इन मैले मनो ने एक दूसरे के लिए द्वेष को जन्म देना शुरू कर दिया। मन का पर्दा अब उठ चुका था और हर बात सीधे जुबान पर आ जाती जो पहले मन के पर्दे के पीछे रहती थी। जब मन का द्वेष जुबान पर आ जाता है तो वो कलह का रूप ले लेता है। पारिवारिक कलह किसी युद्ध से कम नही होता है जिसमें वोे हर हथकंडा जायज होता है जो विपक्षी को पस्त कर दे। द्वेष कलह को और कलह प्रतिशोध को जन्म देता है। बहू के पास प्रतिशोध के प्रबल साधन थे परंतु अक्षु विहीन श्रवण के माता पिता के पास प्रतिकार का साधन केवल उनकी जुबान थी। बहू ने श्रवण के माता पिता से प्रतिशोध को तीक्ष्ण करते हुए उन्हे कष्ट पहुचाने लगी। उसके प्रतिशोध का सबसे प्रबल हथियार भोजन था। उसने भोजन पकाने के एक ऐसा पात्र कुम्भार से बनवाया जिसमें दो भाग थे। एक ही बर्तन में अब दो तरह के पकवान बनने लगे। एक तरफ रूखा-सूखा अधकचा श्रवण के माता पिता के लिए और दूसरी तरफ खीर पुलाव श्रवण और खुद के लिए बनाती।

अब तो श्रवण के माता पिता इसी को अपना प्रारब्ध मानकर सबकुछ सहने लगे । उन्होंने अब प्रतिकार करना भी छोड़ दिया और जीवन की आखिरी बेला को हमेशा पुकारते रहते। दुख-विषाद और शुष्क भोजन ने सेहत को खाना शुरू कर दिया। हृदय की पीड़ा अब केवल आंखों से आँसू के रूप में बाहर आती। श्रवण कुमार इन सब बातों से पूर्णतया अनभिज्ञ थे क्योंकि न उनकी पत्नी और न ही उनके माता पिता ने इस बारे में कोई बात बताई। बहू ने इसलिए नही बताया क्योकि वो जानती थी कि श्रवण कितने मातृ पितृ भक्त है और उनसे उनके माता पिता के बारे में किसी भी तरह की शिकायत करना खुद के लिए मुसीबत खड़ी करना होगा और माता पिता ने इसलिए कुछ नही कहा कि क्योकि वो बच्चे के वैवाहिक जीवन को कलहपूर्ण नही करना चाहते थे लेकिन ऐसी बाते छुपाने से कहा छुपने वाली होती है। श्रवण को थोड़ा थोड़ा भान हो रहा था कि उनके माता कुछ कष्ट में है पर वे कुछ न बताते तो पता कैसे चलता कि बात क्या है। इसीलिए श्रवण ने भी मान लिया कि ये माता पिता का वृद्धावस्था का नैसर्गिक दुख मात्र है। पर देर सबेर इस कलह को खुलना तो था ही सो एक दिन वो शुभ मुहूर्त भी निकल ही आया।

एक दिन श्रवण कुमार भूख लगने की वजह से खेत से जल्द ही वापस लौट आए। घर आए तो देखा कि माता पिता चौके पर बैठे भोजन कर रहे है और उनकी आंखों से आँसू बह रहे है। श्रवण कुमार झट से हाथ मुँह धोकर माता पिता के पास चौके पर बैठ गए और माता पिता से दुख का कारण पूछा तो माता पिता उनकी बात टाल गए। श्रवण को भी लगा कि ये आँखों के दोष के कारण नैसर्गिक जल है जो आंखों से आता रहता है। उन्होंने पत्नी से जल्दी भोजन लाने को बोला तो पत्नी ने उन्हें थोड़ी देर इंतजार करने को कहा क्योंकि दूसरी तरफ का अच्छा भोजन अभी तैयार नही हुआ था। श्रवण को तीव्र भूख लगी ही थी इसलिए उन्होंने पिता की थाली से भोजन का एक निवाला उठाकर खाने के लिए मुँह में रखा। श्रवण ने निवाला मुँह में तो रख तो लिया पर उनसे निवाला निगला नही जा रहा था और उनके माता पिता उसी भोजन को खा रहे थे। भोजन बेहद ही कसैला और बेस्वाद था। श्रवण को सारा माजरा समझते देर नही लगी। ज्योहीं उनको माता पिता के दुख का आभास हुआ उनकी आँखों से झर झर कर आँसू बहने लगे। श्रवण कुमार झट से अपने माता पिता का हाथ पकड़कर भोजन करने से रोक लेते है। तभी उनकी पत्नी का पदार्पण पति के अच्छे भोजन के साथ होता है। वहाँ का माहौल देखकर पत्नी सकपका जाती है और डगमगाते कदमो से आगे बढ़ते हुए , थाली लाकर श्रवण के सामने रखती है। श्रवण अपने पिता की थाली खींचकर अपने आगे रख लेते है और अपनी थाली पिता के आगे बढ़ा देते है। ये दृश्य देखकर श्रवण की पत्नी ऊपर से नीचे तक सिहर जाती है। श्रवण के पिता ने जब अगला निवाला मुँह में डाला तो फूट फूट कर रो पड़े। सारा भेद खुल चुका था। अब कुछ कहने सुनने को शेष न था।

इस घटना ने श्रवण कुमार को अपराधबोध से भर दिया। उन्होंने इसका सारा दोष अपने सिर पर मढ़ लिया। उनसे सिर इतने बड़े पाप का बोझ था जिसको वो जीवनपर्यन्त नही उतार सकते थे। उन्होंने इस पाप के प्रायश्चि हेतु अपने माता पिता को तीर्थो के दर्शन कराने का निर्णय लिया। उनके माता पिता ने कार्य की दुष्कर्ता और बालक के कष्ट को देखते हुए तीर्थ जाने से मना भी किया लेकिन श्रवण के अपने पुत्र धर्म और कर्म की दुहाई देते हुए मनुहार की तो माता पिता मान गए। शुभ मुहूर्त देखकर श्रवण कुमार, माता पिता को कांवर पर बिठाकर तीर्थाटन पर निकल गए। आगे का दृष्टांत हम सभी को पता है।

बहुत सारे तीर्थो का दर्शन करते कराते श्रवण कुमार उत्तर की ओर बढ़ रहे थे। एक जगह मार्ग में माता पिता को प्यास लगी तो माता पिता ने जल मांगा। श्रवण ने कमण्डल में देखा तो पाया कि जल खत्म हो चुका था। उन्होंने माता पिता को पगडण्डी पर छोड़कर जल लेने के लिए पास बह रही नदी से जल लेने चले गए। ये जंगल अयोध्या राज्य के अंतर्गत आता था। उसी दौरान राजा दशरथ शिकार पर आए हुए थे। राजा दशरथ शब्दभेदी बाण चलाने में निपुण थे। शब्दभेदी बाण चलाने का मतलब आवाज सुनकर लक्ष्य भेदने से है। नदी के किनारे पहुच कर श्रवण कुमार ने अपना कमण्डल नदी में डाला। कमण्डल में जल भरने पर ढब ढब की आवाज होती है। राजा दशरथ को लगा कि कोई हिरण जल पी रहा है, उन्होंने तुरंत शब्दभेदी बाण छोड़ा जो सीधे श्रवण के वक्ष को भेदता हुआ आर पार हो गया। बाण लगते ही श्रवण कुमार चीत्कार उठे। चीत्कार सुनकर उनके माता पिता का हृदय विचलित हो गया। उधर राजा दशरथ भी दौड़ते हुए लक्ष्य की दिशा में पहुँचे। एक व्यक्ति को बिंधा हुआ देखकर राजा दशरथ अवाक रह गए। उन्होंने बहुत क्षमा याचना की बहुत आश्वासन दिए पर श्रवण को आभास हो चला था कि उनकी सांसो की डोर अब ज्यादा देर तक नही रुक सकती। श्रवण ने बताया कि उनके माता पिता पगडण्डी पर प्यासे है उन्हें ले जाकर जल पिला दे और हो सके तो उनकी सेवा करे। इतना कहकर श्रवण कुमार ने प्राण त्याग दिया। राजा भारी मन से जल लेकर उनके माता पिता के पास पहुचे और सारा वृतांत कह सुनाया। पुत्र वियोग के दुख में श्रवण के माता पिता ने राजा दशरथ को श्राप दिया कि वो भी इसी तरह अपने पुत्र वियोग में प्राण त्यागेंगे। इसके बाद श्रवण के माता पिता ने बिना जल पिये ही प्राण त्याग दिया। राजा दशरथ ने तीनों मृतको का वही वन में ही दाह संस्कार कर दिया। इस तरह त्रेता के श्रवण कुमार की कथा समाप्त होती है।

आज तकनीकी की कृपा है कि नाना प्रकार के वाहन है जिसने त्रेता के श्रवण कुमार के उत्पादन पर रोक लगा दी है और आज के समय मे त्रेता के श्रवण कुमार का कोई औचित्य भी नही है। आज के समय अगर हम अपने माता पिता के लिए भवन के भूतल से ऊपरी तलो तक जाने के लिए कोई तकनीकी उपाय कर दे तो वो भी श्रवणत्व ही होगा पर आज इसकी भी ज़रूरत नही है। कमी कही और पर है जहाँ पर हमें आज काम करने की जरूरत है और वो क्षेत्र है आप के मस्तिष्क का भाव पक्ष जहाँ पर हमें तनिक और अधिक संवेदनशीलता को जगह देना होगा। वर्तमान में हम एक समाज के रूप में अपने वृद्ध,वरिष्ठ जनों के साथ कैसा व्यवहार करते है ये बात ही भविष्य के वृद्ध,वरिष्ठ जनों का भविष्य तय करती है। इसीलिए हमे न केवल वाणी से बल्कि पूरे मनोयोग और कर्मो से वर्तमान के वृद्ध जानो के प्रति संवेदनशीलता दिखाकर आज के बाल और युवा मन को निर्देशित करना चाहिए जिससे कि उनके अंदर भी वृद्ध जनो के प्रति संवेदनशीलता का भाव उत्पन्न हो।

आज इस परिदृश्य को बदलने में तथा लोगो मे संवेदनशीलता उत्पन्न करने में श्रवण कुमारों से ज्यादा श्रुति कुमारियों के योगदान की ज़रूरत है। मातृ पक्ष की संवेदेनशीलता को हम अपने और अपने बच्चो के अंदर जितना अधिक संवर्धित और संरक्षित रख पाएंगे उतने ही सभ्य,सुरक्षित समाज की ओर हम अग्रसर होंगे।

धन्यवाद।

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© Arvind Maurya