Category Archives: कविताएँ

निरखते लिखते

खुद को लिखते रहो, खुद से कहते रहो ।
कुछ तो लिखते रहो, कुछ तो कहते रहो ।

प्यार-तकरार  लैला   या   मजनू  पे हो
रात   काली अंधेरी   या   जुगनू   पे हो
रात  दिन  शाम  चढ़ती  दोपहरी  पे हो
बहती कल-कल नदी या उफनती पे हो
खुद को लिखते रहो, कुछ तो कहते रहो ।।

बन सिपाही कलम लेके लड़ते रहो
बिन डरे  धीर  धीरे  से  चलते  रहो
घुटनो पर ही सही, आगे बढ़ते रहो
नित  निरंतर  नए  दाँव  चलते रहो
खुद को लिखते रहो, कुछ तो कहते रहो ।।

धार कर वार कर  जख्म  करते रहो
भ्रष्ट लंका दहन  कर के  चलते बनो
इस लगन की अगन में यूँ जलते रहो
सुध  रहे  न  रहे   बोध   करते  चलो
खुद को लिखते रहो, कुछ तो कहते रहो ।।

रस  अलंकर  छंदो  को   चखते  रहो
बिन  विशेषण  के  भी रास रचते रहो
सब लुटा के भी अव्यय से दिखते रहो
कर्म  करके   क्रिया   में  निखरते  रहो
खुद को लिखते रहो, कुछ तो कहते रहो ।।

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© Arvind Maurya

भ्रमित भस्मित भूप

जो होगा देखा जाएगा, तो देखता ही रह जाएगा
पड़ शरण भाग्य के, भाल के बल झुक जाएगा
हर कोई तेरे ऐंड़ पे रखकर पैर तुझे दिखलाएगा
कर्म के हाथों आँसू तू , पोंछता ही रह जाएगा
बतलाएगा औकात, कि था तू क्या,तो क्या रह जाएगा
क्या क्या करने तू आया था,क्या क्या करके तू जाएगा
जो होगा देखा जाएगा, तो देखता ही रह जाएगा ।।

जो होगा देखा जाएगा, तो देखता ही रह जाएगा
तेरे अंदर का ये दम्भ, करेगा मंद, राख हो जाएगा
ये भ्रष्ट करे चैतन्य, दिखे ना स्पष्ट, यूहीं भिड़ जाएगा
खुद ही खुद से लड़-लड़ करके,लथपथ होकर गिर जाएगा
थककर डरकर मढ़कर सबपर, दोषमुक्त हो जाएगा
पैर की जूती सिर पर रखकर, भाग खड़ा हो जाएगा
जो होगा देखा जाएगा, तो देखता ही रह जाएगा ।।

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© Arvind Maurya

बेताज बहाना

बिना ज्ञान के कर्म किए जा, जाकर डूब कहीं पर मर जा ।
मार-काट और त्राहि कर्म तो, कर्म से अच्छा पंगू बन जा ।
परनाले में पानी प्रवाहित, पर उसमे जीवन न मिलता ।
सद् से ग़र सम्बन्ध न हो तो, कर्म भला किस काम का करना ।
कर्म किए जा और जिये जा, सद्कर्मो पर जोर दिए जा ।

हर आतंकी-चोर-लुटेरा, भाग्य के सिर पर फोड़ ठीकरा ।
तान के सीना या रो रोकर, कर्म को अपने उचित ही कहता ।
जीवन जी ले खुश हो करके, पर दूजों का ख़्याल भी करले ।
कर्म किये जा सोच न उसमे, पर सद् का मिश्रण भी करले ।
कर्म किए जा और जिये जा, सद्कर्मो पर जोर दिए जा ।

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© Arvind Maurya

चेतन चेतक

अभी तो रात बाकी है,
नई शुरुआत क्या करना ।
पुरानी जंग जारी है,
नई आगाज क्यों करना ।
पुराने घाव ताजे है,
नए अब जख्म मत सहना।
दया का भाव है उत्तम ,
किफ़ायत से खरच करना ।
लकड़बग्घों की घड़ियाली,
सिसकती आह से बचना ।
पड़े जो पाँव ढीले तो,
पुनः इतिहास तुम पढ़ना ।
गुरु गोविन्द राणा सा,
तेज परताप तुम रखना ।
गुरु अर्जुन माँ सीता सा,
धैर्य को बाँध कर रखना ।
कर्म करना, धर्म धरना,
भाग्य के हाथ मत पड़ना ।
न कोई लोभ न लालच,
न ज्यादा फल की हो चाहत ।
बस अपनी आन की ख़ातिर,
उसी पहचान की ख़ातिर,
सुबह तक जान से लड़ना ।
अंत तक शान से लड़ना ।
इसी मिट्टी से जीवन है।
इसी मिट्टी में है मरना ।

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© Arvind Maurya

फुर्सत की बात

तुमको इतनी भी फुर्सत नही मिल रही,
खुदसे खुदके लिए बात कुछ कर सके ।

हाथ मे हाथ गैरों के रख कर चले,
अपने हाथों से पूंछा क्या चाहत उसे ।
दिल लगाने की कोशिश में दर-दर फिरे,
खुदके दिल से क्या पूंछा वो चाहे किसे ।

पलकों पे कितनों को ही बिठाते चलें,
बेवजह टाँग हरदम अड़ाते चलें,
चलते चलते लगी एक ठोकर गिरें,
बंद आँखों को मुजरिम बनाने लगे ।

तुमको इतनी भी फुर्सत नही मिल रही,
खुदसे खुदके लिए बात कुछ कर सके ।

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© Arvind Maurya

रंग रंजन

रंग की जो बात करूँ,
तीन ही तो है प्रधान ।
हरित- नील- लाल वर्ण,
चराचर है विद्यमान ।

सारे दृश्य-दृष्टि- सृष्टि,
इनसे मिलके खिलें आज।
भाव- कर्म- ज्ञान के हर,
कृत्य के ये कर्मकार ।

हरिया को हरिहर कर,
हरिहर को हरिया कर।
हरि हरित उपवन में,
ऋतुओं की लड़ियाँ भर।

पतझड़ में सूखा कर,
बारिश में गीला कर।
मधुमाद आते ही,
पुष्प विविध बढियाँ भर।

सुरचाप अम्बर में,
दृश्य एक विहंगम भर।
पदचाप आँगन में,
नववधू के रुनझुन कर।

तृष्णा जो आँखों मे,
सजल तृप्त नदियाँ भर।
हिय के झंझावत में,
झपक नृत्य उड़िया कर।

जीवन की क्रीड़ा में,
रंगों से लीला कर ।
कृष्ण पीत अम्बर में,
इन्दर को गीला कर ।

हर एक जीवन में,
मृतप्राय कण- कण में,
श्याम कभी श्वेत कभी,
बेरंग रंगीला कर।

भर- भर रंग भर कर कर,
रंग- भंग कर कर कर।
कभी कभी फीका कर,
कभी चटक-तीखा कर।

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© Arvind Maurya

गिरता ज्वार

ऐ जिंदगी, तू ही बता, क्यों है खफ़ा, क्या की ख़ता,
आँखों मे क्यू, पानी भरा, यूँ ना सता, अब दे बता,
ज़ालिम जहां, सारा यहां, तू भी न कर, मुझको जुदा,
मेरी साँस को, तेरी आस है,मेरे दिल को उसकी,चाह है
ऐ जिंदगी, ऐ जिंदगी, ऐ जिंदगी, ऐ जिंदगी…

मेरी आह में, वो नाम है, पर जिंदगी गुमनाम है
मेरी आह को आवाज दे, ऐ जिंदगी तू साथ दे
मेरी अर्ज तू स्वीकार ले, मेरे जिस्म में थोड़ी जान दे
मनहूसियत को त्याग के, होंठो को तू मुस्कान दे
ऐ जिंदगी, ऐ जिंदगी, ऐ जिंदगी, ऐ जिंदगी…

जरा याद कर उस दौर को,जब हम मिले उस मोड़ पर,
तूने दिया झकझोर कर, एक लात माँ के कोख पर,
वो खुश थी तेरी चोट पर, मेरी सिसकियों की शोर पर,
खामोश कर ग़र् जाएगी, मेरी माँ दुखी हो जाएगी
ऐ जिंदगी, ऐ जिंदगी, ऐ जिंदगी, ऐ जिंदगी…

तू उसका कुछ तो ख्याल कर,ऐ जिंदगी मुझे माफ़ कर
मेरे हाथ को तू थाम कर, मेरे अक्स पर कुछ काम कर
कुछ रंग इसमे झोंक दे, थोड़ी प्राणवायु धौंक दे
तेरा दास मैं बन जाऊँगा, तेरे गुण सदा मैं गाऊँगा
ऐ जिंदगी, ऐ जिंदगी, ऐ जिंदगी, ऐ जिंदगी…

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© Arvind Maurya