Category Archives: कविताएँ

जयति जननी जन्मभूमि

स्वर्ग की मुझको चाह नहीं,
न ही मुझे सम्मान दो।
फूल की माला नही चाहिए,
न ही मेरी जयकार हो।
मेरी लाश पे आँसू न हो,
ना ही कोई संताप हो।
माँ की आन की रक्षा खातिर,
सर्वस्व मेरा बलिदान हो।
जननी मेरी भारती,
और जन्म से भारत नाम हो।

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© Arvind Maurya

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रक्षा का बंधन

राखी का त्यौहार, कहानी बड़ी पुरानी है
शिशुपाल के वध से लेकर, शुरू कहानी है
पांचाल कुमारी ने बाँधी तब, पहली राखी है
बँधी थी पहली राखी जिनको,कृष्ण वो भाई है
दुस्सह दुःशासन जब आया , बन आततायी है
भ्राता कृष्ण ने तब बहना की, लाज बचाई है
तब से जो सिलसिला चला है,राखी का त्यौहार बना है
भाई-बहन के प्रेम-वचन का, राखी आज गवाह बना है

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© Arvind Maurya

धूल में बच्चा खड़ा है।

गरज रहा है बादल, जाने क्या पता, है आसमां ने की खता या डरा सहमा रो रहा है, खो रहा है मोतियों को ।
जो चुनी थी, सूर्य के संग, हवा से मिल।
उड़ रहा था जंगलो, गिरियों, पहाड़ो और समतल खेत बागानों के ऊपर।
दे रहा था छाँव धवला को धवल हो।
चर रही थी तिनके जो तपती दोपहरी।
खुशी से वो रेंकती थी, देख बादल को दुआएं दे रही थी।
डर रही है अब जो अपनी बाड़ में छिप आड़ में वो ताकती है जागती है फिर भी सपना मानती है।
रात की काली घटा को, जटा को लहरा रही जो, रो रही चिल्ला रही जो, सो रहे बच्चों के मन में, खौफ भरती जा रही।
आ रही बूंदे ज्यों छप्पर बेधती है, छेड़ती है राग मिलकर बर्तनों से, नर्तकों से थिरक पड़ते फेंकने को।
कोने में रक्खी हुई उस बाल्टी को, जो लबालब भर गया है, भर गया है, भर गया है, परे हट कितना बड़ा है, कितनों को भरना घड़ा है।
लगता है सूखा पड़ेगा,इससे ज्यादा क्या पड़ेगा,धूल में बच्चा खड़ा है,आँख में पानी भरा है।
बदरा, बालक, बाल्टी को-
आज क्यूं रोना पड़ा है ?
पानी क्यूं खोना पड़ा है ?
मोती क्यूं खोना पड़ा है ?

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© Arvind Maurya

महतारी

तू बड़ी ज़ालिम है, तू बड़ी जुल्मी है।

खुद की आहुति करके, तू नवजीवन रचती है।

हाँ तू ही कर सकती है, इतना सब सह सकती है।

पाती रहती है ज़ख्म कई, पर हँसती ही रहती है।

माँ तू ही कर सकती, खुद सूली चढ़ सकती है।

इतना सब सह सकती है, पर चूँ तक ना करती है।

तू सच मे ज़ालिम है, तू सच मे जुल्मी है।

मैं तेरा ही अंश जो ठहरी, कैसे बच सकती हूँ।

रीस-रीस कर जख्म तेरे, मुझे टीस से भरती है।

मैं हाथ पे धरकर हाथ, बात वो याद करती हूँ।

झुकाकर सिर दबा पलके, आँख से धार गिरती है।

भीगकर प्यार की बारिश में, मैं खुशहाल दिखती हूँ।

मैं तुझसे प्यार करती हूँ, पर न इजहार करती हूँ।

मैं तुझसे प्यार करती हूँ, मैं तुझको याद करती हूँ।

चाँद से दूर जानकर ही, चमक तारों की फबती है।

अमावस की ही रातों में , तू मुझसे बात करती है।

चमकती है दमकती है, निखरकर खूब दिखती है।

टिमक कर स्याह रातों का, तू यूं उपहास करती है।

तू बात करती है, मैं तुझको याद करती हूँ।

तू मेरी राह तकती थी, मैं तेरी राह तकती हूँ।

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© Arvind Maurya

की शान

हम तो खजाना नही मांगते ,हमको हक का दाम चाहिए।
आँख मिचौली बन्द करो अब, आर तो या फिर पार चाहिए।
हमको दया का पात्र न समझो, हमको तो सम्मान चाहिए।
सूट-सफारी भले न हो, पर धोती-कुर्ता साफ चाहिए।
कर्ज की माफी नही मांगते, कर्ज से हमको मुक्ति चाहिए।

मंडी ना बाजार चाहिए, मंदड़ियों से निजात चाहिए।
माघ में गर्मी देने वाली, रुपयों की थोड़ी ताप चाहिए।
हमको नौकर नही चाहिए, खुद के खेत मे काम चाहिए।
खुद के खेत के काम का हमको, पूरा-पूरा दाम चाहिए।
कर्ज की माफी नही मांगते, कर्ज से हमको मुक्ति चाहिए।

प्याज के आँसू रोने वालो, तुमको थोड़ा ज्ञान चाहिए।
वो तो मेरे ही आँसू है, जिनको तुम्हारी आँख चाहिए।
पीड़ा मेरे प्राण न हर ले, मुझको ऐसी ढाल चाहिए।
उखड़ रही इन साँसों को, मान का थोड़ा दान चाहिए।
कर्ज की माफी नही मांगते, कर्ज से हमको मुक्ति चाहिए।

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© Arvind Maurya

नीति

नीति नियंता नीति बनाते,

देश काल को दिशा दिखाते।

कहते धुरी राष्ट्र की हम है।

साख हमारी हम ही हम है।

पर यह भूल भयंकर भारी।

नीति देश को नही बनाती।

नियति और नैतिकता के बिन,

नीति पड़े-पड़े सुस्ताती।

इंतजार करती नियति का,

नैतिकता को पास बुलाती।

जब संयोग हुआ तीनो का,

छठा सुहानी बड़ी सुहाती।

गति राष्ट्र को ऐसी मिलती,

जैसे आँधी कोई तूफानी।

जन जन में उत्साह छलकता।

जैसे शावक कोई उछलता।

मिल कर सब तन-मन और धन से,

योगदान अपना देते ।

राष्ट्र और अपने विकास को,

सर्वस्व सभी अर्पित करते।

तभी एक भूमि का टूकड़ा,

सच मे राष्ट्र कहलाता है।

अपने स्वावलंबी जन पर,

फूला नही समाता है।

जन गण मन अधिनायक जय का,

गान तभी यह गाता है।

आगे बढ़ता जाता है,

बस आगे बढ़ता जाता है।

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© Arvind Maurya

क्या सही, क्या गलत ?

क्या सही क्या गलत का फरक
जाने देखने वाले कि नजर
क्या बयान देती है ये हलक
करके साजिश जुबा से मिलकर
क्या सही क्या गलत क्या सही क्या गलत

बंद आँखों के कर के पटल
सख्त तालों से दिल को जकड़
पालता फिर रहा है भरम
जीत जाएगा कल सारा जग
है भरम, कर शरम, जा समझ, क्या सही.. क्या गलत..

झूठ ही झूठ है हर तरफ
सत्य खोजता है खुदको दर-बदर
रार कर, हार कर, खुदको गुमराह कर
चल पड़ा है उस डगर, जिसपे झूठ राहबर
क्या सही क्या गलत क्या सही क्या गलत

खुदसे से खुदको मारकर, खुद पे खुदको लादकर
सत्य की लाश में, झूठ के प्राण भर
प्राण के भार सह, जिंदा लाश बन कर
सब्र को बाँध कर, साँसों को साधकर
चल रहा हूँ किधर ना पता, क्या सही.. क्या गलत..

जिंदा लाश बन कर, लाश के प्राण बन
चल रहा राह पर, मर रहा राह पर
अब न कोई है डर, न ही कोई भरम
गलत भी सत्य है, सत्य भी है गलत
क्या सही क्या गलत क्या सही क्या गलत

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© Arvind Maurya