Author Archives: ARVIND MAURYA

About ARVIND MAURYA

I am a student,full of confusions and emotions.Thinks about humans and humanity.Trying to discover something what i don`t know.

फेंकासुर

रोका कलम को किसने,
ताक़त   नही  है  तुझमे,
कहता   है    बंदिशें   है,
जिसे  थोपी  तूने खुदपे।

धोका मिला  फलक पे,
गिर  जाऊंगा  गगन  से,
कहता  है  पंख नाजुक,
जिसे  नोंचा तूने खुदसे।

मेरे  काँपते   कदम  ये,
हिम्मत  नही  है  तुझमे,
कहता   है   भेड़ियाँ  है,
जिसे  पाला तूने खुदसे।

कोई तुझसे क्या चुराए,
ओ  कौड़ियो  के महँगे।
ले  दे  के  एक  कटोरा,
तू   माँगता  है  जिसमे।

कोई तुझसे क्या छुपाए,
दो   आँख   वाले   अँधे।
सब    सामने   है    तेरे,
फिर भी वहम है मन में।

कहता है मोती- माणिक,
जड़वाऊंगा    महल   में।
थोड़ा   ईंट   पत्थरो   से,
ज़रा  नीव  पहले  भर ले।

कहता  है  रौंद   दूँगा,
दुनिया कदम तले मै।
घुटनो से पहले उठके,
पंजो  पे ज़रा चल ले।

उष्ट्रो कह दो उष्ट्रो उष्ट्रो

हम  दबा  दबा कर रह गए,
वे खोल खोलकर कह गए।
हम डाल पकड़ कर रह गए,
वे  पात- पात  पर  चढ़ गए।

हम खोद के कुआँ थम गए,
वे  बूँद- बूँद  हर  छक  गए।
हम अब- तब करते रहे गए,
वे ज्यों के त्यों सब कर गए।

हम  मर्यादा  में  बँध  गए,
वे खुला तमाशा कर गए।
हम  गाल  बढ़ाते  रह गए,
वे  थप्पड़  से मुँह रंग गए।

हम सच कहने से डर गए,
वे झूठ बोलकर अड़ गए।
हम  बाजू खोकर चुप रहे,
वे नख कटने पर लड़ गए।

हम  रण  में  गाँधी बन गए,
वे छल-बल से सब हर गए।
हम   राम  भरोसे  रह  गए,
वे  राम  नाम  सच कर गए।

हम  जाति-पात  में  बँट  गए,
वे दास बनाकर कर चल गए।
हम  तिलक  पोतते  रह  गए,
वे   लहू   से   धरती  रंग  गए।

हम मातृ शक्ति की पूजा में,
दिन  रात  निरंतर  रम गए।
वे बहू-बेटियों को नंगा कर,
हरम  खचाखच   भर  गए।

हम खुद ही मियाँ मिठ्ठू बन,
जयघोष  ही  करते  रहे गए।
वे काबुल और कंधार कराची,
बंग   भूमि   तक   बस   गए।

कामपंथी लिब्रांडू

तुम प्रश्न बड़े ही करते हो।
तुम खुद को ज्ञानी कहते हो।
क्यों गीत ये गाना ज़रूरी है?
क्या गान राष्ट्र की धुरी है?
क्या मुझको प्रेम नही माँ से?
क्या दर्शाना ये ज़रूरी है ?

अरे!………..
ये गान तेरे सम्मान में है,
हम लोगों की ही शान में है।
इन नदियों के आभार पे है,
इन वृक्षों की शीतल छाँव पे है।
कोई धरती माँ थोड़े ही है,
तू ही माँ भी है, तू ही बाप भी है।
तू इतनी बात न समझ सका,
किस बात का तुझको गुमान ये है।

क्यों, क्या, कब, कैसे, कहते हो,
तुम प्रश्न नए नित गढ़ते हो,
दूजों पर मढ़ते रहते हो,
भीतर से कुढ़ते रहते हो।
सम्मान तुम्हारा कहीं नहीं,
बस भौं भौं करते रहते हो।

अरे!…………..
एक समाधान बतला दो तुम,
एक राह जरा दिखला दो तुम।
क्षणभर में पंगू चंगा हो,
इस उपचार बता दो तुम।
मैं नतमस्तक ही जाऊंगा,
तुम्हे पुष्पहार पहनाऊंगा,
तब तेरे सारे प्रश्नों का,
अनुमोदन मैं कर जाऊंगा।

पर नशे में होकर धुत्त दुष्ट,
नव परिभाषाएं रचते हो।
वो समझ से मेरे परे रहीं,
तुम खुद भी कहां समझते हो।
दायित्व से होकर मुक्त दुष्ट,
अधिकार की आशा रखते हो।

जिस थाली में भोजन करते,
तुम छेद उसी में करते हो।
काले को उजला कहते हो,
उजले को काला कहते हो।
जब भी मुँह से कुछ बकते हो,
बस हाय रे तौबा कहते हो।

हथियार थमा कर बच्चों को,
तुम देश अस्थिर करते हो।
लाल सलामी दे देकर,
इस देश को छलनी करते हो।
रक्तपिपाशु  दानव  तुम,
मानवाधिकार पर लड़ते हो।

संविधान की रक्षा का तुम,
स्वांग खूब क्या रचते हो।
जला मशाले, लगा के नारे,
टुकड़े- टुकड़े कहते हो।
बाबा-बापू की ओट में छिप,
तुम वार उन्ही पर करते हो।

काँव काँव कू कू

इच्छओं  के  बीज  कहाँ  कभी  मरते है,
जो लड़ते है  सुखभोग वही तो करते हैं।
इच्छओं  के  दास  जो  बनकर  रहते  हैं,
भोग-भोग सुख, सुख से वंचित रहते हैं।

समय से लड़ कर सत्य राह जो चलते है,
समय को  करके बस  में राह वे गढ़ते हैं।
समय  देख  गदहे  को  बाप जो कहते है,
बिना  लड़े  ही  जग  को बस में करते हैं।

बस  अपनी  अपनी जो कर्तव्य फिरते है,
कुल  के  नाश  का कारण वे ही बनते हैं।
बस अपना गुण-दोष जो  परखा करते है,
कुल  के  भाग्य  विधाता  वे  ही  बनते हैं।

आँख  मूंदकर  कदमताल  जो  करते है,
खाकर  ठोकर  औंधे  मुँह  वे  गिरते  हैं।
आँख  खोलकर  दिवास्वपन जो रचते है,
सत्य के सम्मुख सिर पर हाथ पटकते हैं।

चाँद पे रखकर पैर जो उछला करते है,
धरती  पर  घुटनो  के बल वे चलते हैं।
घुटनो  पर  भी  जो टक्कर दे सकते है,
वही  निखरकर  चाँद  सितारे बनते हैं।

देख  तमाशा  ताल जो ठोंका करते है,
बने तमाशा आज वे खुद ही फिरते हैं।
देख  तमाशा फाँस  जो फेंका करते है,
बने   मदारी   नाच   नचाया  करते  है।

शेर  खाल  में  भेड़  राज जो करते है,
आफत सिर आते घिघियाने लगते हैं।
शेर  मगर  से  बैर  जो जल में करते है,
अगर मगर के बिना मृत्यु से मिलते हैं।

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© Arvind Maurya

धुर धुरी

बिन आलोचना सम्मान में क्या रखा है।
बिन अपयश के यशगान में क्या रखा है।
बिन आँसू के चीत्कार में क्या रखा है।
बिन अठ्ठाहस उपहास में क्या रखा है।

बिन लगे भूख के पकवान में क्या रखा है।
बिन कड़वाहट सुस्वाद में क्या रखा है।
बिन साजन के श्रृंगार में क्या रखा है।
बिन रंगों के सुरचाप में क्या रखा है।

बिन ढले रात के प्रभात में क्या रखा है।
बिन तारो के आकाश में क्या रखा है
बिन लगे धूप के छाँव में क्या रखा है।
बिन पत्तो के बागान में क्या रखा है।

बिन माँ बाप के परिवार में क्या रखा है।
बिन अपराध के इंसाफ में क्या रखा है।
बिन हैवानियत इंसान में क्या रखा है।
बिन मर्यादा श्रीराम में क्या रखा है।

बिन सजे धार के तलवार में क्या रखा है।
बिन लहरों के पतवार में क्या रखा है।
बिन आघात के उपचार में क्या रखा है।
बिन चाहत के उत्साह में क्या रखा है।

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© Arvind Maurya

निरखते लिखते

खुद को लिखते रहो, खुद से कहते रहो ।
कुछ तो लिखते रहो, कुछ तो कहते रहो ।

प्यार-तकरार  लैला   या   मजनू  पे हो
रात   काली अंधेरी   या   जुगनू   पे हो
रात  दिन  शाम  चढ़ती  दोपहरी  पे हो
बहती कल-कल नदी या उफनती पे हो
खुद को लिखते रहो, कुछ तो कहते रहो ।।

बन सिपाही कलम लेके लड़ते रहो
बिन डरे  धीर  धीरे  से  चलते  रहो
घुटनो पर ही सही, आगे बढ़ते रहो
नित  निरंतर  नए  दाँव  चलते रहो
खुद को लिखते रहो, कुछ तो कहते रहो ।।

धार कर वार कर  जख्म  करते रहो
भ्रष्ट लंका दहन  कर के  चलते बनो
इस लगन की अगन में यूँ जलते रहो
सुध  रहे  न  रहे   बोध   करते  चलो
खुद को लिखते रहो, कुछ तो कहते रहो ।।

रस  अलंकर  छंदो  को   चखते  रहो
बिन  विशेषण  के  भी रास रचते रहो
सब लुटा के भी अव्यय से दिखते रहो
कर्म  करके   क्रिया   में  निखरते  रहो
खुद को लिखते रहो, कुछ तो कहते रहो ।।

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© Arvind Maurya

भ्रमित भस्मित भूप

जो होगा देखा जाएगा, तो देखता ही रह जाएगा
पड़ शरण भाग्य के, भाल के बल झुक जाएगा
हर कोई तेरे ऐंड़ पे रखकर पैर तुझे दिखलाएगा
कर्म के हाथों आँसू तू , पोंछता ही रह जाएगा
बतलाएगा औकात, कि था तू क्या,तो क्या रह जाएगा
क्या क्या करने तू आया था,क्या क्या करके तू जाएगा
जो होगा देखा जाएगा, तो देखता ही रह जाएगा ।।

जो होगा देखा जाएगा, तो देखता ही रह जाएगा
तेरे अंदर का ये दम्भ, करेगा मंद, राख हो जाएगा
ये भ्रष्ट करे चैतन्य, दिखे ना स्पष्ट, यूहीं भिड़ जाएगा
खुद ही खुद से लड़-लड़ करके,लथपथ होकर गिर जाएगा
थककर डरकर मढ़कर सबपर, दोषमुक्त हो जाएगा
पैर की जूती सिर पर रखकर, भाग खड़ा हो जाएगा
जो होगा देखा जाएगा, तो देखता ही रह जाएगा ।।

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© Arvind Maurya

बेताज बहाना

बिना ज्ञान के कर्म किए जा, जाकर डूब कहीं पर मर जा ।
मार-काट और त्राहि कर्म तो, कर्म से अच्छा पंगू बन जा ।
परनाले में पानी प्रवाहित, पर उसमे जीवन न मिलता ।
सद् से ग़र सम्बन्ध न हो तो, कर्म भला किस काम का करना ।
कर्म किए जा और जिये जा, सद्कर्मो पर जोर दिए जा ।

हर आतंकी-चोर-लुटेरा, भाग्य के सिर पर फोड़ ठीकरा ।
तान के सीना या रो रोकर, कर्म को अपने उचित ही कहता ।
जीवन जी ले खुश हो करके, पर दूजों का ख़्याल भी करले ।
कर्म किये जा सोच न उसमे, पर सद् का मिश्रण भी करले ।
कर्म किए जा और जिये जा, सद्कर्मो पर जोर दिए जा ।

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© Arvind Maurya

चेतन चेतक

अभी तो रात बाकी है,
नई शुरुआत क्या करना ।
पुरानी जंग जारी है,
नई आगाज क्यों करना ।
पुराने घाव ताजे है,
नए अब जख्म मत सहना।
दया का भाव है उत्तम ,
किफ़ायत से खरच करना ।
लकड़बग्घों की घड़ियाली,
सिसकती आह से बचना ।
पड़े जो पाँव ढीले तो,
पुनः इतिहास तुम पढ़ना ।
गुरु गोविन्द राणा सा,
तेज परताप तुम रखना ।
गुरु अर्जुन माँ सीता सा,
धैर्य को बाँध कर रखना ।
कर्म करना, धर्म धरना,
भाग्य के हाथ मत पड़ना ।
न कोई लोभ न लालच,
न ज्यादा फल की हो चाहत ।
बस अपनी आन की ख़ातिर,
उसी पहचान की ख़ातिर,
सुबह तक जान से लड़ना ।
अंत तक शान से लड़ना ।
इसी मिट्टी से जीवन है।
इसी मिट्टी में है मरना ।

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© Arvind Maurya

फुर्सत की बात

तुमको इतनी भी फुर्सत नही मिल रही,
खुदसे खुदके लिए बात कुछ कर सके ।

हाथ मे हाथ गैरों के रख कर चले,
अपने हाथों से पूंछा क्या चाहत उसे ।
दिल लगाने की कोशिश में दर-दर फिरे,
खुदके दिल से क्या पूंछा वो चाहे किसे ।

पलकों पे कितनों को ही बिठाते चलें,
बेवजह टाँग हरदम अड़ाते चलें,
चलते चलते लगी एक ठोकर गिरें,
बंद आँखों को मुजरिम बनाने लगे ।

तुमको इतनी भी फुर्सत नही मिल रही,
खुदसे खुदके लिए बात कुछ कर सके ।

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© Arvind Maurya