महतारी

तू बड़ी ज़ालिम है, तू बड़ी जुल्मी है।

खुद की आहुति करके, तू नवजीवन रचती है।

हाँ तू ही कर सकती है, इतना सब सह सकती है।

पाती रहती है ज़ख्म कई, पर हँसती ही रहती है।

माँ तू ही कर सकती, खुद सूली चढ़ सकती है।

इतना सब सह सकती है, पर चूँ तक ना करती है।

तू सच मे ज़ालिम है, तू सच मे जुल्मी है।

मैं तेरा ही अंश जो ठहरी, कैसे बच सकती हूँ।

रीस-रीस कर जख्म तेरे, मुझे टीस से भरती है।

मैं हाथ पे धरकर हाथ, बात वो याद करती हूँ।

झुकाकर सिर दबा पलके, आँख से धार गिरती है।

भीगकर प्यार की बारिश में, मैं खुशहाल दिखती हूँ।

मैं तुझसे प्यार करती हूँ, पर न इजहार करती हूँ।

मैं तुझसे प्यार करती हूँ, मैं तुझको याद करती हूँ।

चाँद से दूर जानकर ही, चमक तारों की फबती है।

अमावस की ही रातों में , तू मुझसे बात करती है।

चमकती है दमकती है, निखरकर खूब दिखती है।

टिमक कर स्याह रातों का, तू यूं उपहास करती है।

तू बात करती है, मैं तुझको याद करती हूँ।

तू मेरी राह तकती थी, मैं तेरी राह तकती हूँ।

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© Arvind Maurya

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