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पहला दिन पहला स्कूल।

आजादी की खुशी थी सबको,अगस्त की पंद्रह तारीख थी वो।
सब झंडा फहराते थे।,आजादी की खुशी मानते थे।

पहला दिन मुझे काट रहा था, नया नया दाखिला हुआ था।
सब मुझको यों ताक रहे थे,ज्यों शिकार को भांप रहे थे।

पहली बार घर के अलावा, इतनी देर कहीं ठहरा था।
आजादी ने मानो आकर, मुझको खुद में जकड़ा था।

कहाँ रुकना कहाँ चलना है, सबकुछ नीयत निश्चित था।
माँ की गोद का अनायास ही, चित्र पटल पर उभरा था।

जैसे जंगल मे कोई शावक,अपनी माँ से बिछड़ा था
वैसे ही इस भेड़ भीड़ में, मैं भी जाकर अटका था।

आँख में पानी आ तो गया था,पर मैं उसको दबा रहा था।
साँस चढ़ाकर, ओठ दबाकर, खुद को रोके रखा था।

भला नदी भी रुकती है क्या,चट्टानों के आने से।
मेरे आँखो के आँसू भी,भला क्यो रुकने वाले थे।

पलको की पतवार टूटी, आँसू के सैलाब से
मेरे पहले स्कूल की, ये पहली दास्तान है।

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© Arvind Maurya

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