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लड़खड़ाकर

जब कदम यूँ ही बढ़ें, लड़खड़ा कर ही सही।
तय करे एक फासला, गिरते- पड़ते ही सही ।

भाग्य से या भूल से, या कर्म और पुरुषार्थ से ।
पहुंचे उस मंजिल जहाँ पर, पहुंचा ना कोई अभी ।

खोल दें वो आसमाँ , जो कभी दिखा नहीं।
नाप दे वो रास्ता, जिसपे कीले थी बिछी

चले उसपर कारवाँ कई, बांधकर पर हौसलों के।
भेदने को लक्ष्य वो जो, अब तलक बिंध सका नहीं।

पाने को उस आरजू को, कसक जिसकी उठ रही।
देखने को कब से जिसको, आँखे प्यासी तड़प रही।

कदम यूँ ही बढ़ते बढ़ते….
लड़खड़ा कर चलते चलते….

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© Arvind Maurya

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