वो मंजर ।

हाथ के लिखें पर कोई काबू नही।
माथे की सिलवटे वापस जाती नही।
जो मंजर गुजर कर निकल जाता है।
वो घड़ी लौट कर फिर है आती नही।

वो हँसी, वो खुशी, माँ के गोद की लोरी।
वो परियाँ, वो बगियाँ, वो चाँदनी रतियाँ।
अब भूलकर कहीं भी नज़र आती नही।
जो मंजर गुजर कर निकल जाता है।
वो घड़ी लौट कर फिर है आती नही।

अब खंजर सभी मन मे धर कर फिरे।
दूजे को जज्ब करने की फिदरत भरे।
और मंजर कभी सामने वो दिखे।
तब याद आते है दिन जो रंगीन थे।
जब रंगों से सिकवे-गिले मिटते थे।

मंजर वैसा ही है, रंग भी लाल है।
रंगों से अबभी मिटते गिले-सिकवे है।
पर रंगीनी अब थोड़ी गाढी हुई।
लाल रंग का जगह है लहू ले गई।

लोगो की प्यास अब रोके रुकती नही।
धरती भी प्यास से अब तड़प है रही।
ये सब इंसानो की कारस्तानी ही है।
जो धरती का भी सारा जल पी गई।

वो लबा लब भरी, साफ सुथरी नदी
अब कहीं देखने को, है मिलती नही
वो जो मंजर गुजर कर निकल जाता है।
वो घड़ी लौट कर फिर है आती नहीं।

______________________________________

© Arvind Maurya

Advertisements

7 thoughts on “वो मंजर ।

  1. Madhusudan

    मंजर वैसा ही है, रंग भी लाल है।
    रंगों से अबभी मिटते गिले-सिकवे है।
    पर रंगीनी अब थोड़ी गाढी हुई।
    लाल रंग का जगह है लहू ले गई।
    bahut khub likha hai.

    Liked by 1 person

    Reply
  2. Pankh

    बहुत ही सुंदर रचना है । एक माँ के त्याग की बहुत ही सुंदर व्याख्या दी है आपने।

    Liked by 1 person

    Reply

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s