तुम्हारा मिलना ।

तुम्हारा मिलना हवा का झोंका

सुकून देता या मेरा धोखा।

बहे बसंती बयार जैसी

कभी शरद की तुषार जैसी।

यूँ तेरा चलना, यूँ तेरा मिलना

तड़प-सुकूँ से मन का पिघलना।

जो मन को छूकर बिखेर देता

तब घाव भी है सुकून देता।

तेरे छुअन का एहसास मुझको

जीने भी देता, मरने को कहता।

तेरे लटो की घटा में छिपकर

बूँद बनकर लुढ़क हुँ पड़ता।

बूँद होकर भी, मैं प्यासा ठहरा

दूजे के मन को, तर कैसे करता।

यूँ दूर जाकर, तुझे भुलाकर

क्या मैं कभी भी, सुकूँ से सोता।

मेरी वफ़ा में कुछ तो कमी थी

तभी यूँ रुकसत होना पड़ा था।

अब मेरी साँसे, ना साथ देती

तुमसे मिलने को ही थी चलती।

तुम्हारा मिलना हवा का झोंका

जहां से जाकर भी याद होगा।

तुम्हारा मिलना…

तुम्हारा मिलना…

______________________________________

© Arvind Maurya

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3 thoughts on “तुम्हारा मिलना ।

    1. ARVIND MAURYA Post author

      नमस्कार भैया जी
      माँ सरस्वती जिस ओर बहा ले जाए, उसी ओर रूख हो जाता है। आप का आशीर्वाद और प्रोत्साहन भी इसमें जुड़ा हुआ है। बहुत बहुत शुक्रिया

      Like

      Reply

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