सलीक़े का सबक़।

“अरे! भई सलीक़ा नाम की भी कोई चीज़ होती है। कौन-सी चीज़ कब, कहाँ, कैसे रखें ये सलीक़ा कब सीखोगें आप लोग। सलीक़ा होने पर सहूलियत होती है भई। लगता है मेरे कब्र में जाने के बाद ही ये सलीक़ा आपलोग सीख पाऐंगे।” आज बाबा जी की कही हुई यह बात मुझे अनायास ही नही याद आ गई थी। आँखो में थोड़ा पानी आने से आँखो की चमक बढ़ गई थी लेकिन मेरा दिल जैसे अँधेरे कुँए में डूबा जा रहा था। बात ही कुछ ऐसी थी कि आज बाबा याद आ ही गए। आज का दिन मेरी जिंदगी के सबसे बड़े दिनों में से था और समय मुझको सलीके की अहमियत बताने पर उतारू था। हुआ यूं था कि आज मेरा साक्षात्कार था! सिविल सेवा का साक्षात्कार! मेरे सपनों का वास्तविकता से साक्षात्कार। लेकिन मेरे दस्तावेजों की फाइल कही दिख नहीं रही थी। बिस्तर, आलमारी, रसोई, हर जगह तलाश किया लेकिन फाइल नदारद थी। अभी रात में सोते वक्त सब बिस्तर पर ही तो पड़ा हुआ था। रात भर में फ़ाइल को पंख तो नही लग गए।

जैसे जैसे समय बीत रहा था, वैसे वैसे मेरी धड़कन बढ़ती जा रही थी। पूरे घर मे कोहराम मचा हुआ था। कोई भी अपने को कोलम्बस से कम नही समझ रहा था। खोजी अभियान बहुत ही जोर शोर से चल रहा था। हर पल कोई न कोई आँखो में चमक लिए मेरे हाथ मे एक काजग थमाकर पूछता,” ये हैं क्या?”और मैं जैसे ही ना मे सिर हिलाता तो ऐसा लगता उनके हाथ में पड़ा ओलंपिक का गोल्ड मेडल मिट्टी का लोंदा हो गया हो। जैसे जैसे सूरज चढ़ रहा था वैसे वैसे मेरा हृदय डूबा जा रहा था। जैसे जैसे जाड़े का सूरज कोहरे को काट कर रौशनी बिखेर रहा था वैसे वैसे मेरे मन मे अंधकार पसरे जा रहा था। सभी बदहवास से हो गए थे, किसी को कुछ सूझ नही रहा था। घर का चप्पा चप्पा खंगाला जा चुका था। कोई ढांढस बढ़ा रहा था तो कोई मुझे निशाने पर ले रहा था। “भाई एक फ़ाइल नहीं संभाल सकते जिला क्या ख़ाक संभालेंगे। हो न हो इसमे इनके किसी मित्र का हाथ है। वे आवारा क्यों चाहेंगे कि इसका भला हो। अरे अंदर ही अंदर किसी की कोई जलन रही होगी, आज मौका देखते ही लपक लिया।” देखते ही देखते मुझसे पूछताछ शुरू हो गई,”कल कौन कौन मुझसे रात में मिलने आया था, कब गया कैसे गया, किसका घर कहाँ हैं, आदि आदि।” मैं भी झल्ला गया। थोड़ा चीखते हुए, थोड़े ही शब्दों में मैने सबका प्रतिकार किया,”रात को सोते वक्त दस्तावेजो की फ़ाइल मेरे बिस्तर पर ही थी; अनर्गल बात न करे; न मैं नशा करता हूँ और ना ही अंधा हूँ।”

आज तो दोपहरी से पहले ही सूर्यदेव बहुत तेज चमक रहे थे मानो मुझपर मुस्कुरा रहे हो। जाड़े की धूप सबको बड़ी सुहानी लग रही थी लेकिन मैं पसीने से तर-बतर हुए जा रहा था। मन मानने को तैयार ही नही था कि मैं साक्षात्कार नही दे पाऊंगा। एक बार फिर से मैंने सारा घर उलट पलट दिया लेकिन परिणाम ढाक के तीन पात ही निकला। बाहर भाभी का छोटा लड़का चीख चीख कर रो रहा था और अंदर मैं अंदर ही अंदर दहाड़े मार कर चीख रहा था। तभी मुख्य दरवाजे पर एक गाड़ी आकर रुकी और लगातार हॉर्न मारने लगी। मैं लपककर मुख्य दरवाजे की ओर बढ़ता हूँ तो बेचैनी और भी बढ़ जाती है क्योंकि ये तो छुटकी की स्कूल वैन थी। बिना समय वैन के आने से मेरे मन में आशंकाओं के बादल और भी गहरा गए। छुटकी के स्कूल की छुट्टी तो 1:30 बजे होती है और अभी तो 10:30 ही बजे थे। इस वक्त मैं अपने साक्षात्कार के बारे में सबकुछ भूल चुका था, बस मन ही मन छुटकी के कुशल की प्रार्थना कर रहा था। मुख्य द्वार के झरोखे से देखता हूँ तो वहाँ पर उल्टी तरफ मुँह करके कोई महिला खड़ी थी। उन्होंने सफेद साड़ी पहन रखी थी। एकबार को मेरा कालेज धक कर गया, आशंकाएं पुख्ता रूप अख्तियार करने को आमादा थी पर मन के एक कोने में अभी भी आशा थी।

ऐसा हम सब के साथ होता है कि जब कभी कोई अनहोनी हो जाती है उसके कुछ दिनों तक हर काम मे किसी अनहोनी का भय लगा ही रहता है। भले ही उसके लिए कोई पुख्ता कारण न हो फिर भी एक संशय बना रहता है। यहाँ तो एक अनहोनी अभी हो ही रही थी उसपर ऐसा आकस्मिक संयोग मन को विचलित करने वाला ही होता है।

बाहर जाने पर देखता हूँ कि वो तो छुटकी के स्कूल की प्रधानाचार्या है। मैं उनसे कुछ पूछता उससे पहले उन्होंने मुझपर सवाल दाग दिया,” आपको पता है छुटकी आज स्कूल क्या लेकर आई थी? आपलोग कैसे अभिभावक है? बच्चो का थोड़ा भी ख्याल नही की बच्चा क्या करता है? हम लोग सबकुछ तो सीखा नही सकते, थोड़ा सलीक़ा तो आपलोग भी सीखा ही सकते है। आप लोग…” उनकी बात को बीच में ही काटकर मैनें पूछा,”छुटकी कहाँ है? छुटकी हैं कहाँ?” उनको मेरे सवाल का जवाब देने की ज़रूरत नही पड़ी। मेरा जवाब मेरे सामने आ चुका था। वैन के पिछले दरवाजे से छुटकी उछलते-कूदते बाहर आई । मेरी खुशी का कोई ठिकाना नही था। मैंने छुटकी को उठाकर आसमान में उछाल दिया फिर सीने से लगाकर दुलारने पुचकारने लगा। पलकों के दरवाजों ने आंसुओ का जो सैलाब रोका हुआ था वो अब उनसे और नही रोका गया। बाँध का फाटक टूट चुका था जिसने आँखो और चेहरे को आँसुओ के सैलाब से तर कर दिया। मेरा सारा बोझ जैसे उतर गया था। अब मन बहुत ही हल्का हो गया था, दिल मे एक सुकून था। अब मुझे अपने दस्तावेजों के खोने और साक्षात्कार के न होने का कोई गम नही था। मेरी छुटकी मेरे सामने जो थी।

तभी वैन का दरवाजा बंद होने की धपाक की आवाज के मेरा ध्यान उस तरफ आकृष्ट किया। प्रधानाचार्या वैन में बैठ चुकी थी। मै प्रश्नवाचक दृष्टि से उनकी तरफ देखकर प्रश्न फेंकने ही वाला था लेकिन उससे पहले उन्होंने मुझे जवाब थमा दिया। उस वक्त प्रधानाचार्या मुझे साक्षात माँ सरस्वती का अवतार लग रही थी। जब वो मेरे दस्तावेज की फ़ाइल मुझे दे रहीं थीं तब फ़ाइल से टकराकर सूर्य की जो किरणे मुझपर पड़ रही थी वो ऐसी लग रही थी मानो उनके हाथ से एक तेज प्रस्फुटित होकर मुझपर पड़ रहा हो और मुझे अपने आशीर्वाद से अभिसिंचित कर रही हो। जब उन्होंने हाथ हिलाकर जाने का इशारा किया तो लगा मुझे तथास्तु कहकर मनोकामना पूर्ण होने का वरदान दे रही हो।

गाड़ी के जाते ही मैं सरपट भागा, झटपट तैयार हुआ और कुछ ही देर में मेरी गाड़ी शाहजहाँ रोड पर फर्राटे भर रही थी। मेरा मन हल्का था। न कुछ खोने का डर था, न कुछ पाने का उतावलापन। मैं अपनी मोटरसाइकिल पर सवारी का मजा ले रहा था। धूप और चटक हो गई थी और मेरा मन भी…

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© Arvind Maurya

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