रक्षा की हकीकत

ये धागा कैसे बनता है, इसमे ऐसा क्या रखा है
जो सबकी रक्षा करता है, चाहे बूढ़ा हो या बच्चा है
सब इसको धारण करता है,यह सबको अच्छा लगता है
मैं ऐसा सोचा करता था, जब नन्हा सा एक बच्चा था
मैं आज सयाना हो हूँ गया,पर प्रश्न वो अब भी उठता है
हाँ रूप है उसका बदल गया, पर मूल तो पहले जैसा है
ये बहन की रक्षा करता है, ऐसा कैसे हो सकता है
यह सूत्र बँधाकर मैं केवल, कोरा वादा कर सकता है
उसके रक्षा का भार सदा, दूजे भाई पर रहता है
जो ऐसे ही अपनी बहना से, बस कोरा वादा करता है
जो समझ सको तो समझो, जो मान सको तो मानो
अपनी बहना के समान, दूजों की बहन को मानो
यह बात मेरी सब मानो, मन मे धर कर गंठिया लो
मन मे धर कर गंठिया लो, यह बात मेरी सब मानो

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© Arvind Maurya

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