क्या समय ?

भाव पड़ जाते है फिके

चढ़ समय की नाव पर

घाव रह जाते खंरोचे

चढ़ समय की नाव पर

गम खुशी में नम हो आँखे

सुख जाती आज कल

धनी-निर्धन, सबल-निर्बल

हो समय की नाव चढ़

प्रेम कितना भी हो गहरा

छिछला हो इस नाव चढ़

द्वेष कितना भी गहरा

छिछला हो इस नाव चढ़

नदियाँ भी बदले है धारा

सूर्य का भी ताप वारा-

न्यारा चढ़ इस नाव पर

धड़कने भी रुकके चलती

है समय लय ताल पर

सब है स्थिर, सब है गति में

समय की भावधार में

यह समय है हलाहल विष

यह समय है सोम रस भी

करता सब कुछ है व्यस्थित

करता नित नव तांडव भी

देता जीवनदान निस दिन

करता प्राणाहार निस दिन

समय ही भगवान है प्रिय

समझ इसकी चाल को प्रिय

वैसा ही कर काम तू प्रिय

इसका कर सम्मान तू प्रिय

पाएगा सम्मान तू प्रिय

______________________________________

© Arvind Maurya

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