उजाले का अंधकार

समय आज कुछ ऐसा आया

मानव ही मानव की खातिर

घोर समस्या लेकर आया

चहूँ ओर सब चीख रहे है

चौक सड़क और गलियों में

मानवता नंगी नाचे है

धनपति की कोठरियों में

खेत, मेढ़ और पगडंडी पर

बैठ कृषक कर रहा विलाप

तख्त लगाकर हुक्का पीता

गाँव का मुखिया ससम्मान

सड़क किनारे अंधियारे में

भूखे नंगो की है फौज

चिलम पीकर फूंक उड़ाता

उसी में करता रहता मौज

पर अंधियारे कोने में जब

बच्चा इक चिल्लाता है

अपनी माँ से एक निवाले

की दरकार लगाता है

उसी वेग से उत्तर आता

सजे सुसज्जित शब्दों में –

माँ को खाकर पेट भरा ना

चीर कलेजा मेरा खा जा

टर्र टर्र करता रहता है

तू भी क्यूँ न अब मरता है

थोड़ी आगे कुछ अधनंगे

बच्चे बैठे क्रीड़ा करते

खेल समझ मै न पाया पर

दाँत थे उनके खिले खिले

सो मैनें भी मान लिया कि

होंगे कुछ मनोरंजन करते

चार कदम ही आगे आया

यहाँ की क्रीड़ा देख लजाया

देह को दो से एक बनाकर

वय लोगो ने खेल रचाया

सधे कदम से भभके मन से

मैंने हल्का दौड़ लगाया

उनसे कुछ दूरी पर आकर

मैने थोड़ा राहत पाया

आँधियारे का रूप देखकर

उजियाले की ओर बढ़ा

जहाँ खड़ी थी सुन्दर कोठी

फबता था ये रूप नया

कोठी के आगे थी गाड़ी

बगल में जन थे चार खड़े

ऊँची बाते धीमी करते

समझ से मेरे जो थीं परे

मेरा ठिठक ठिठक कर चलना

शायद उनको न भाया

तनी हुई भौहों से सबने

देखके नजरों से धमकाया

कोठी के आगे , ठिठक के चलना

होगा कोई पाप बड़ा

तभी तो जो जन चार खड़े थे

मुझपर ऐसे घूर पड़े

मैने अब सरपट चलना

सोंच यही कर दिया शुरू

अगली कोठी बड़ी निराली

इसकी छठा मनोहर वाली

रंग बिरंगी सजी हुई थी

भड़कीले रंगों से पुती थी

रंग-बिरंगी झालर लड़ियां

ऊपर से नीचे लटकी थी

कुछ लोगो का झुंड जमा था

हँस हँस कर बाते करता था

समां बड़ा रंगीन जमा था

लगता है विवाह पड़ा था

चर-मर की आवाजे करता

एक छोटा सा गेट खुला था

मेरा विस्मय थोड़ा बढ़ा था

क्योंकि बड़का गेट वहाँ का

पहले से ही खुला पड़ा था

सहसा दो जन बाहर आए

उस छोटे दरवाजे से

लटकाए थे बड़े कनस्तर

दोनो अपने हाथों में

उन दोनों ने हाथ हिलाकर

मुझको अपने पास बुलाया

खाना बचा हुआ लाए है

क्या तू है खाने आया

शकल देख औकात नापकर

उन दोनों ने बतलाया

फिज़ा में खुशबू भोजन की जो

अभी अभी फैली ही थी

नाक से मेरी नोंक झोंक कर

दिल मे जा बैठी ही थी

सोचा खा ही लेता हूँ

कौन जानता मुझे इधर

जो रात गई सो बात बिसर

तभी रात के सन्नाटे को

चीर उधर, उस दूर तरफ से

कुछ आवाजे आती है

कुछक्षण में उन झिलमिल

सायों के दर्शन होते है

ये तो कोई और नही, उस अंधियारे के बच्चे थे

जो मुदित- प्रसान्नित होकर के, सड़क किनारे बैठे थे

अब जान गया वे खेल वहाँ, बैठे-बैठे क्या रचते थे

जान व्यवस्था भोजन की वे, हँसते और ठिठकते थे

बैठ वही पर सड़क किनारे, सबने छककर पेट भरा

उनकी क्षुदा की तृप्ति से, मेरा भी थोड़ा पेट भरा

चलते-चलते मोड़ आ गया

देखा तो बड़ी दूर आ गया

भवन, महल सब छूट गए थे

हरियाले अब खेत दिखे थे

पवन झकोरे मस्त चलाती

हरियाली फसलें लहराती

कीट-पतंगे गुन-गुन चुन-चुन

कर ऐसा संगीत बजाते

जैसे कोई विसद गुरुजन

मिल जुलकर संगीत रचाते

ऊपर कुछ बादल दिखते थे

चाँद से लूका-छीपी करते

तारे भी टिमटिम कर करके

आपस मे बाते करते थे

दूर क्षितिज पर, तभी वहाँ पर

हल्की सी लाली छाई

सूर्य देव के आने का

प्रथम संदेशा लेकर आई

सूर्य देव की धमक देखकर

सब फिके पड़ने वाले है

चाँद, सितारे, जुगनू, भौरे

सब के सब छुपने वाले है

शीतल मंद पवन जो बहती

मन को करती मुदित बड़ा

सूरज की बातों में आकर

रूप धरेगी रौद्र बड़ा

दोपहरी के आते आते

हर लेगी सुख चैन बचा

गाँव किनारे जब था आया

सन्नाटा पसरा था पाया

हवा बगल से जो गुजरी थी

भाँय-भाँय की ध्वनि करती थी

घर छप्पर सब जले हुए थे

काली राख के ढेर हुए थे

मरघट का सा रूप धरे थे

बस कुछ कुत्ते भौंक रहे थे

जले मरे पशुओ के लोथड़े

कुत्ते कौंवे नोंच रहे थे

काँव-काँव भौ-भौ की ध्वनि मिल

तांडव का सुर छेड़ रहे थे

जले मरे पशुओं की बदबू

जी मेरा मिचलाती है

साँस जो अंदर बाहर होती

लगता रुकने वाली थी

समझ न आया हुआ यहाँ क्या

बरपा किसका कहर यहाँ था

भूल थी या फिर दुर्घटना था

या मानव-मानव से लड़ा था

या उसको लड़वाया गया था

या इससे कुछ इतर हुआ था

तन-मन थर-थर काँप रहा था

ठंडक में भी स्वेद बहा था

तभी एक टूटी कुटिया से

एक वृद्धजन बाहर आए

स्वेत केश थे सिर और मुख पर

देह पे सारी राख लगाए

देख के दूजे जीवित जन को

मन को था संतोष हुआ

पर उसने जो रूप धरा था

उससे थोड़ा भय लगता था

भाँप भाव को मेरे मन के

उसने अपने पास बुलाया

हाल हुआ ऐसा ये क्यों था

थोड़े में ही बतलाया

खेल-खेल में भूल हो गई

भूल बात को तूल दे गई

बात-बात में बहस हो गई

बहस-बहस में झड़प हो गई

झड़प रूप थी रुद्र धर गई

जाति धर्म तक बात बढ़ गई

सबके मन मे आग भर गई

उसको थोड़ी हवा मिल गई

घर छप्पर सब राख कर गई

लाशों का अम्बार कर गई

दुःखो का भंडार भर गई

बच्चो को बिन नाथ कर गई

माँओ को बिन लाल कर गई

वृद्धों को असहाय कर गई

प्रेम भाव का नाश कर गई

मानवता का ह्रास कर गई

मानवता का ह्रास कर गई

देखके मंजर सुनकर बात

मन मे भर आया संताप

इतनी-सी ही तो थी बात

उसका देखो क्या परिणाम

फुला फेफड़ा, भर के सांस

पीट के माथा, भींच के हाथ

दौड़ के भागा ऐसे-तैसे

जैसे घोड़ा बिना लगाम

जाकर ठिठका दूर वहाँ पर

जहाँ बिछी बर्फीली चादर

जहाँ चोटियाँ छूती बादल

जहाँ साँस लेना था दूभर

देह काँपती करके थर-थर

रूह काँपती थी अंदर तक

अंतर मन होता था स्थिर

देख विहंगम दृश्य मनोहर

सन्नाटा पसरा सब ओर

बस धड़कन ही करती शोर

साँस कौंधती चारो ओर

मानो कोई क्रोधित विषधर

मार रहा फुंफकारे हो

शोर बड़ा घनघोर मचा

ब्रह्मांड था सारा डोल पड़ा

लहर-लहर लहरा-लहरा

एक साया मुझसे अलग हुआ

मानो प्राणों ने काया से

संबंध था अपना तोड़ दिया

असह्य तेज प्रकाश पुंज ने

आँखों को था बेध दिया

स्वर्णिम आभा को देख लगा

मानो जन्नत में प्रवेश मिला

जैसे जैसे स्वर्णिम आभा का

तेज संकुचित होने लगा

वैसे वैसे अपनी आँखों को

मैंने था विस्तार दिया

मन मे मेरे उल्लास भरा

अब ही तब में हूरो का है

होने वाला दीदार अहा!

दूध की नदियाँ बहती होंगी

फल फूलों से उद्यान भरा

अब ही तब में जन्नत का है

होने वाला दीदार अहा!

तभी कान में काँव-काँव की

कर्कश ध्वनि पड़ जाती है

मेरे सारे अरमानो पर

पानी फेरे जाती है

अब धीरे-धीरे आँखों को

धुँधली छाया दिख जाती है

काले कौवों, तितली,कुत्तो

के दीदार कराती है

चढ़ी दोपहरी तेज से अपने

मुँह मेरा झुलसाती थी

दिवास्वप्न अब टूट चुका था

पूरी हुई कहानी थी

______________________________________

© Arvind Maurya

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1 thought on “उजाले का अंधकार

  1. Madhusudan

    समय आज कुछ ऐसा आया

    मानव ही मानव की खातिर

    घोर समस्या लेकर आया

    चहूँ ओर सब चीख रहे है

    चौक सड़क और गलियों में

    waah….pahli in chand panktiyon se hi aap chhaa gaye…..bahut bahut khubsurat kavita.

    Liked by 1 person

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