Monthly Archives: August 2018

सच्च! समझौत! ?

आओ ना समझौता कर ले, अपने हक़ की बात से
कुछ भी तो नही होने वाला, गूंगी बहरी सरकार से।
आओ ना समझौता कर ले, अपने स्वाभिमान से
इससे होने से कितनी ही, जाने जाती तलवार से।
आकर अब समझौता कर, अबला अपने सम्मान से
तन ढक कर तो भूखी मरेगी, नंगी हो जा बाजार में।
आकर अब समझौता कर, वंचित सपनो की उड़ान से
बिन संचित धन के अटकेगा, तू बीच आसमान में।
आकर अब समझौता कर, बेटी अपने अरमान से
पढ़ लिख कर क्या करना, जब जनना बस संतान है।
आओ अब समझौता कर ले, देश, समाज, संसार से
जैसा है वैसा ही चलेगा, क्यों छेड़े बेकार में।
आओ अब समझौता कर ले, अपनी देह और प्राण से।
इस जीवन में क्या रखा, अब चल दो इस संसार से।

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© Arvind Maurya

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देखता रह गया

देखते-देखते, मै तो थक हूँ गया।
थक गया देखकर, बाल भी पक गया।
अब वो दिखता कहाँ, जो था पहले यहाँ।
होती आवाजे है, फिर भी खामोशियाँ।
होती मुस्काने है, फिर भी गमगीनियाँ।
सजती मजलिसे है,फिर भी तन्हाईयाँ।
सबकी नेकी करू,फिर भी रुसवाईयाँ।
छाँव में चलता हूँ, फिर भी परछाइयाँ।
काम कुछ भी नही,फिर भी दुश्वारियाँ।
कितनी मासूमियत, फिर भी हैवनियाँ।
कितने भगवान है, फिर भी शैतानियाँ।
बदल सबकुछ गया,कुछ भी बदला न था।
पहले भी ऐसा था,अब था ज्यादा हुआ।
थक गया देखकर, बाल भी पक गया।
देखते देखते, मैं तो थक हूँ गया।

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© Arvind Maurya

मेरी भूल

नाम भूलता हूँ पहचान नहीं
रात भूलता हूँ वो ख्वाब नहीं
साथ भूलता हूँ तेरा हाथ नहीं
प्यार भूलता हूँ वो एहसास नहीं
मान भूलता हूँ अपमान नहीं
यारी भूलता हूँ वो यार नहीं
देश भूलता हूँ देशप्यार नहीं
गान भूलता हूँ सम्मान नहीं
रुपए भूलता हूँ देनदार नहीं
हार भूलता हूँ प्रतिकार नहीं
जीत भूलता हूँ उसका स्वाद नहीं
माँ को भूलता हूँ उसका लाड नहीं
जो भी भूलता हूँ जब भी भूलता हूँ
गुठली भूलता हूँ गिनना आम

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© Arvind Maurya

कैसे कहूँ

कहना तो था कुछ तो कहना तो था
कैसे कहना ये था, मन ये समझा न था
दर्द सहना तो था, फिर भी कहना ही था
जिसको दिल तेरा अबतक भी, समझा न था
जुदा होना तय था , फिर न मिलना होता
ऐसी बात संभल कर, मुझको कहना तो था
ऐसी बात कहके मुझको, सम्भलना होगा
तेरा हाल क्या होगा, दम तो घुंट रहा होगा
फिर भी कहना तो था, मुझको कहना ही था
तू भी बिंध जाएगी, मैं भी बिंध जाऊंगा
फिर भी जिद तुझको आज, यह तजना होगा
मुझको कहना होगा, तुझको सुनना होगा
मुझको कहना होगा, तुझको सुनना होगा

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© Arvind Maurya

चाहत का चक्कर

आखिर हम क्या चाहते है, चाहत की इस चाह से हैं
जिसका कोई थाह नही है, उससे हम क्या मांगते है
चाहत की इस चाह से, आखिर हम क्या चाहते है
प्यार मिले, सम्मान मिले, धन-मान मिले हम चाहते है
खूँखार वहस के आक़ा कुछ, बस रक्त बहाना चाहते है
साधू,सात्विक,सज्जन मिल, बस प्यार लुटाना चाहते है
कुछ आततायी आतंकी, बस हवस मिटाना चाहते है
भेड़ बने कुछ क्षद्म भेड़िए, भीड़ को खाना चाहते है
इसीलिए लालच देकरके, आम को आम खिलाते है
चाहत की इस चाहत को, हम सभी जकड़ना चाहते है
रोगी,योगी,वृद्ध मनुज ही, इसकी लगाम कस पाते है
आखिर हम क्या चाहते है, बस यही समझ नही पाते है

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© Arvind Maurya

रक्षा की हकीकत

ये धागा कैसे बनता है, इसमे ऐसा क्या रखा है
जो सबकी रक्षा करता है, चाहे बूढ़ा हो या बच्चा है
सब इसको धारण करता है,यह सबको अच्छा लगता है
मैं ऐसा सोचा करता था, जब नन्हा सा एक बच्चा था
मैं आज सयाना हो हूँ गया,पर प्रश्न वो अब भी उठता है
हाँ रूप है उसका बदल गया, पर मूल तो पहले जैसा है
ये बहन की रक्षा करता है, ऐसा कैसे हो सकता है
यह सूत्र बँधाकर मैं केवल, कोरा वादा कर सकता है
उसके रक्षा का भार सदा, दूजे भाई पर रहता है
जो ऐसे ही अपनी बहना से, बस कोरा वादा करता है
जो समझ सको तो समझो, जो मान सको तो मानो
अपनी बहना के समान, दूजों की बहन को मानो
यह बात मेरी सब मानो, मन मे धर कर गंठिया लो
मन मे धर कर गंठिया लो, यह बात मेरी सब मानो

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© Arvind Maurya

कभी न कभी

कभी कभी

बह जाते है भावो के अतिरंजन पर

कभी कभी

थम जाते है विप्लव करूणा क्रंदन पर

कभी कभी

चल पड़ते है अनायास ही पर्वत पर

कभी कभी

रुक जाते है अनायास ही समतल पर

कभी कभी

बन जाते है रक्तपिपाषु मानव हम

कभी कभी

कर देते दान सभी धन-वैभव-तन हम

कभी कभी

सह लेते है घोर-घनी विपदा-आफत

कभी कभी

ढह जाते है देख तुच्छ कोई कीट-पतंग

कभी कभी

कोई और नही यह खेल खेलता काल स्वयं

कभी कभी

हम देवदार है

कभी कभी

है वृक्ष अरण्ड

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© Arvind Maurya