वसुधा कुटुम्ब हो कैसे ?

ऐ सुनो इंसान

सुन लो हिंदुस्तान

ना जागो उस नींद से

जो हर ले तेरी प्रीत को

जो कर देती है भीड़ को

शैतान……. हैवान…….

हैवान……. शैतान…….

प्यास न वो बुझ पाएगी

जो नशे की लत लग जाएगी

वो भूख नही मिट पाएगी

जो जीभ को तेरे भाएगी

कोई प्यासा तड़पे जाएगा

कोई भूखा पेट दिखेगा

तू तो कुछ ना कर पाएगा

लड़-लड़ कर तू थक जाएगा

लड़-लड़ कर तू मर जाएगा

फिर बाद में खुब पछताएगा

खुब चीखेगा चिल्लाएगा

चिल्लाएगा……. पछताएगा…….

पछताएगा……. चिल्लाएगा…….

इस लालच को अब छोड़ दे तू

दस पीढ़ी की न सोच रे तू।

कल को जाने क्या क्या होगा

जीना होगा मरना होगा।

आज उगा और कल को खा

इतना ही धरती से ले सकता।

इससे ज्यादा जो चाहेगा

तू पाता है पा जाएगा

पर ज्यादा ना चल पाएगा।

इससे ना जाने कितनों को

भूखा तू करता जाएगा।

इक टुकड़ी रोटी की खातिर

भूखा नंगा खुब चीखेगा।

चिल्लाएगा……. पछताएगा…….

पछताएगा……. चिल्लाएगा…….

रोटी की खातिर जब भूखे

नंगे सड़क पे आएंगे।

तेरे हलक से उतरे भोजन

को भी खाना चाहेंगे।

चीर के उर का तृप्त करेंगे।

तेरे उर का लहू पिएँगे।

एक पल ना संकोच करेंगे।

कानूनों से नही छिपेंगे।

भगवानों से नही डरेंगे।

क्रम ये जो चलता जाएगा

तू चीखेगा चिल्लाएगा

चिल्लाएगा……. पछताएगा…….

पछताएगा……. चिल्लाएगा…….

जैसा रचता संसार है तू।

इससे रखता क्या आश है तू।

तू आज जो उसकी खाएगा।

कल को वो तेरी खाएगा।

वो रोकर आज चिल्लाएगा।

तू बिलख के कल पछताएगा।

कोहराम खड़ा हो जाएगा।

चिल्लाएगा……. पछताएगा…….

पछताएगा……. चिल्लाएगा…….

तेरी भूल भयंकर भारी

खुद को समझे बड़ा शिकारी

बुना जाल जो दूजे खातिर

खुद उसमे फँस जाएगा

कोई काम तेरे ना आएगा

तू चीखेगा चिल्लाएगा

चिल्लाएगा……. पछताएगा…….

पछताएगा…….. चिल्लाएगा…….

धर्म न मोक्ष दिलाएगा।

राज्य न शांति लाएगा।

कौन बताएगा मुझको कि

स्वर्ग राह कौन जाएगा।

राज्य बाँटता इंसा को तो

प्रेम कहाँ से आएगा।

प्रेम कहाँ से आएगा।

तू चीखेगा चिल्लाएगा

चिल्लाएगा……. पछताएगा…….

पछताएगा……. चिल्लाएगा…….

जो जो वर्ग बने है तेरे

लालच के है ये सब डेरे।

राज्य,धर्म और जाति-समाज

या हो कोई वंश विधान।

तोड़ दे इनको…. छोड़ दे इनको….

आ मिल बन जाए इंसान…

आ मिल बन जाए इंसान…

दूर नही वो दिन भी है

इस खातिर तू चिल्लाएगा

चिल्लाएगा……. पछताएगा……

पछताएगा……. चिल्लाएगा…….

चल तोड़ न अपनी बेड़ी तू

ना तोड़ धर्म और जाति-समाज।

बस थोड़ा दिल खोल-खालकर

उसमे भर थोड़ा सम्मान।

थोड़ा-थोड़ा उसमे से तू

प्यार की कर हल्की बौछार।

वो भी पिघलकर, तू भी पिघलकर

हम सब होंगे एक समान।

नव प्रेम बीज का अंकुर यह

जल्दी पौधा बन जाएगा।

अभिसिंचित होकर प्रेमभाव से

वृक्ष बड़ा बन जाएगा।

सौहार्द, स्नेह, समभावो के

नव पल्लव, पुष्प, फलों से लद

संतोष भाव दे जाएगा।

तब ही जाकर वसुधा कुटुम्ब का

सपना सच हो पाएगा।

सब जन के सुख उल्लास भरे

जीवन को राह दिखाएगी।

सब खुश होकर चिल्लाएंगे

चिल्ला चिल्ला कर नाचेंगे

चिल्ला चिल्ला कर गाएंगे।

______________________________________

© Arvind Maurya

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