किससे कहूँ , किसकी सुनूँ

किससे कहूँ वो बात,

जो मेरी जान लिए जाती है।

होता जो मेरे साथ,

वो किसकी कारस्तानी है।

जो भी हुआ जो होगा,

मेरा साथ कौन देगा।

मैं आश किससे रखूं,

जो हाथ थामे मेरा।

सब लोग ऐसे ठहरे,

मेरी बात नही समझे।

मैं उनको समझूँ पागल,

वे मुझको समझे पागल।

ये घोर घना कोहरा,

डाले पड़ा है पहरा।

चलता जिधर किधर भी,

गड्ढे में गिर हुँ पड़ता।

वे मुझको कहते अंधा,

मैं उनको कहता अंधा।

चल कर तो थोड़ा देखो,

जिस राह मैं हुँ चलता।

तब जान पाएगा तू,

मैं काना या तु अंधा

या छाया घना कोहरा,

सो रहा नही दिखता।

तू राह जो बताता

उसपर भी मैं हूँ चलता

ज्यों चार कदम बढ़ता

उसपर भी हूँ भटकता

राहो का एक झमेला

आगे है मेरे दिखता।

चढ़कर हूँ ऊँट चलता,

फिर भी है काटे कुत्ता।

छतरी भी जो लगाऊं,

फिर भी है धूप लगता।

मैं पैर जँहा रखता,

कांटा वही पे रहता।

किसको मैं ये बताऊँ,

किसे दास्तां सुनाऊँ।

जिससे भी मैं हुँ कहता,

वो हँस है मुझपे पड़ता।

कहते है तूने पाया

है भाग्य कुछ गज़ब का

मरता तो क्या न करता,

बस धैर्य थोड़ा धरता।

जो भी है राह दिखता,

तफ़्तीस थोड़ी करता

सच्चा हो और अच्छा

उसपर हुँ चल मैं पड़ता।

परिणाम चाहे जो हो

हँस कर हुँ ग्रहण करता

मरता तो क्या न करता

बस धैर्य थोड़ा धरता

बस धैर्य थोड़ा धरता

______________________________________

© Arvinद Maurya

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2 thoughts on “किससे कहूँ , किसकी सुनूँ

    1. ARVIND MAURYA Post author

      बहुत बहुत धन्यवाद भैया जी। अपना आशिर्वाद बनाए रखे और मार्गदर्शन भी करें।

      Like

      Reply

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