ये सृजन कहीं विध्वंस न हो।

कुछ मानवीय गुणो को सास्वत मानकर जिनके कारण कुछ विशेष नैतिक आचरणों का पालन संभव नहीं था; उसके लिए कुछ परम्पराए और मान्यताए बनाई गई, जिससे कि सामाजिक और प्राकृतिक व्यस्थाओं का संचालन नैसर्गिक रूप से बिना किसी टकराव के संपन्न हो सकें।ये मान्यताएं एवं परम्पराए समाज के कोप से इंसान को और इंसान के लोभ से प्रकृति को बचाने के लिए स्थापित की गई थी। इन पम्पराओ और मान्यताओं को आधुनिक लोग रूढ़िवादी मानते है। इन तथाकथित आधुनिक लोगो का पुरानी परम्पराओ तथा मान्यताओं को रूढ़िवादी कहना, स्वयं में एक रूढ़िवादी मान्यता है जो बिना किसी तार्किक और प्रामाणिक आधार के गढ़ी गई है ।

आज का आधुनिक मानव जो अपने आप को सबसे बुद्धिमान और श्रेष्ठ मानता है, नें वास्तव में अबतक के इतिहास में पृथ्वी का सबसे ज्यादा नुकसान किया है। इससे पूर्व किसी भी जीवन-धारी ने भी पृथ्वी को इतने संकट में नहीं डाला था जितना कि इस तथाकथित आधुनिक मानव ने डाला है।

हम इंसान धरती पर पनपे सभी तरह के जीवन मे अपने आप को श्रेष्ठ मानते है, क्योंकि हमारा ही सिर ऊर्ध्वाधर हो पाया है। हम सोच सकते है। हम सही-गलत में अंतर कर पाते है। हम सभ्य और सामाजिक है। हम व्यस्थित-सुरक्षित घरो में रहते है, जहाँ p की सुरक्षा और गरिमा को बनाए रखने के लिए सभी साधन उपलब्ध होते है। हमारे बनाए सामाजिक ढांचे में सभी वर्गानुसार जीवन-संघर्ष में भाग लेकर अपने पुरुषार्थ से जीवन को एक ऊँचा स्थान प्रदान करते है। लेकिन विडम्बना ये है कि इतना सब कुछ होने के बावजूद एक बहुत बड़ा वर्ग अभी भी जीवन के मूलभूत साधन नही जुटा पा रहा है। ऐसा नही है कि उसमें पुरुषार्थ नहीं है बल्कि वो वर्ग ही मूलभूत जीवन के साधनों को तैयार करने में सबसे ज्यादा मेहनत करता है। फिर भी उसको अत्यंत दयनीय अवस्था में जीवनयापन करना होता है। ऐसा होने के दो कारण है; पहला, कुछ बहुत ही कम लोगो का संसाधनों के एक बड़े भाग पर अधिक अधिकार; दूसरा, जनसंख्या और उपलब्ध संसाधनों के अनुपात में भारी अंतर का होना है। इन सब के बीच दूसरे जीव-जंतुओं की क्या दशा हो सकती है, ये बताने की ज़रूरत नही है।

दूसरी तरफ सुख, सन्तुष्टि, साख, सम्मान के नए नए प्रतिमान गढ़े जा रहे हैं, जिन्हें बहुत लुभावने तरीको से प्रस्तुत किया जा रहा है। इन आभासी प्रतिमानों को जीवन का मूल लक्ष्य मानकर, इन्हें पाने के लि पूरा जी जान लगा देता है। जब इन प्रतिमानों के अनुरूप अपनी जीवन शैली को बनाने की दौड़ शुरू होती है, तो एक बहुत बड़ी आकस्मिक माँग उठती है, जिसकी पूर्ति प्राकृतिक चक्र को बनाए रखकर नही की जा सकती है। तब जाकर नए-नए तरीकों को अपनाकर इस आकस्मिक अप्राकृतिक माँग को पूरी करने की कोशिश की जाती है।इस बढ़ी हुई माँग की पूर्ति के लिए जो नए-नए तरीके ईजाद किए और अपनाए जाते है, उन्हें मानव दम्भ से फूलकर सृजन की संज्ञा देता है। ये साधन बढ़ी हुई माँग को कुछ ही समय तक पूरा कर पाते है, क्योंकि मनुष्य के ज़रूरत की एक सीमा होती है जिन्हे पूरा किया जा सकता है। लेकिन लालच की कोई सीमा नही होती जिसकी पूर्ति असंभव है।

इस तरह लोभ लालच पर आधारित ये प्रतिमान पूरी मानवता को एक भयंकर दुष्चक्र में गूँथते जाते है जोकि धरती पर जीवन के लिए एक बहुत ही बड़ा खतरा लेकर आ रहा है।

आधुनिक मानव जाति आज जिस बात की सबसे ज्यादा डींगे हाँकती है, वो उसके सृजन की क्षमता ही है। पर इस सृजन ने जीवन को इतना दुष्कर और जटिल बना दिया है कि व्यक्ति अपनी नैसर्गिकता को त्यागकर कई प्रकार की छद्म और आभासी अभिलाषाओं की पूर्ति के लिए जहाँ-तहाँ भटक रहा है। अभिलाषाओं की पूर्ति के लिए भटकाव की जो चरणबद्ध प्रक्रिया शुरू होती है, वही जीवन की सभी अव्यस्थाओं की जन्मदात्री और प्रकृति की प्रनहंता हैं। इस अव्यस्था की चरणबद्ध प्रक्रिया बहुत पहले शुरू हो गई थी; लेकिन अब जाकर यह स्पष्ट रूप से दिख रही है क्योकि यह तथाकथित सृजन का चक्र बिना किसी रुकावट के एक लंबे समय से अत्यंत तीव्रता से घूम रहा है और इस सृजन चक्र के दुष्प्रभावों को मापने के साधन भी उपलब्ध हैं।

इस मानव कृत सृजन-चक्र ने प्राकृतिक सृजन-चक्र को रोककर अपने कब्जे में लेने का जो दुस्साहस किया है; प्रकृति समय-समय पर उसका प्रतिकार करती रहती है, लेकिन अब तक इसपर मनुष्य की पकड़ ठीक ठाक रही हैं, इसीलिए ज्यादा नुकसान नहीं उठाना पड़ा है। लेकिन प्रकृति के धैर्य को जिस तरह से इंसान लगातार चुनौती दे रहा है, उससे प्रतीत होता है कि प्रकृति के सब्र के बाँध को टूटने में ज्यादा वक़्त नहीं लगेगा, जोकि मानवता के लिए किसी महानाशकारी महाप्रलय से कम नही होगा।

इसीलिए किसी भावी संकट को टालने के लिए मनुष्य को मानवीकृत सृजन के चक्र की गति को नियंत्रित करके प्राकृतिक सृजन चक्र को गतिमान करना ही होगा। हर बीतते पल के साथ इस दुष्चक्र को रोक पाना मुश्किल होगा, इसीलिए पूरे विश्व समुदाय को इस पर त्वरित एवं प्रभावी कार्यवाही की अतिआवश्यकता है।

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© Arvind Maurya

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