युद्ध अटल सत्य है

युद्ध अटल सत्य है

जैसे सूर्य अटल है

चार प्रहार की है रात

फिर तो सूर्य का प्रताप

चलता रहा चक्र यही

है गवाह इतिहास भी

अभी अगर रात है तो

ये न सोच दिन न होगा

अभी अगर शांति है तो

ये न सोच युद्ध न होगा

थोड़ी धूप छाँव तो बादलों की देन है

थोड़ी युद्ध शांति तो सज्जनो की देन है

जितनी देर जेठ की है, साल के महीनों में

उतनी ही देर बचीं, सदी के कमीनों में

जेठ के कब्जे में, सूर्य ज्योहीं आता है

जेठ ठेठ हँस हँस कर, धरा को जलाता है

ताकत का पुंज ज्योहीं, इक कमीना पाता है

सारी मानवता पर, कहर वो बरपाता है

सत्य और असत्य में, भ्रम वो पैदा करता है

जैसे सूर्य मरु में, मरीचिका को रचता है

युद्ध जाने कितनी ही, लेता आहूतियाँ है

कुछ खुशी से देते है, कुछ से छीन लेता है

जैसे पर्णपाती में, सूर्य लुकता-छिपता है

और खेल-खेल में दावानल भी रचता है

चंद्र और शांति, जितनी अटल सत्य है

सूर्य और युद्ध भी, उतने अटल सत्य है

आज अगर हँस रहा है

काल को बिलबिलएगा

इस समर के अंत तक तो

तू भी मारा जाएगा

इस समर के पूर्व तू

धार दे हथियार को

जिंदगी की आश को

और थोड़ी साँस दे

तप कर रण की वेदी पर

देखके रण चंडी का रूप

लहू लोथड़ों से लथपथ हो

बच जाते जो वीर सपूत

उनसे जाकर पूछ तो तू

कैसा होता युद्ध का रूप

तब बात जो जान तू पाएगा

सोच सोच घबराएगा

ठान के कि अब युद्ध न होगा

एक पीढ़ी थम जाएगा

पर तेरे आगे वालो को

बात समझ ना आएगी

रुद्र युद्ध और यश की इच्छा

लालच और सम्मान की मिथ्या

तुझको खिंचे जाएगी

और युद्ध एक करवाएगी

यह चक्र सदा चलता आया

और आगे भी यह घूमेगा

धरती माँ की मान की खातिर

लहू से होली खेलेगा

युद्ध नही स्थाई हल; ये तो है बस हल की पहल

जो करती है धरती को; पुनः स्वच्छ, अविरल, कोमल

जैसे सूरज अर्पित करता; धरती को रंगीला जीवन

पर बात पुरानी ये सब है,

अब तो आया है दौर नया।

तीर, कटारी, तोप, दुधारी

ये भी कोई हथियार हुआ।

अब तो लड़ने पर आमादा

परमाणू से परमाणू है।

विध्वंस की अपनी ताकत से

दुनिया की लाड दुलारी है।

सब पड़े हुए है इसीलिए

इसको पाने के चक्कर में।

रक्षार्थ नहीं सेवार्थ नहीं,

सबके घर मरघट करने को।

अब युद्ध कोई जो आएगा

विकराल रूप धर जाएगा

बिन हार जीत के इस रण का

कोई निर्णय ना आएगा

बूढ़े-बच्चे, अबला-सबला

निर्धन-धन्ने, कुत्ता-बिल्ला

मछली-पक्षी, हाथी-चूहा

पौधों-कीड़ो और जीवन का

लोप यहाँ हो जाएगा

थोड़े कुछ जीवन रक्षण में

जो सफल अगर हो जाएंगे

तिल-तिल घुट-घुट कर वे सब भी

धीरे-धीरे मर जाएंगे

संभव है कि धरती भी खुद

टुकड़े-टुकड़े हो जाएगी

शुक्र और मंगल के मध्य

एक क्षुद्र पट्टी बन जाएगी

ये बात नही कोरी कल्पित

इसमे बस कुछ ही देरी है

गर मानव कर न सका नियंत्रित

अपने मन की घोड़ी है

गर युद्ध नही कुछ और सही

इंसा ऐसा कर जाएगा

विकसित विकास की दौड़ करा

मरेगा और मर जाएगा

जो वसुधा को ये भान हुआ

इंसान नही रुकने वाला

तब ऐसा जाल बुनेगी वो

जिससे न कोई बचने वाला

पहले देगी संकेत कई

करने से पहले वार बड़ा

फिर ऐसा घात करेगी कि

ना होगा बचने का मौका

अभी समझ जा, थोड़ा संभाल जा

टहर-ठहर विश्राम तो कर जा

थम कर आगे पीछे देख

तेरे पीछे जीव अनेक

जो कर जोड़े, दुखड़े रोते

फिरते तेरे आगे पीछे

चल उनकी भी बात न करता

तू भगवान से अब ना डरता

तुझे नहीं डर जीवन का

ना ही तू मृत्यु से डरता

पर जो कही पर बची हुई हो

भाव भावना तेरे अंदर

मान कहा उन बाल वृन्द का

खेल रहे जो घर के अंदर

भेज खेलने सड़क किनारे

साँस जहाँ लेना है दूभर

जो ऐसा न कर पाए तो

इस बात से इस जो पछताए तो

ये समझ तेरी ही गलती है

ये सृजन नही रण भेरी है

अब बतला क्या अच्छी लगती

ये उत्पाती जीवन शैली

जिसमे है सृजन का अंश नहीं

जिसमे है प्रकृति का रंग नही

अब भी है काफी समय बचा

अब भी तू पीछे हट सकता

अब भी टल सकता महानाश

रुक सकता जीवन का ये ह्रास

तू मनाव है ! तू मानव है !

तू कर सकता ! तू कर सकता !

______________________________________

© Arvind Maurya

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