दशहारा दुनियां जीती

जब आवाज तोतली थी,
रावण की लंका लगती थी।
विजयादशमी खुशियां ले,
चेहरे पे हमारे खिलती थी।

उस दिन मेले में जाना था,
मजे से मन बहलाना था।
दस रुपए हमको जो मिलते,
राजा की तरह उड़ाना था।

भैया जहाज ले आते थे,
छुटकी गुब्बारे लेती थी।
पर मेरे मन मे हामिद के,
चिमटे की छवि ही होती थी।

मैं सोचूँ ऐसा क्या ले लूँ,
माँ के मन को मैं खुश कर दूँ।
क्या मेले में कुछ मिलता है,
जिससे मैं सारा घर भर दूँ।

मैं यही सोंचकर मोजे में,
रुपए को छुपाए बैठा था।
मन मार मिठाई झूले से,
खुद को उलझाए बैठा था।

“तितने ता है, तितने ता है”
बस यही पूँछते रहता था।
हर रेड़ी ठेले वाला मुझको,
देख-देख कर हँसता था।

उठा के जूता, छनछन कर,
मोजे से बात मैं करता था।
है पैसे मेरे पास बहुत,
कहकर मैं खूब अकड़ता था।

कुछ ऐसा मुझको दिखा नही,
जो मन को मेरे भाता था।
मुफ़्त तमाशा बंदर का मैं,
देख के खुश हो जाता था।

छड़ भर में आँखें चमक उठे,
अगले पल सिर खुजलाता था।
यह  ऐसा  है, वह  वैसा  है,
सबकुछ बेकार बताता था।

इतने सारे पैसों में,
सबकुछ इतना-सा आता था।
घर तो छोड़ो हाथ भरे,
इतना भी ना मिल पाता था।

दौड़ा-धूपा सबसे पूंछा,
हर कोई नजर बचाता था।
यक्ष प्रश्न के सम्मुख हरएक,
भीम-नकुल गिर जाता था।

मैं भी थका, हार कर बैठा,
छाँव में जा सुस्ताता था।
मन कहता कुछ खाउं पीउं,
उसको मैं समझाता था।

ऊँघ रहा था तभी झुण्ड,
एक ओर खड़ा चिल्लाता था।
जीता-हारा जीता-हारा,
कह कर खुशी मनाता था।

नींद हुई काफ़ूर दौड़कर,
सरपट भागे जाता था।
दिल मे एक उत्साह जगा,
कुछ अच्छा होने वाला था।

इचक-बिचक कर भीड़ चीर कर,
सबसे आगे पहुँचा था।
देखा तो एक मेज पड़ी थी,
ढेर-सा रुपया बिखरा था।

पूछा तो ये पता चला कि,
खेल जुए का चलता था।
दस के होते बीस यहाँ पर,
रंक भी राजा बनता था।

पैसे से पैसा बनता हैं,
सोंच के थोड़ा चौंका था।
फिर बोला मेरे भी कर दो,
हर कोई अब चौंका था।

खोल तिज़ोरी छनछन करते,
मेज पे सिक्के रक्खा था।
बोला दस है बीस करो,
अब हर कोई भौचक्का था।

पुलिस-पुलिस आवाज लगाते,
पहुंचा एक उचक्का था।
भीड़ जो अब तक चटक रही थी,
रंग हुआ अब कच्चा था।

खुसुर-फुसुर थी शुरू हुई,
रुपयों पर पड़ा झपट्टा था।
बूढ़ा कहो जवान ईमान पर,
लगा सभी के बट्टा था।

पलक झपकते पैसे चंपत,
दिल को लगा मेरे धक्का था।
भाव शून्य धन-धान्य शून्य हो,
हुआ मैं हक्का बक्का था।

दस जाने का क्षोभ नही,
मैं मोह न धन की रखता था।
बीस जो मिलते क्या लेता,
ये सोंच के थोड़ा सिसका था।

लालच चाहत के अंतर को,
कुछ साल बाद मैं समझा था।
कुछ भी खोऊँ कुछ भी पाऊँ,
अब हँसता न ही सुबकता था।

कर्म मार्ग का राही बन,
अब ना लकीर पर चलता हूँ।
हाथ लिखा हाथों से मिटा,
खुद राह नई अब गढ़ता हूँ।

देख के शोहरत दुनियां की,
अब खुद से नही मैं चिढ़ता हूँ।
दस के होते बीस जहाँ,
उस ओर नही अब चढ़ता हूँ

कलिका की सिसकियाँ

एक कली ने हवा को बुला कर कहा,
प्यार करता अगर तो दिखा जा जरा।
तू जो गुमसुम मेरे पास आकर हुआ,
तेरे झोंकों पे अब ना भरोसा जरा।

तू भी भौंरा हरेक फूल पर मर मिटे,
जिस्म सबसे मिला दिल मिला ना जरा।
हो भरोसा मुकम्मल तेरे इश्क़ पर,
छोड़ सबको तू मुझपर से बह जा जरा।

तू है कमसिन कली, ऐसे क्यूं है अड़ी
तेरे कोमल कपोलों ने रोका जरा।
मैं हूँ तूफ़ां वही जिससे डरते सभी,
काँपे थरथर भवन पेड़ और खिड़कियाँ।

कितने बागों गुलिस्तां को रौशन किया,
प्यार से कितनों को मैंने मारा यहाँ।
तोड़ दू ना तुझे, मेरी नाजुक परी,
सोंच ये  ही मैं तुझसे हूँ कटता रहा।

कर भरोसा ना कर, ना ही मुझको फ़िकर,
कह दे धोखा ही बसता, मेरे दिल मे अब।
खिलके खेलेगी तू, गैर भौरों के संग,
फिर भी तुझपर ना लानत कहूँगा सनम।

लेके तोहमत दगा का बहुँगा उधर,
तेरा साया भी ओझल जो जाकर जिधर।
तुझको पाने की चाहत में तोड़ा अगर,
खुदकी नजरों में गिरके बहूँगा किधर।

छलबली

क्यूं ऊतर गया पानी, था पानीपत के रण में?
क्यूं घास खा रहे थे, जंगल मे छिप के बचके?
क्यूं भागना पड़ा है, हमे टोकरी में छिप के?
क्यूं कालपी में रानी, मर गई तड़प-तड़प के?
क्यूं सिंह से भगत जी, लटके थे रस्सियों से?
क्यूं बोस को न मिट्टी, मिल पाई अपने घर मे?

कश्मीर-भाल-भारत, क्यूं कट गया था धड़ से?
लाहौर बंग-भूमि, क्यूं कट गई बदन से?
सब में है एक समता, जयचंद सबके पीछे।
अपनों से सभी हारे, कुछ भूल गए सब वे।
चाणक्य ने कहा क्या, क्या कृष्ण कह गए थे।
क्या चंद्र से वे शेखर, मरने गए थे खुदसे?

हाथों में ले के लाठी, क्यूं लड़ रहे थे गन से?
गीता कभी पढ़ी भी, या ढोंग कर रहे थे?
तुम भूलते बहुत हो, सहिष्णुता के हौदे।
गाँधी की साथी गीता, बाँची गई थी रण में।
जब कृष्ण ने कहा है, संघर्ष करो जमके,
क्यूं बात मानते हो, नंगे फकीर सर के।

जब मर रहे थे बच्चे, दाने बिना तड़प के।
क्यूं कर रहे थे अनशन, आँखों पे पट्टी धरके।
बच्चे अगर तड़पते, बापू जो सच्चे होते।
उर चीर शोषकों का, बच्चों का पेट भरते।
क्यूं बार बार करते, सहिष्णुता के चर्चे?
क्या सत्य-अहिंसा का, ठेका लिया है हमने?

हिंसा से अगर बचने की, बात कृष्ण करते।
कुरु भूमि रक्त से तब, यूं लाल नही करते।
वे पाण्डवों को लेकर, दरबार अपने चलते।
छः जन के हक कि खातिर, लाखों से नही लड़ते।

शक्ति ये सत्य की तुम, अब क्षीण हुई जानो।
छल में है बड़ी शक्ति, इसको भी आजमालो।
ना तुम मरोगे भूखे, खाओगे ना ही ताने।
बल से बलि बलीश्वर, माँगेंगे छाँव आके।

छल ही तो एक साथी, है सारे शोषितों का।
जो शोषकों से लड़ता, हथियार बनके उनका।
तुम बंद करके आँखें, इसपर करो भरोसा।
छल देव को जो पूजे, सब सुख वही है चखता।

मेरा है नाम छलिया, सुन लो ये सारे जग में।
वो धर्म धर्म कैसा, जो हार जाए तम से।
ये राक्षसों की टोली, हारेगी नही सत् से।
ये बात कह गए हैं, श्री कृष्ण मरते-मरते।

मैं राम जब बना था, मारा बली को छल से।
रावण की नाभि भेदी, भाई से उसके मिलके।
तुम बात मेरी मानो, गर पाप है जगत में।
छल से उसे मिटाना, धर्मों में सबसे बढ़के।

आँख का तिनका, समंदर की नांव

समंदर के सफर पर तुम,
साथ मेरे चली आना।
नही तो डूब जाऊंगा,
भले ही तैरना आता।

समंदर की ये गहराई,
मुझे क्या ही डुबाएगी।
तेरी यादों के दरियां में,
डूब कर जान जाएगी।

मैं लहरों से नही डरता,
समंदर जब ठहरता है।
है लगता डूब जाऊंगा,
कोई जब गुमसुम रहता है।

ये बादल जब गरज करके,
बिजलियां हैं गिरा देते,
मैं डरता हूँ तेरे सुर जब,
थोड़े मद्धम से है आते।

तेरे चप्पू हँसी के जब,
फिजा में डोलने लगते।
मेरे भटके हुए दिल को,
कई तब रास्ते दिखते।

तेरे घुँघरु छनककर जब,
नई धुन छेड़ने लगते।
मेरी सहमी कलम से तब
नए कुछ बोल हैं बहते।

तेरे जब बाल कंघी से,
उलझकर रेशमी बनते।
द्वंद सारे मेरे मन के,
सुलझकर सीध में चलते।

अगर तुम साथ मेरे हो,
ये खारापन मिटा दूंगा।
मैं लहरों में डुबा करके,
समंदर चुप करा दूंगा।

समंदर के सफर पर तुम,
साथ मेरे तभी आना।
तुम्हारा दिल अगर धड़के,
मैं जब भी याद हूँ आता।

समंदर के सफर पर तुम,
साथ मेरे चली आना।
समंदर के सफर पर तुम,
साथ मेरे चली आना।

करम कली

हरी मिर्च सी तीखी, उसकी बात
है निकले आह,
अदा ये उसकी लेती जान
है फिर भी अच्छी लगती।

वो उसकी मोटी मोटी आँख,
तेज जैसे कोई तलवार,
घूर दे निकले हाय रे जान,
है फिर भी अच्छी लगती।

वो सोती मुँह पर उसके बाल
भरे खर्राटे जैसे कार,
ओठ से बाहर आते लार,
पिशाचिन से फिर भी है प्यार,
नही तुम समझोगे ये।

वो उसकी बाल सुलभ मुस्कान,
हँसे जब उसके दोनों गाल
है होते लाल मेरे रुखसार,
मेरा दिल क्यों ना डोले।

कड़क कर पूंछे जब वो बात,
है रुकती आती जाती साँस,
पता है उसको हर एक बात,
राज ये कैसे खोलें।

बुने जब शब्दों के वो जाल,
भरे लाखों उसमे जज़्बात,
आग को भी कह देती राख,
जुल्म ये कैसे झेलें।

लिए हैं फेरे पूरे सात,
कहा था साथ रहेंगे यार,
याद जब आती कस्मे सात,
डोर ये कैसे तोड़े।

खून वो पीती सुबहों-शाम,
खिलाती दाने फोड़ अनार,
है कहती जियों हजारों साल,
राह ना कोई सूझे।

वो रहती कितनों ही बीमार,
छोड़ती व्रत न एक उपवास,
जान में मेरे उसकी जान,
जान ये कैसे छोड़े।

नयनपाश

तेरी आँखों मे सागर डूबे, हम दरिया बनकर कूद गए,
वे डब डब कर के देख रहे, हम आँख से तेरे छूट गए

कुछ रूठ गए, कुछ टूट गए, कुछ गाल को तेरे चूम गए
कुछ काजल लेकर श्याम बने, कुछ हाथ को तेरे चूम गए

कुछ को पलको ने समझाया, कुछ आँख मूंद काफ़ूर हुए।
कुछ पलको पर ही भड़क गए, जा नयन-कब्र में कूद गए।

कुछ छलक जाम में बूँद बूँद, हो चूर नशे में झूम गए।
कुछ इत्र सने रूमाल के संग, खारापन अपना भूल गए।

कुछ मतवाली आहो के संग, प्रेमी को प्रणय से सींच गए।
कुछ दर्द भरी आहो के संग, प्रेमी के विरह में सूख गए।

कुछ बहकर उर तक पहुंच गए, कुछ सीना कुछ का चीर गए।
कुछ खुश होकर के छलक गए, कुछ क्रंदन में थे फूट गए।

कुछ छोर पे आकर लौट गए, कुछ फिसल के तुझसे दूर गए
कुछ वहीं खड़े हो देख रहें, हम तुमसे कैसे दूर गए

कुछ ने सब सहना सीख लिया, आँखों के तेरे नूर हुए
कुछ ने था बहना सीख लिया, धरती पर जाकर धूल हुए।

कुएं की काई

गुस्सा है तो दिखाता क्यों नही
प्यार है तो जताता क्यों नही
दर्द है तो चिल्लाता क्यों नही
ख़ुश है तो मुस्कुराता क्यों नही
अगर जिंदा है तो कुछ बोलता क्यों नही,
गर मर गया ख़ुदको दफ़नाता क्यों नही,

दिमाग है तो दौड़ाता क्यों नहीं
दम है तो लगाता क्यों नही
मुँह है तो चलाता क्यों नहीं
हाथ है तो बढ़ाता क्यों नही
अगर स्वस्थ है तो मदमस्त क्यों नहीं।
गर बीमार है तो इलाज कराता क्यों नही

फ़क़ीर है तो लुटाता क्यो नही
गरीब है तो कमाता क्यों नही
अमीर है तो सताता क्यों नही
रईस है तो  उड़ाता क्यों नही
हाथों की लकीरों को मानता क्यों नही,
अगर मानना नही तो मिटाता क्यों नही।

नीतिपति

अगर किसी के चप्पल पर भी, पैर तुम्हारा पड़ जाए
मन मे एक अपराधबोध से, दिल थोड़ा सा अकुलाए
प्रण ले खुद को क्षमा करें, ना पाप दुबारा हो जाए
तब ही तो ये हाड़-मास, इंसान का तगमा ले पाए।

दूजों के सिर पर भार देख, मन बोझ तले गर दब जाए;
करुणा की बरसात कदम को,  स्वतः ओर उस ले जाएं;
लेकर उनका भार अगर, मन थोड़ा हल्का हो जाए;
समझ मनुष्यता बची हुई , तुम मानव तब ही कहलाए।

विषधर हो तुम एक पतिंगा, डंक मारकर उड़ जाए;
तनिक न हो तुम विचलित-क्रोधित, बस मुस्कान बिखर जाए;
कंठ हलाहल भरा रहे पर, मुख गर अमृत बरसाएं;
मानव में भगवान के दर्शन, इसी तरह से हो पाए।

पेट पीठ से सटी हुई, भूख प्यास से सनी हुई,
मौत सामने खड़ी हुई, गर अमृत उस पल मिल जाए।
प्यासा कोई जल का सुर, तेरे द्वार पे आकर चिल्लाए,
गर उसे पिला दो अमृत तो, भगवान भी चाकर बन जाएं।

भ्रह्मआनंद

इश्क आप से ही, इजहार करेंगे।
पहली बार हम किसी को, प्यार कहेंगे।
मौका जरा-सा थोड़ा-सा, खास करेंगे।
बस आपसे एक हाँ की, दरखास करेंगे।

एक बार भी जवाब, ना सवाल करेंगे।
जो आप की रजा हो, स्वीकार करेंगे।
हो दिल मे सदा आप, सदा याद करेंगे।
हो धूप या हो छाँव, सदा साथ रहेंगे।

आप की चाहत का सदा, ख्याल करेंगे।
आपकी चाहत पे जां, निसार करेंगे।
परिवार का भी पूरा ख़याल करेंगे।
आएगा जब समय, सभी से बात करेंगे।

बस आपसे एक हाँ की, दरखास करेंगे।
पहली बार हम किसी को, प्यार कहेंगे।
हम ना की तनिक भी ना, परवाह करेंगे।
हिस्से का अपने प्यार बरकरार रखेंगे।

पूर्वी के पलकों के नीचे

पानी से डबडब वो, खुशियों से भरकर जब
छलके तो लगता है, राधा की गागर पर
कान्हा के हाथों से, छूटा एक पत्थर लग
टूट गई गागर और पलको का सागर तब

सबकुछ डुबाने को, मुझको भिगाने को
थोड़ा डरा करके, थर थर कंपाने को
लहराकर आती वो, बलखाकर जाने को
गुस्सा भी करती वो, प्यार ही जताने को

झूठी-फरेबी वो, सच न बताने को
हँसती है धीरे से, गम को भुलाने को
थोड़ा वो खुलती है, थोड़ा बताने को
फिरसे झपक जाती है, मुझको लुभाने को

मृगनैनी मीन अक्षि, मादक इशारे दो,
बसने की थोड़ी सी, जगह एक किनारे दो।
सागर या झील कहके, कैसे अपमान करूं,
इनमे जगह सारी, दुनियां बसाने को