पहला दिन पहला स्कूल।

आजादी की खुशी थी सबको,अगस्त की पंद्रह तारीख थी वो।
सब झंडा फहराते थे।,आजादी की खुशी मानते थे।

पहला दिन मुझे काट रहा था, नया नया दाखिला हुआ था।
सब मुझको यों ताक रहे थे,ज्यों शिकार को भांप रहे थे।

पहली बार घर के अलावा, इतनी देर कहीं ठहरा था।
आजादी ने मानो आकर, मुझको खुद में जकड़ा था।

कहाँ रुकना कहाँ चलना है, सबकुछ नीयत निश्चित था।
माँ की गोद का अनायास ही, चित्र पटल पर उभरा था।

जैसे जंगल मे कोई शावक,अपनी माँ से बिछड़ा था
वैसे ही इस भेड़ भीड़ में, मैं भी जाकर अटका था।

आँख में पानी आ तो गया था,पर मैं उसको दबा रहा था।
साँस चढ़ाकर, ओठ दबाकर, खुद को रोके रखा था।

भला नदी भी रुकती है क्या,चट्टानों के आने से।
मेरे आँखो के आँसू भी,भला क्यो रुकने वाले थे।

पलको की पतवार टूटी, आँसू के सैलाब से
मेरे पहले स्कूल की, ये पहली दास्तान है।

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© Arvind Maurya

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लड़खड़ाकर

जब कदम यूँ ही बढ़ें, लड़खड़ा कर ही सही।
तय करे एक फासला, गिरते- पड़ते ही सही ।

भाग्य से या भूल से, या कर्म और पुरुषार्थ से ।
पहुंचे उस मंजिल जहाँ पर, पहुंचा ना कोई अभी ।

खोल दें वो आसमाँ , जो कभी दिखा नहीं।
नाप दे वो रास्ता, जिसपे कीले थी बिछी

चले उसपर कारवाँ कई, बांधकर पर हौसलों के।
भेदने को लक्ष्य वो जो, अब तलक बिंध सका नहीं।

पाने को उस आरजू को, कसक जिसकी उठ रही।
देखने को कब से जिसको, आँखे प्यासी तड़प रही।

कदम यूँ ही बढ़ते बढ़ते….
लड़खड़ा कर चलते चलते….

ज़्यादा नहीं था ।

वो तेरा थोड़ा , जो तूने माँगा था।

मेरे जीवन भर का,वो सारा किस्सा था।

ज़्यादा तो नहीं माँगा, मैं दे भी सकता था।

चाहे इस देह में फिर,भले प्राण भी न बचता।

कुछ भी तो नही रखा,मेरे पास सिवाय इसके।

मैं कैसे दे सकता, जो प्राण से प्रिय है मुझे।

मैं प्राण भी दे देता, पर बात तेरी रखता।
पर बात नही अब वो, कि प्राण मैं दे सकता।

मुझको न कोई सिकवा, न मन मे कोई ग़िला।

मुझको वो ही है मिला, जो मेरे माथे लिखा।

सपने में भी मुझको,अब प्यार से डर लगता।

तेरा एक एक हिस्सा, मेरे रग रग में बहता।

पर जैसे तूने था, मेरे दिल को तोड़ा।

मेरा टूटा विश्वास, अब तक न लौटा।

ज़्यादा तो नही माँगा, पर मैं न दे सकता।

ज़्यादा तो नही माँगा, पर मैं न दे सकता।

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© Arvind Maurya

सार्वजनिक संपत्ति के प्रति विमुखता क्यों ?

धन-संपत्ति, प्रतिष्ठा किसे प्रिय नही होती है। लेकिन धन संपत्ति और प्रतिष्ठा का मजा तब ही है जब इनपर आधिकार हो या इनके प्रति अपनत्व का भाव हो। दूसरों की संपत्ति और समृद्धि से लोगो मे ईर्ष्या पैदा होती है। अगर संपत्ति आप के दुश्मन की हो तो पूछना ही क्या। ऐसी संपत्ति को लोग फूटी आँखो देखना पसंद नही करते और मौका मिलते है उसको नुकसान पहुँचाना तो एक सहज मानवीय प्रवृत्ति है, जिसे मानव अपने उत्पत्ति के समय से ही अर्जित करते आ रहा है जोकि उसे अपने आप को जीवन संघर्ष में बनाए रखने के लिए ज़रूरी था।

ये कोई नई बात नही है। यह सर्वविदित है कि शक्तिशाली ही सदैव से शासक रहा है और शोषक का पर्यायवाची रहा है। लेकिन बहुत कम लोग को संज्ञानात्मक रूप से इस बात का ज्ञान होता है कि शासित सदैव से कमजोर रहा है और शोषित का पर्यायवाची रहा है।

इस तरह से अचेतन रूप से हम सब को पता होता है कि शक्तिशाली ही शासक और शोषक होता है जबकि कमजोर शासित और शोषित होता है। इसी वजह से शक्तिशाली समूह अपना प्रभुत्व कायम रखने के लिए दूसरे कमजोर समूहों को दबाते है। ठीक उसी तरह कमजोर वर्ग शक्तिशाली समूह को किसी तरह से नीचे लाना चाहता है ताकि वो उनपर हावी ना हो सके। कहीं न कहीं इन्ही सब के बीच में ही भारत मे सार्वजनिक संपत्ति के प्रति लोगो की लापरवाही का कारण भी छुपा हुआ है।

शक्ति के प्रतीक और मानदंड समय के साथ साथ बदलते रहते है। पूर्व में बाहुबल, धार्मिक सत्ता, ज्ञान आदि शक्ति के प्रतीक और मानदंड थे, परंतु वर्तमान में धन-संपदा ही शक्ति के प्रतीक और मानदंड के रूप में स्थापित है, क्योंकि आज के युग मे कुछ भी प्राप्त किया सकता है।

आप को लग रहा होगा कि इन सब बातों का लोगो के सार्वजनिक संपत्ति के प्रति लापरवाही और विमुखता से क्या संबंध हैं। लेकिन मैं आप को आश्वस्त करना चाहूँगा कि समस्या की जड़ यहीं से शुरू होती है। अब मैं पुनः विषय पर लौटता हूँ।

सार्वजनिक सम्पत्ती से आशय उन साधनों से है जिसका उपभोग सभी जनमानस बिना किसी भेदभाव के समान रूप से करते है और सार्वजनिक संपत्ति का निर्माण आमजनों के धन-सहयोग से ही होता है।

अन्य विकसित देशों की तुलना में भारत मे सार्वजनिक सार्वजनिक संपत्तियों के प्रति विमुखता और लापरवाही का स्तर ज्यादा है। इसके बहुत से सामाजिक, आर्थिक, नैतिक, व्यावहारिक, कारण है, जिन्हें हम वर्तमान में देख पाते है लेकिन इसकी वास्तविक जड़ें साम्राज्यवादी शासन के दौर से जुड़ी हुई है। ब्रिटिश शासन के दो सौ वर्षों के शासन के दौरान, सत्ता और सरकार शोषण का पर्यायवाची बन चुका था। ब्रिटिशो के दमनकारी और तथाकथित लोकतांत्रिक शासन के दौरान भारतीय जनमानस पर सरकार की जो छवि बनी कमोबेश आज भी वैसे ही है। जिस तरह पूर्व में सरकार को जनता का शोषक माना जाता था वैसे ही वर्तमान में लोकतांत्रिक सरकारों को जनता का अर्थ चूषक ही माना जाता है।आजादी के 70 साल बाद भी भारतीय शासक वर्ग और सरकारें अपने लोगो के मन-मस्तिष्क से सरकार की पुरानी छवि नही उतार पाई

सरकार की छवि धूमिल होने की नींव, आजादी मिलने के कुछ वर्ष पूर्व ही पड़नी शुरू हो गई थी। हुआ यूं कि हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने लोगो के सामने आजादी का जो स्वरूप प्रस्तुत किया था वो भिन्न-भिन्न था। आजादी को लोगो ने रामराज्य के रूप में अपने मन-मस्तिष्क में प्रतिष्ठित किया था। लेकिन आजादी जो विभत्स रूप धारण करके आई, उसने लोगो के अंतर्मन पर बहुत आघात किया। आजादी के बाद जिस तरह के राष्ट्रीय चेतना का विकास होना चाहिए था वो नही हो पाया, क्योंकि देश का एक तबका इस आजादी से शायद खुद को जोड़ नही पा रहा था। कुछ अन्य वर्ग भी थे जो आजादी के इस स्वरूप से संतुष्ट नही थे। इस नई बनी देशी सरकार और सत्ता को अंग्रेजो का स्थानापन्न मात्र माना गया और छिटपुट विरोध और विद्रोह के स्वर भी उठे। आगामी वर्षो में असफल होती सरकारी नीतियों और और लगभग उसी तरह की सरकारी कार्यशैली ने लोगो के इस विश्वास को और पुख्ता किया।

कुल मिलाकर जनता खुद को सरकार से नही जोड़ पाई या फिर यों कहें कि सरकार जनता को खुद से जोड़ पाने में असफल रही। इस भेद के कारण ही जनता और सरकार के बीच की दूरी बढ़ती रही और परिणामस्वरूप सरकार को जनता से एकदम अलग-थलग माना जाने लगा।

इसी बीच लोगो ने एक बहुत ही विकट अवधारणा बनानी शुरू कर दी कि राष्ट्र निर्माण का सारा दायित्व केवल सरकार का है। लोगो का मानना था कि यदि ब्रिटिश सरकार हमारी सारी परेशानियों का कारण हो सकती है तो हमारी खुद की बनाई सरकार इन सब परेशानियों का निवारण क्यों नही हो सकती है। यह अवधारणा बहुत ही घातक सिद्ध हुई। इस तरह से जो लोग सरकार में विश्वास रखते थे और जो सरकार लोग सरकार में में विश्वास नही रखते थे; दोनो ही सरकार से दूर होते चले गए।

लोगो को पता होना चाहिए कि सृजन में सालो साल लग जाते है और विध्वंस में छण भर भी नही लगता। आजादी के बाद राष्ट्र सृजन के पथ पर चल रहा था, जिसमे सभी के सहयोग और समय की आवश्यकता थी। जनसहयोग के पहलू को जब सरकार ने ही नज़रअंदाज कर दिया तो जनता से क्या आशा की जा सकती थी। विकास के औद्योगिक मॉडल का चुनाव उस समय की एक बहुत बड़ी भूल थी। जब लोग भूखे मर रहे हो, धनोपार्जन के लिए कोई साधन न हो, जनता बेकारी का शिकार हो उस समय इंसानो पर मशीनों को तहरीज देना सभी दृष्टिकोणों से गलत था।

इस तरह सरकार और जनता; दोनो ने ही अपने दायित्वों न ही समझा और जिन दायित्वों का भान था, उसका भी सही तरीके से निर्वाह नही कर पाए। दायित्वों के उचित निर्धारण और निष्पादन के आभाव में लक्ष्य और वादे पूरे नही हो पा रहे थे, जिसके कारण धीरे-धीरे असंतोष बढ़ने लगा।

कालांतर में इसी असंतोष के कारण ही बहुत सारी सरकारें गिरती बनती रहीं लेकिन लोगो की अपेक्षाओं पर कोई खरी नही उतरी। लंबे समय तक एक दल विशेष पर लोगो का विश्वास अनायास ही बना रहा। इसका कारण उस समय के राजनीतिक परिदृश्य में किसी सशक्त विपक्ष का न होना भी हो सकता है। यह बात भी एक तरह से आत्मघाती ही सिद्ध हुई। बिना ज्यादा प्रयास और सशक्त विपक्ष के आभाव में आसानी से शासन मिलते रहने से शासक वर्ग में एक आत्ममुग्धता का भाव उत्पन्न हो गया। इस आत्ममुग्धता के कारण सरकार थोड़ी असावधान और लापरवाह हो गई, जिसके परिणामस्वरूप विकास का पूरा चक्र ढुलमुल गति से चलने लगा।

इसका दुष्प्रभाव पूरे सरकारी तंत्र में फैल गया। योजनाओं में बंदर-बाँट शुरू हो गया। जो एक बार राजनीतिक प्रतिनिधि चुन लिया जाता उसकी सामाजिक और आर्थिक स्थिति आश्चर्यजनक रूप से ऊपर उठ जाती थी। लोगो को भी इस घालमेल का भान होने लगा था। इन बातों ने सरकार और पूरी सरकारी व्यवस्था की साख पर बट्टा लगाने का काम किया। राजनीति समाजसेवा से व्यवसाय का रूप ले चुकी थी।

इस तरह सरकार लोगो की होते हुए भी लोगो की नही रही। लोगो ने अपने आप को सरकारी तंत्र से पूरी तरह से अलग कर लिया। लोग सरकार के प्रति उदासीन हो गए। लोगो मे अपने अधिकारों के प्रति अचेतना होने के कारण सरकार और उसका तंत्र निरंकुश होकर जवाबदेही से लगभग मुक्त-सा हो गया था।

आम लोगो मे यह मनोभावना बलवती होने लगी की सरकार और उसका पूरा तंत्र भ्रष्ट और चोर है। इसीलिए चोर की गठरी पर हाथ साफ करने किसी भी तरह से गलत नहीं है। इसी कारण लोग सार्वजनिक संपत्ति का नुकसान करने या चोरी करने के पश्चात भी किसी तरह का अपराध बोध महसूस नहीं करते और न ही इसे नैतिक रूप से गलत मानते है। आज यह स्थिति इतनी विकराल हो गई है कि नैतिक और अनैतिक आचरण के बीच की रेखा बहुत धूमिल हो गई है। इसीलिए आज हम देखते है कि लोगो में सार्वजनिक संपत्ति के प्रति लापरवाही और उदासीनता बहुत ज्यादा बढ़ गई है।

जनता अपने हर गलत आचरण को सही ठहराने के लिए इसका ठीकरा सरकार पर फोड़ती है और सरकार अपनी कमियों को छुपाने के लिए जनता, जागरूकता और जनधन की कमी पर ठीकरा फोड़ती है।

आज हमें ज़रूरत है कि दूसरे की आँख का तिनका देखने की बजाए अपनी आँखो में पड़े लट्ठ को देखे। तभी हम एक आदर्श देश और समाज का निर्माण कर पाएंगे जो सभी प्रकार से सम्पन्न हो।

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© Arvind Maurya

दुष्चक्र

जब से जितेन ने यह नौकरी पकड़ी है तब से उसकी जिंदगी नरक सी बन गई है। आफिस से घर जाते वक्त जितेन अपनी नौकरी और जिंदगी के बारे में सोच रहा है- “सुबह से लेकर देर रात तक गदहे की तरह काम करो फिर भी जिंदगी तंगहाल हो तो ऐसा काम करने का क्या फायदा। बचपन मे पढ़ाई खेलना कूदना छोड़कर मेहनत से पढ़ाई लिखाई किया ताकि जवानी में मजे करेंगे भले ही बचपन थोड़ा फिका हो जाए तो क्या। ये दिन देखने के लिए थोड़े ही इतनी मेहनत की और आज भी कर रहे है। पहले सोचते थे पढ़ लिख लेंगे, नौकरी करेंगे, सम्मान मिलेगा। घंटा सम्मान मिल रहा है। सम्मान के नाम पर ऑफिस का चपरासी दिन भर में एक दो बार चाय पूछ जाता है। इसके अलावा जो खातिरदारी होती है वो तो बताने लायक भी नही है। अब मैं निश्चय करता हूँ कि ये नौकरी छोड़ दूँगा। ये ओहदा मेरे लिए बना ही नही है।

घर पहुंचते पहुंचते जितेन थक कर चूर हो जता है।घर पहुंचते ही सोफे के सामने पड़े मेज पर मोबाइल निकालकर फेंकता है और निढाल होकर धड़ाम से सोफे पर लेट जाता है। अब भी जितेन के चेहरे पर चिंता की लकीरें साफ झलक रहीं है। बालों पर हाथ फेरते हुए, एक गहरी साँस लेकर छोड़ता है और लेटे-लेटे ही पैर से पैर के जूते निकालने का प्रयास करता है। जूता निकालने के लिए वो थोड़ा संघर्ष करता है। क्योंकि जूता नही निकलता है, इसीलिए उसका चेहरा और तमतमा जाता है।

थोड़े संघर्ष के बाद एक पैर का जूता आधा निकलता है तो उसके चेहरे पर हल्की राहत भरी मुस्कान फैल जाती है, मानो कोई जंग जीत गया हो।ठीक उसी वक़्त मेज पर रखा उसका फ़ोन बज उठता है। फ़ोन मेज पर कंपन (वाइब्रेट) करते हुए जैसे ही बजता है, वैसे ही जितेन की मुस्कान सिकन में तब्दील हो जाती है।जितेन सोफे पर लेटे लेटे ही लापरवाही से फ़ोन उठाकर, “हेलो कौन है?” दूसरी तरफ से एक भारी आवाज उसकी बात बीच मे ही काट कर बोलती है – ” खामोश….मेरी बात ध्यान से सुनो। आज तुम्हारी किस्मत तुमसे भीख माँगने आई है और तुमको चुनना है कि तुम उसको कितना दे सकते हो।

जितेन का इतना सुनना था कि उसके कान खड़े हो गए। वो पलक झपकते ही उठ कर बैठ गया। वह ज्यों ही उठा उसका जूता जोकि आधा निकला था, जाकर एक फूलदान पर लगता है। फूलदान गिरकर टूकड़े टूकड़े हो जाता है।

वह ज्यों उठता है तो देखता है कि उसका मोबाइल मेज पर पड़ा हुआ बज रहा है और घड़ी में बारह बज रहे है। उसका दिमाग चकरा जाता है। वो घबरा जाता है कि उसके साथ ये क्या हो रहा है। वो तो अभी फ़ोन पर बात कर रहा था
होता यूं है कि वो जब काम से वापस आता है तो सोफे पर पड़ते ही जूते निकालते निकालते सो जाता है और ये बातचीत सपने में हो रही होती है और अब जाकर उसकी नींद खुली है।

वह ज्यों ही फ़ोन उठाता है तो दूसरी तरफ से वही भारी आवाज फिरसे बोलना शुरू करती है जो सपने में उससे बात कर रही होती है- “मेरे सवाल का अगर तुमने सही जवाब दिया तो तुम्हारी जिंदगी बदल जाएगी।” इतना सुनना था कि जितेन के होश उड़ गए। क्योंकि पिछले एक हफ्ते से उसको यह व्यक्ति रोज रात के बारह बजे फोन कर रहा है।

जितेन चिढ़ते हुए गुस्से में बोलता है – ” भाई मैं एक हफ्ते से तुम्हारे सवालों के जवाब दे रहा हूँ। तुम जो सवाल पूछ रहे हो वो तो किसी स्कूल में भी नही पढ़ाया जाता है। तुम कौन हो? तुम्हारा उद्देश्य क्या है?

तुम पूछते हो- “हाथी और कुत्ते की लड़ाई में कौन जीतेगा?” मैं कहता हूँ भाई हाथी का लड़ना समझ में आता है लेकिन कुत्ता वो लड़ाई क्यों लड़ेगा जो उसके लिए जितना असंभव हो। और वैसे भी इनकी कोई जातीय दुश्मनी तो है नहीं।
तुम पूछते हो- “ऊँट पर बैठे इंसान को कुत्ता कैसे कटेगा?” अरे भाई! दाँत से कटेगा वो तलवारबाजी थोड़ी जानता है।
तुम पूछते हो – “कुत्ता हड्डी क्यों चबाता है?” अरे भाई ! कुत्ता हड्डी नही चबाता है। वो हड्डी से घिसकर अपने दाँत तेज करता है, जिससे अगर तुम्हारे जैसा कोई कुत्ता उसका दिमाग चबाना चाहे तो उसको सबक सिखाए।
यह बताओ तुमको कुत्तो में इतनी रूचि क्यों है?

दूसरी तरफ से वही भारी आवाज और भी गंभीरता से आई – “शाँत…… आज तुम्हारे लिए ये मेरा आखिरी सवाल है। अगर इसका सही जवाब दिया तो तुम्हारी भाग्यरेखा चमक उठेगी। क्या तुम तैयार हो?” जितेन अनमने मन से अपनी स्वीकृति स्वरूप लंबा सा हाँ….. बोल देता है।

दूसरे तरफ से आवाज आती है; तो ध्यान से सुनो – “मान लो अगर किसी कुत्ते को पर (पंख) लग जाए तो क्या करना चाहिए? उसकी पूँछ काट देनी चाहिए या गले मे पट्टा डाल देना चाहिए।”

ज्यों ही जितेन सवाल सुनता है; उसका चेहरा तमतमा जाता है। जितेन चीख पड़ता है- “कुत्ता ! कुत्ता ! कुत्ता ! अब मै इसका जवाब नही दूँगा। अब तुम बताओ; कुत्ता कुत्ते की मौत क्यों मरता है? इंसान कुत्ते की औलाद कैसे हो सकती है? तुम इंसान के रूप में कुत्तेश्वर हो क्या? क्या तुम कुत्ते की तरह…..

दूसरी तरफ की आवाज जितेन की आवाज बीच मे ही काटकर और भारी आवाज में बोलती है- शाँत……

उसकी आवाज सुनकर जितेन अपने आप को संभालते हुए और अपने को सामान्य करते हुए बोलता है – ” भाई मैं हिंसा में विश्वास नही रखता, इसीलिए कुत्ते की पूंछ काटने की बजाए मैं उसको पट्टा पहनना चाहूंगा।” जवाब देने के बाद जितेन फिर से अपना संतुलन खोते हुए चीखकर बोला – ” हाँ भाई! खोल दिया मेरी किस्मत का ताला, बना दिया मुझे बादशाह। इन बेकार सवालो का कोई मतबल भी है?”

दूसरी तरफ से आवाज आई – आज तुमने कुत्ते के गले मे पट्टा पहनाया है। कल तुम्हारे गले मे भी पट्टा पहनाया जाएगा” जितेन जवाब सुनकर अवाक रह गया। इसके बाद टूँ टूँ करके फ़ोन कट गया।

मेज पर पड़ी डिजिटल घड़ी में सुबह के 10 बज रहे है। जितेन सोफे पर सो रहा है। खिड़की से छनकर आ रही सूरज की तेज धूप से जितेन पसीने से तर-बतर हो गया है। करवट बदलते ही वो धड़ाम से नीचे गिर पड़ता है। उसकी नींद टूट जाती है। वो आँखे मींचते हुए उठता है और अपने चारों तरफ देखता है। उसके दोनों पैरों में जूते हैं। फूलदान भी एकदम ठीक ठाक है। वो सिर पकड़ कर बैठ जाता है और बड़बड़ाता है- “आज फिर से वही बुरा सपना।” तभी मेज पर पड़े मोबाइल की घंटी फिर से बज उठती है।

मोबाइल पर बॉस का नंबर फ़्लैश हो रहा है। बॉस का नंबर देखते ही जितेन एकदम सतर्क हो जाता है। उसकी सारी निद्रा और आलस्य उड़न छू हो जाती है।जितेन फ़ोन उठाकर अपने बॉस का अभिवादन करता है। उधर से उसके बॉस का जवाब आता है – ” जितेन! तुम्हारे मेहनत और प्रगति (परफॉरमेंस) को देखते हुए मैनेजमेंट ने तुम्हे पट्टा पहनाने…. ओह सॉरी, प्रमोट करने का निर्णय लिया है।
जितेन स्तब्ध होकर शून्य में देखता रह जाता है।

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© Arvind Maurya

माना क्यूँ ।

कहा था मैंने मान लिया मेरी गलती है।

पर तूने क्यों मान लिया तेरी गलती है।

क्यों न जानना चाहा तूने क्या सच्ची है।

मैने तुझसे बात जो यो ही कह रखी है।

बिना ज्ञान के बात मानना दोष है तेरा।

बिना जाँच के राह पे चलना खोट है तेरा।

तू जो चाहे दिल से मुझको बक सकता है।

खोटा सिक्का, झूठा कुछ भी कह सकता है।

पर जो मान्यता थी तेरी तुझपर यों हावी।

वही पड़ी है आज तेरे जीवन पर भारी।

जिसने कहा जो मान लिया,

सत्य का न पहचान किया।

सीधी खोपड़ी होने पर भी,

बुद्धि का अपमान किया।

खुदकी गिरेबां नही झाँकत,

मुझपर उँगली तान दिया।

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© Arvind Maurya

काली और रंगीली ।

रंग बिरंगी पेंसिले, आज भी मुझको याद है।
सतरंगी नोंको की रंगाई, का हर किस्सा याद है।

कोरे कागज पर वो सुंदर, रंग-बिरंगे चित्र बनाती।
कोरे कागज को रंग थक कर, दीवारों पर हुनर दिखाती।

दीवारों पर ज्यादा घिसती, पर उसमें रोमांच थी पाती।
पाकर बड़ा कैनवस पेंसिल, लटके-झटके खूब दिखाती।

अपने लटको झटको से, रंगीली काली को चिढ़ाती।
देखके उनके लटके झटके, काली की पीड़ा बढ़ जाती।

देखभाल न होने पर, इधर उधर वो लुढ़क थी जाती
मानो जैसे नशे में धुत हो, लोट रहा हो कोई शराबी।गिर गिर कर अंदर ही अंदर, टूट-टूट कर बिखर थी जाती।

जब भी उसको गढ़ने जाता, नोंक लुढक कर बाहर आती।
मैं ये माजरा समझ न पाती, काली पर थी खूबझल्लाती।

छील छील कर छोटा करके, कुछ दिन में ही फेंक बहाती
बेचारी काली दुखिया पर, अनजाने में जुल्म मैं ढाती।

बार बार ऐसा होता था, हर काली के साथ।
टूट टूट कर बिखर वो जाती, रंगीली के साथ।

मुझको भी दुख होता था, देखके उनका हाल।
पर मैं भी कुछ कर ना पाती, हाथ पे रखे हाथ।

जब रंगीली ख़तम हो जाती, घिसकर पूरा साफ।
तब काली को वापस मिलती, अपनी पुरानी मान।

तब काली की नोंक हो जाती, जैसे तेज कटार।
एक बार गढ़ने पर करती, हफ्ते भर तक काम।

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© Arvind Maurya