वसुधा कुटुम्ब हो कैसे ?

ऐ सुनो इंसान

सुन लो हिंदुस्तान

ना जागो उस नींद से

जो हर ले तेरी प्रीत को

जो कर देती है भीड़ को

शैतान……. हैवान…….

हैवान……. शैतान…….

प्यास न वो बुझ पाएगी

जो नशे की लत लग जाएगी

वो भूख नही मिट पाएगी

जो जीभ को तेरे भाएगी

कोई प्यासा तड़पे जाएगा

कोई भूखा पेट दिखेगा

तू तो कुछ ना कर पाएगा

लड़-लड़ कर तू थक जाएगा

लड़-लड़ कर तू मर जाएगा

फिर बाद में खुब पछताएगा

खुब चीखेगा चिल्लाएगा

चिल्लाएगा……. पछताएगा…….

पछताएगा……. चिल्लाएगा…….

इस लालच को अब छोड़ दे तू

दस पीढ़ी की न सोच रे तू।

कल को जाने क्या क्या होगा

जीना होगा मरना होगा।

आज उगा और कल को खा

इतना ही धरती से ले सकता।

इससे ज्यादा जो चाहेगा

तू पाता है पा जाएगा

पर ज्यादा ना चल पाएगा।

इससे ना जाने कितनों को

भूखा तू करता जाएगा।

इक टुकड़ी रोटी की खातिर

भूखा नंगा खुब चीखेगा।

चिल्लाएगा……. पछताएगा…….

पछताएगा……. चिल्लाएगा…….

रोटी की खातिर जब भूखे

नंगे सड़क पे आएंगे।

तेरे हलक से उतरे भोजन

को भी खाना चाहेंगे।

चीर के उर का तृप्त करेंगे।

तेरे उर का लहू पिएँगे।

एक पल ना संकोच करेंगे।

कानूनों से नही छिपेंगे।

भगवानों से नही डरेंगे।

क्रम ये जो चलता जाएगा

तू चीखेगा चिल्लाएगा

चिल्लाएगा……. पछताएगा…….

पछताएगा……. चिल्लाएगा…….

जैसा रचता संसार है तू।

इससे रखता क्या आश है तू।

तू आज जो उसकी खाएगा।

कल को वो तेरी खाएगा।

वो रोकर आज चिल्लाएगा।

तू बिलख के कल पछताएगा।

कोहराम खड़ा हो जाएगा।

चिल्लाएगा……. पछताएगा…….

पछताएगा……. चिल्लाएगा…….

तेरी भूल भयंकर भारी

खुद को समझे बड़ा शिकारी

बुना जाल जो दूजे खातिर

खुद उसमे फँस जाएगा

कोई काम तेरे ना आएगा

तू चीखेगा चिल्लाएगा

चिल्लाएगा……. पछताएगा…….

पछताएगा…….. चिल्लाएगा…….

धर्म न मोक्ष दिलाएगा।

राज्य न शांति लाएगा।

कौन बताएगा मुझको कि

स्वर्ग राह कौन जाएगा।

राज्य बाँटता इंसा को तो

प्रेम कहाँ से आएगा।

प्रेम कहाँ से आएगा।

तू चीखेगा चिल्लाएगा

चिल्लाएगा……. पछताएगा…….

पछताएगा……. चिल्लाएगा…….

जो जो वर्ग बने है तेरे

लालच के है ये सब डेरे।

राज्य,धर्म और जाति-समाज

या हो कोई वंश विधान।

तोड़ दे इनको…. छोड़ दे इनको….

आ मिल बन जाए इंसान…

आ मिल बन जाए इंसान…

दूर नही वो दिन भी है

इस खातिर तू चिल्लाएगा

चिल्लाएगा……. पछताएगा……

पछताएगा……. चिल्लाएगा…….

चल तोड़ न अपनी बेड़ी तू

ना तोड़ धर्म और जाति-समाज।

बस थोड़ा दिल खोल-खालकर

उसमे भर थोड़ा सम्मान।

थोड़ा-थोड़ा उसमे से तू

प्यार की कर हल्की बौछार।

वो भी पिघलकर, तू भी पिघलकर

हम सब होंगे एक समान।

नव प्रेम बीज का अंकुर यह

जल्दी पौधा बन जाएगा।

अभिसिंचित होकर प्रेमभाव से

वृक्ष बड़ा बन जाएगा।

सौहार्द, स्नेह, समभावो के

नव पल्लव, पुष्प, फलों से लद

संतोष भाव दे जाएगा।

तब ही जाकर वसुधा कुटुम्ब का

सपना सच हो पाएगा।

सब जन के सुख उल्लास भरे

जीवन को राह दिखाएगी।

सब खुश होकर चिल्लाएंगे

चिल्ला चिल्ला कर नाचेंगे

चिल्ला चिल्ला कर गाएंगे।

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© Arvind Maurya

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किससे कहूँ , किसकी सुनूँ

किससे कहूँ वो बात,

जो मेरी जान लिए जाती है।

होता जो मेरे साथ,

वो किसकी कारस्तानी है।

जो भी हुआ जो होगा,

मेरा साथ कौन देगा।

मैं आश किससे रखूं,

जो हाथ थामे मेरा।

सब लोग ऐसे ठहरे,

मेरी बात नही समझे।

मैं उनको समझूँ पागल,

वे मुझको समझे पागल।

ये घोर घना कोहरा,

डाले पड़ा है पहरा।

चलता जिधर किधर भी,

गड्ढे में गिर हुँ पड़ता।

वे मुझको कहते अंधा,

मैं उनको कहता अंधा।

चल कर तो थोड़ा देखो,

जिस राह मैं हुँ चलता।

तब जान पाएगा तू,

मैं काना या तु अंधा

या छाया घना कोहरा,

सो रहा नही दिखता।

तू राह जो बताता

उसपर भी मैं हूँ चलता

ज्यों चार कदम बढ़ता

उसपर भी हूँ भटकता

राहो का एक झमेला

आगे है मेरे दिखता।

चढ़कर हूँ ऊँट चलता,

फिर भी है काटे कुत्ता।

छतरी भी जो लगाऊं,

फिर भी है धूप लगता।

मैं पैर जँहा रखता,

कांटा वही पे रहता।

किसको मैं ये बताऊँ,

किसे दास्तां सुनाऊँ।

जिससे भी मैं हुँ कहता,

वो हँस है मुझपे पड़ता।

कहते है तूने पाया

है भाग्य कुछ गज़ब का

मरता तो क्या न करता,

बस धैर्य थोड़ा धरता।

जो भी है राह दिखता,

तफ़्तीस थोड़ी करता

सच्चा हो और अच्छा

उसपर हुँ चल मैं पड़ता।

परिणाम चाहे जो हो

हँस कर हुँ ग्रहण करता

मरता तो क्या न करता

बस धैर्य थोड़ा धरता

बस धैर्य थोड़ा धरता

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© Arvind Maurya

दुलारी की दुविधा

थोड़ा सा संशय है

थोड़ा सा विस्मय है

थोड़ी उमंगे है

थोड़ी सी खुशियां है

थोड़े ही थोड़े से

भाव जाने कितने है

मन जाने कैसा है

मेरे ना बस का है

मारे हिलोरे है

खाता थपेड़े है

फिर भी ना रुकता है

बहका ही जाता है

याद जब भी आता है

निज घर को छोड़ कर

दूजे घर जाना है

मन थोड़ा अकुलाता है

मन थोड़ा घबराता है

मन थोड़ा झुँझलाता

ना जाने कैसे ये

ख्वाब ये दिखाता है

दुख के पहाड़ तले

खुशियों की छाया है

अभी तो मैं खेलती थीं

कूदती चहकती थी

अपनी चहचहाहट से

घर को खुश मैं करती थी

अभी मैं तो छोटी सी

प्यारी बच्ची थी

जाने कब अल्हड़

जवानी आ धमकी थी

देखने पर अब मैं

सयानी तो दिखती थी

पर अंदर अंतर से

अब भी मैं बच्ची थी

मैं जाने क्यों खुद अब

इतना सम्भलती थी

बिन सोचे समझे अब

कुछ भी न कहती थी।

बाहर से जितनी भी

सम्भली मैं दिखती थी

अंदर से उतनी ही

उलझी मैं रहती थी

माँ, बापू , भाई अब

मुझपर झल्लाते ना

प्यार भरी मीठी-सी

घुड़कियाँ पिलाते ना

अभी बहुत जल्दी ही

उनका मैं बोझ बनी

माथे पर सबके

सिकन का कारण बनी

अब जाने लोग मुझसे

ऐसे क्यों रूठ गए

मुझको विदा करने में

जी जाँ से जुट गए

ऐसा भी रूठना क्या

जिसमे न डाँट हो

ऐसा भी प्यार का

जिसमे न एहसास हो

अंदर ही अंदर से

इतना भूचाल था

ऊपर से बाहर ये

हुआ अजब हाल था

मन तो हुआ बावरा

कभी रोए कभी गा रहा

धड़कनो की बढ़ती घटती

गति का क्या माजरा

दिल है नही जानता

न मन ही बता पा रहा

तभी सनसनाहट सी

चढ़ती है तन पर

यकायक कौंधती है

बिजली सी मन पर

ये कैसा भ्रम अब तू

पालती दुलारी है

बीत गया बचपन अब

तू तो एक नारी है

दूजे घर तो जाना है

वहीं तेरा ठिकाना है

कैसे होंगे वे सब अब

सोच के क्या पाना है

अब तो वही भूमि तेरे

कर्म और भाग्य की

जीवन के रंगों की

मिलेगी सौगात वहीं

ठान ले और मान ले

मन को अब आराम दे

आँसुओ को पोंछ दे

मुट्ठियों को भींच के

तन में तूफान ले

भाग्य को उबारने

चल पड़ी दुलारी अब

कर्म से दहाड़ने

भाग्य को उबारने

भाग्य को सँवारने

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© Arvind Maurya

UPSC: सिविल सेवा में सीधी भर्ती पर कोहराम क्यों ?

प्रथमदृष्टया सरकार का यह कदम मुझे भी बहुत ही बुरा लगा कि ऐसा हो जाएगा वैसा हो जाएगा पर जब एक जिम्मेदार नागरिक के रूप में मैंने इसपर विचार करना शुरू किया तो वही कदम मुझे स्वागतयोग्य लगने लगा। आपमेंसे बहुत सारे लोग भी कही न कही इसी दुविधा में फंसे होंगे कि निगले या उगले अर्थात आलोचना कर या इसे स्वीकार कर ले। आइए इसी पहलू पर थोड़ी सार्थक चर्चा करने का प्रयास करते है।

वर्तमान में हम एक देश के रूप में अपने समकालीन देशो से कई मायनों में बहुत पिछड़े है चाहे वो आर्थिक,सामाजिक,तकनीकी या वैज्ञानिक हो बशर्ते हम अपना संदर्भ बिंदु पाकिस्तान को न माने। पिछले 70 सालों में कितनी ही सरकार आई और चली गई पर उनके वादे और मुद्दे आज भी वही के वही है। अशिक्षा,भूखमरी,गरीबी,कुपोषण, आदि। कुल मिला जुला कर एक सम्मानजनक जीवन स्तर के उपलब्धता की गारंटी। इसी पर सरकारें बनी-गिरी और फिर से बनी पर अच्छे दिन मुंगेरी लाल के हसीन सपनो की तरह ही रह है जो अब तक सच होने से रहा। जब हमें लगा अच्छे दिन लाना इस सरकार के बस की बात नही है तो सत्ता दूसरे के हाथ मे दे दी,फिर जब लगा इसके बस का नही है तो फिर से पहले वाले को बिठा दिया। नई सरकार पुराने सरकार के कामों की समीक्षा करती और उन गलतियों से बचना चाहती जो पिछली सरकार ने किए थे। लेकिन कोई न कोई कमी रह ही जाती और लक्ष्य पूरे नही हो पाते। सालो साल यह क्रम ऐसे ही चलता रहा, बीच मे कुछ ढांचागत परिवर्तन हुए जिससे उम्मीद की किरण दिखी लेकिन अंत मे नतीजा ढाक के तीन पात ही रहा और कोई भी सरकार उस दुखती रग को पकड़ नही पाई । कुछ ने पहचाना भी उसको ठीक करने की कोशिश भी की लेकिन इतना दर्द मिला कि फिर से उसको हाथ लगाने की हिम्मत नही पड़ी।

जब हम सरकार की बात करते है तो हमारे दिमाग मे भाजपा, कांग्रेस, एडीएमके, डीएमके, तृणमूल,लोजपा, माकपा, भाकपा, आदि के नाम ही आते है और हम भैया, दीदी, मोदी, अम्मा, राहुल, आदि के नाप पर आकर सिमट जाते है। वर्तमान में स्थिति तो और भी हास्यास्पद है क्योंकि लोगो ने सरकार के नाम को संकुचित करके केवल मोदी रख दिया है। चाहे शिक्षित हो या अशिक्षित, अमीर हो या गरीब, किसी के भी जीवन मे कहीं भी, कभी भी, कोई भी, परेशानी आ जाए उसका जिम्मेदार सिर्फ और सिर्फ एक इंसान नरेंद्र मोदी है। लेकिन शिक्षित लोगो को तो इस बात की जानकारी होनी ही चाहिए कि सरकार मोदी के अलावा भी और बहुत से लोगो से मिलकर बनती है। मोदी खुद कोई भी बदलाव नही ला सकते बल्कि वो बदलाव की पहल करते है या फिर यू कहे कि वो बदलाव से होने वाले प्रभावो की जिम्मेदारी लेते है। सरकार में मोदी जी का उतनी ही जिम्मेदारी है जितनी रिजर्व बैंक द्वारा जारी किए गए नोटो पर हस्ताक्षर करने पर गवर्नर की होती है। दोनो ही विश्वास पर चलते है।

सरकार का एक बहुत बड़ा हिस्सा नौकरशाही के रूप में विधयिका के मुखौटे के पीछे छिपा रहता है, जिसे न ही सीधे तौर पर किसी कार्य का श्रेय दिया जाता है और ना ही सीधे तौर पर उन्हें दोषी ठहराया जाता है लेकिन हर एक परिवर्तन में चाहे उसका प्रभाव कैसा भी हो , में वे सीधे तौर पर भाग लेते है अर्थात परिवर्तन के असली वाहक नौकरशाह ही होते है।

इसतरह एक बात गौर करने वाली है कि जनता सरकारी ढाँचे के केवल एक छोटे से हिस्से ‘विधयिका’ को अदलती बदलती रहती है जिसका जमीनी बदलाव से सीधा संबंध नही है और एक बड़े परिवर्तन की आशा रखती है। जबकि दूसरी तरफ सरकार का एक बहुत बड़ा हिस्सा जिसका जमीनी परिवर्तन में बहुत बड़ा हाथ होता है, नौकरशाही के रूप में जनता की ओर लगभग दायित्वहीन सा है। मतलब पूरी उल्टी गंगा बह रही है। जिसका दायित्व जन कार्यो को सीधे तौर कार्यांवित करना है उसकी जनता की तरफ कोई जवाबदेही ही नही है। माने की काम कॉन्ट्रैक्ट की तर्ज पर हो रहा है जहाँ पर आप अपने यहाँ काम पर आए मजदूर को सीधे नही बोल सकते बल्कि आपको उसकी शिकायत कांट्रेक्टर के पास करनी होगी।

इस तरह जवाबदेही के अभाव में नौकरशाही में शिथिलता और लालफीताशाही जैसी कमियां खुद ब खुद आ जाती है, जोकि अन्तोगत्वा विकास की गति को प्रभावित करता है। अभी पिछले 4 सालो से जो भी ढाँचागत परिवर्तन हो रहे है वो ठीक उसी तरह है जैसे हम हर 5 साल में करते है लेकिन ये परिवर्तन उससे काफी ज्यादा स्थायी और प्रभावशाली है जिसका असर हाल फिलहाल में तो हम देख नहीं पा रहे है लेकिन भविष्य में इसका बहुत सकारात्मक असर होगा। संक्रमण काल मे चीजे एक तरह से प्रायोगिक दौर से गुजरती है जो थोड़ी कष्टकर होती है लेकिन ये कष्ट धीरे धीरे जाता रहता है। जीएसटी से लेकर आईटी जितने भी परिवर्तन हुए और हो रहे है ये एक नए भारत की तस्वीर गढ़ रहे है। पिछले 4 साल से हर उस दुखती नब्ज की जांच-पड़ताल और इलाज पर बराबर ध्यान दिया गया है जिसको छेड़ना पिछली सरकार अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारना समझती थी।

सिविल सेवा में सीधी भर्ती का निर्णय उसी जांच-पड़ताल और इलाज की एक कड़ी है जो देश की बीमारी दूर करने के लिए पिछले 4 साल से चल रहा है। इसको भाजपा का अपने कार्यकाल के अंतिम वर्ष में लाने का भी एक महत्वपूर्ण कारण है, क्योकि आईएएस लॉबी अगर विरोध और असहयोग पर आमादा हो जाए तो भी सरकार के कार्यक्रमों को ज्यादा प्रभावित न कर पाए। आईएएस लॉबी द्वारा इसका विरोध करने का सीधा सा कारण है कि अब उनके कार्यक्षमता और कार्यकुशलता की तुलना सीधी भर्ती हुए दक्ष प्राइवेट सेक्टर के कर्मियों से होगी जोकि निसंदेह ज्यादा मेहनती होते है। उनसे पटखनी खाने से अच्छा अपनी इज्जत और मौको को बरकरार रखने के लिए आलोचना करना उनके लिए ज्यादा हितकर है। इसीलिए किसी के ऊलजलूल बातो में न आए।

अगर आप इसे अभी तक पॉलिटिकली मोटिवेटेड मान रहे है तो मैं इसी बात को थोड़ी दूसरी तरह से समझाने का प्रयत्न करूँगा।

लोग हमेशा सरकार को कोसते रहते है कि सरकार काम नही कर रही है। देश विकास नही कर रहा है। हमे नौकरी नही मिल रही है। लेकिन जब एक प्रगतिशील सरकार कोई प्रगतिशील कदम उठाती है तो बहुत सारे लोग आदतन उसकी निंदा करना शुरू कर देते है। हम इसे आया गया मानकर गाहे बगाहे निंदा करते रहते है। लेकिन हमें ध्यान रखना चाहिए कि बेवजह की गई निंदा से सरकार का मनोबल थोड़ा टूटता है,जिसका दूरगामी दुष्परिणाम अन्तोगत्वा जनता को ही भुगतना पड़ता है,क्योकि भविष्य में सरकारे इनसे सबक लेकर लंबे समय तक कोई कोई प्रगतिशील कदम उठाने से बचती है और जब कुछ करने को खास नही होता तो अच्छे अच्छे घोटाले करती है। कुछ समय बाद जब जनता की नींद खुलती है तो वे उन अधिकारों के लिये आंदोलन करते है जो उन्हें स्वाभाविक रूप से प्राप्त हो सकती थी।
इसीलिए क्यों कुछ बचे खुचे अच्छे इंसानो को बदनाम करके उनके मनोबल और कार्यक्षमता को नकारात्मक रूप से प्रभावित करे।
जहाँ तक बात इस भर्ती की है तो मैं आपलोगो को एक सामान्य समझ की छोटी सी बात बताना चाहता हूँ। आप लोग ही बताइए की अगर जानवरो का डॉक्टर इंसानो का इलाज करे तो क्या होगा । खैर इसमे भी कुछ गनीमत है कि उसके नाम के आगे डॉक्टर लगा हुआ है। लेकिन अगर दर्जी शाल्य चिकित्सा करने लगे तो क्या होगा। यहाँ पर एक बात ध्यान दीजिएगा की विशिष्ट योग्यता रखने वाले लोगो को भी अगर उनके विशिष्टतम क्षेत्र से इतर अदल बदल कर काम दिया जाएग तो परिणाम सिफर ही आएगा।
ठीक उसी तरह अब तक प्रशासनिक सेवा में बेमेल पदों और उनके प्रभारियों की एक लंबी फेहरिस्त है जैसे कि चिकित्सा क्षेत्र के विशेषज्ञ को सूचना एवं संचार का सचिव बना दिया गया, अर्थशास्त्र के विशेषज्ञ को उड्डयन का प्रभार दे दिया गया। इस वास्तव में होता आया है और ये सूची काफी लंबी जाती है।
अब आप ही बताइए इन परिस्थियों में योजनाओं-परियोजनाओं की गुणवत्ता कैसी होगी। जब ऊपर से ही पकड़ ढीली होगी तब बीच मे लालफीताशाही होगी ही और 4 साल की परियोजना को पूरा होने में 14 साल लगेंगे। इससे संसाधन,समय और धन की बर्बादी ही होगी।
हमारी परियोजनाओं को पूरा होने में इतना लंबा समय क्यों लगता है क्या आपने कभी सोचा है। मैं बताता हूँ। क्योकि परियोजनों में परियोजना कार्य अर्थात सर्वेक्षण,निरीक्षण,उपलब्धता,आदि का गलत अनुमान लग जाता है जोकि निःसंदेह अनुभवहीनता और अनुशासनशीलता की कमी की वजह से होता है।
मैं ऐसा बिल्कुल नही कहता कि देश मे अब तक कुछ भी नही हुआ हमने कोई विकास नही किया लेकिन यह बात भी तो उतनी ही सही है कि हमने बहुत कुछ भी तो नही किया है। इसीलिए अगर हम उसी 70* साल पुराने ढर्रे पर चलकर विकास की आशा रखते है तो मुझे लगता है कि ये खुद के साथ धोखा देने वाली बात हुई। इसीलिये अच्छे बदलाव के लिए कुछ कदम उठाने ही पड़ेंगे और किसी न किसी को ये काम तो करना ही पड़ेगा। क्योंकि विकास तो 70 साल पुरानी परिपाटी पर चल कर पाया नही जा सकता अगर ऐसा होना ही होता तो आज किसी बात का रोना ही नही होता।
आखिर में इतना ही कहूंगा , “बोलने वाले से ज्यादा होशियार* सुनने वाला होना चाहिए और काम करने से ज्यादा होशियार काम कराने वाले को होना चाहिए।” हम भारत देश के लोग काम काम कराने वाले और सरकार काम करने वाली है। इसीलिए ईमानदार सरकार के काम को हमेशा रोकना टोकन मतलब अपने विकास को रोकना टोकना है।
धन्यवाद

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© Arvind Maurya

थोड़ा कम खाएंगे,थोड़ा गम खाएंगे।

तु जो कुछ बोल देती तो

दिल जो खोल देती तो

तो मैं जान ये पाता

मुझसे हुई क्या ख़ता।

दिल को ऐसे ना जला

मुझको ऐसे ना सता

कुछ तो बोल के तू जा

कुछ भी बोल के तू जा।

मैं तो सच हूँ बोलता

तूने कसम है जो दी।

मैं तो कसम भी न दूँ

तूने कसम है ये दी।

तूने आँख जो घूरी

दिल पर चल गई छूरी।

तेरे हाथ की थपकी से

हिल गई मेरी धरती।

तेरा नथुनों को फुलाना

मेरी साँस चढ़ाता।

तेरा यो तमतमा जाना

मेरी देह जलाता।

तू जो लट को उमेठे

तो मेरी कमर है चटके।

तूने जो दाँत है पीसा

तो करम मेरा है फूटा।

थोड़ा सा ओठ तो हिला

जरा सी जीभ लपलपा

खुल कर बात तो बता

मुझको ऐसे न उलझा।

कहीं वो बात तो नही

तूने दिल मे है धरी

जिसको हल्के-फुल्के में

मैंने कही थी कभी।

कहीं मेरा देर से आना

बिन बतलाए ही जाना

कहीं लगता हो ना गलत

कोई पालो न तुम भरम।

क्या मैं तुमको बताता

दौड़े कहाँ हूँ जाता।

मेरा काम है ऐसा

खच्चर गधे के जैसा।

जब भी बॉस बुलाता

दौड़े दौड़े हूँ जाता।

मुझको काम है बड़े

धैर्य जाया न धरे।

ज़ाया समय न करो

मुझको अलविदा कहो।

थोड़ी मुस्कान को धरे

भाव तंज से भरे

भंग मौन था किया

कहा अरे! अरे! अरे!

तुम तो आदमी बड़े

कितने काम है पड़े

तुम बिन सूर्य न चले

तुम बिन वायु न बहे

तुम ही सूर्य जगाते

तुम ही रात हो लाते

तुमसे चाँद है रौशन

खिलाते कलियों से चमन

तुमसे पवन की गति

नदियाँ कल कल बहती

रूप ऐसा देखकर

दाँत थोड़ा फाड़कर

पति बोला जी नही

ऐसा कुछ भी नही

उसकी बात काटकर

फिरसे गई वो बिफर

कोई हस्ती नही

फिर भी फुर्सत नही।

क्या किया है जी आज

क्या करोगे जी कल

कल भी थे जी यहीं

कल भी होंगे इधर

कहीं जाना नही

फिर क्यों इतनी ऊधम

माँ की कोख से निकल

लेना भूमि में शरण।

सबका जीवन यही

इतनी गाथा रही

शुरू जीवन यहीं

और खतम भी यही।

पल जो कुछ है मिले

इसके बीच के बचे

आओ इसको जिए

थोड़ी राहत लिए।

ना हो ज्यादा की चाह

ना हो दूजो से द्वेष

कर्म इतना करे

कि हम दान दे सके

लोभ-लालच के जाल में

हम क्यों फँसे।

काम ऐसा भी क्या

जिसमे फुर्सत न हो

चिपके ऐसे रहे

जैसे जीवन ये हो

छोड़ दो जी वो काम

जिसमे है ना आराम

जिसमे चैन है नही

चिंता घर कर गई।

थोड़ा कम खाएंगे

थोड़ा गम खाएंगे

थोड़ा कम पहनेंगे

थोड़ा कम चमकेंगे

थोड़े साधन में भी

जीवन जी जाएंगे

लेकिन साथ ये अपना

कभी ना छोड़ेंगे।

लेकिन प्यार ये अपना

कम ना होने देंगे।

तुमसे बात थी इतनी

मुझको कहनी प्रिये

मुझे ना है शिकवा

ना है कोई गीले।

आँखों मे दोनो के

पानी भर था गया

दिल से की थी जो बात

दिल को था उतर गया।

दिल को दिल से मिला

था आलिंगन किया

धड़कने थी मिली

मन भी था मिल गया।

अब ना शिकवा रहा

ना ही कोई गिला

दिल से दिल मिल गए

मन से मन मिल गया।

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© Arvind Maurya

कैसे हो- वो बच्चा- हम जैसा-

किसी मनुष्य का जन्म उसकी जननी और उसके परिजनों के जीवन के सबसे बड़े दिनों में से एक होता हैं। सामाजिक और आर्थिक कारणों तथा प्रथाओं के मद्देनजर, बालिका अथवा बालक पैदा होने की स्थिति में खुशी का स्तर अलग अलग होता है। शिशु के जन्म के समय की खुशी और खुशी को मनाने के के स्तर से ही उसके भविष्य के बारे में काफी कुछ अनुमान लगाया जा सकता है। ज्यादा दूर के भविष्य को तो नही पर निकट भविष्य को काफी हद तक अनुमानित किया जा सकता है। किसी के दूर के भविष्य पर भी उसके प्रारंभिक जीवन का असर काफी गहरा होता है इसीलिए ये कहा जा सकता है कि उत्तरवर्ती जीवन काल को भी कुछ हद अनुमानित किया जा सकता है।

यहाँ पर यह बात ध्यान दिलाने योग्य है कि जीवन से मतलब उसके आर्थिक पहलू से कम और सामाजिक पहलू से ज्यादा है और उससे भी महत्वपूर्ण उसके व्यक्तिगत व्यक्तित्व और नैतिक पहलू से है।

शिशु के जन्म से 1 वर्ष तक उसके लालन पालन का बड़ी सतर्कता और लगन के साथ ध्यान दिया जाता है। इस दौरान परिवार के कुछ वयस्को की बाल सुलभ प्रवृतियां पुनः उद्दीप्त हो जाती है और कई लोगों का तोतलापन शिशु की वाक् चेस्टा को भी पीछे छोड़ देता है। इसके साथ साथ बालक के अति सामान्य बोध को विकसित करने का प्रयास भी शुरू हो जाता है, जोकि समाजीकरण से पूर्व की प्रक्रिया होती है, जिसे परिवारीकरण कहना गलत नही होगा। शिशु को इस प्रक्रिया का बोध चेतन रूप से शून्य होता है पर अचेतन रूप में वो बहुत कुछ ग्रहण कर रहा होता है। इस समय शिशु जो कुछ भी ग्रहण कर रहा होता है वो उसके जीवन के उत्तर काल के निर्णय निर्धारण को निर्धारित करते है क्योंकि इसी समय शिशु को अचेतन रूप से बोध होना प्रारम्भ हो जाता है कि उसे क्या करना चाहिए और क्या नहीं।

निर्णय निर्धारण ऐसी प्रक्रिया है जिसमे एक व्यक्ति प्रस्तुत परिस्थिति में दिए गए या उपलब्ध विकल्पों में से सबसे उत्तम का चुनाव करने का प्रयास करता है। निर्णय निर्धारण मूल रूप से अचेतन मस्तिष्क की जिम्मेदारी होती है, जिसमे व्यक्ति एक वरीयता क्रम में कम जरूरी तथा ज्यादा जरूरी विकल्पों को स्थान देता है। एक व्यक्ति के लिए क्या जरूरी और क्या गैरजरूरी है ये इस बात पर निर्भर करता है कि किस तरह से उसका लालन पालन और समाजीकरण हुआ है और किन किन चीजों को उसके समाज और परिवार ने उसके लिए नाजिर के रूप में प्रस्तुत करते हुए महत्वपूर्ण बताया। इस तरह शैशवास्था से किशोरावस्था तक आते उनकी अपनी खुद की एक पूर्णरूपेण स्वतंत्र निर्णय निर्धारण प्रणाली विकसित हो जाती है।

1 वर्ष के पश्चात शिशु का सामना धीरे-धीरे कुछ नई-नई और ज्यादा वृहद परिस्थितियों से होता है। अब शिशु को चतुष्पदी से द्विपदी करने का अभ्यास प्रारम्भ हो जाता है। इस अभ्यास के दौरान कुछ द्विपदी स्वयं चतुष्पदी बन जाते है। यह समय परिवार के बड़े बुजर्गो के लिए बड़ा ही रोचक होता है। नवजीवन का चीजो को देखने, सुनने, बोलने, समझने, की उत्सुकता उसकी बड़ी-बड़ी आँखों मे झलकता है, जिसे देखकर सभी अपने-अपने थोथे ज्ञान से नवजीवन को अभिसिंचित करने को उत्सुक हो जाते है। इस तरह शिशु का सामना जीवन के पहले शारीरिक और मानसिक अभ्यास से होता हैं जोकि अब जीवनपर्यन्त चलने ही वाला है।

1 वर्ष से 4-5 वर्ष तक सुनने, बोलने, चलने, समझने का अभ्यास कराया जाता है पर इस अभ्यास की कठोरता समय के साथ साथ तीव्र होती जाती है। माता पिता को लगता है कि जीवन संघर्ष में आगे बढ़ने के लिए एक शिशु को अपने समकक्ष से आगे रहना चाहिए। इस जीवन संघर्ष की दौड़ को जीतने और जिताने का इच्छा ही इस अभ्यास की तीव्रता और कठोरता को निर्धारित करती है।

बालक को कहा पता होता है कि वो फर्राटा नही मैराथन दौड़ में भाग ले रहा है जिसका कोई अंत नही है। काफी लंबे समय तक बालक को इस भ्रम में रखा जाता है कि आगे दिखने वाली रेखा को पार करते ही दौड़ समाप्त हो जाएगी और अगर दम बांध कर दौड़ गए तो जीत तुम्हारे कदमो में होगी। पर जैसे ही वो सामने वाली रेखा को पर करता है तो उसे बताया जाता है कि ये नही इसके आगे वाली रेखा, विजय रेखा है। उस रेखा को पार करते ही एक नई रेखा को विजय रेखा बताया जाता है और इस तरह से इस भ्रम का क्रम काफी लंबा चलता है। कुछ समय बाद उसे पता चल जाता है कि इस दौड़ का कोई अंत नही, न ही इसकी कोई विजय रेखा है। लेकिन ये भ्रम उसके अंदर वहम का रूप ले चुका होता है इसलिए वो दौड़ता ही रहता है कि शायद अगली रेखा विजय रेखा हो जहाँ पर उसके इस जीवन को पूर्ण विश्राम मिले। पर हम सबको पता है कि उसका विश्राम स्थल उसकी शव शैय्या ही है जिसकी तरफ वो अंधाधुंध दौड़ा जा रहा है। भ्रम को एकबारगी तथ्यों की सहायता से तोड़ा जा सकता है पर वहम को तोड़ने के लिए कोई भी तर्क और तथ्य नाकाफी है।

4 या 5 वर्ष का होने के बाद बालक अथवा बालिका की औपचारिक शिक्षा प्रारम्भ होती है; जोकि किसी विद्यालय में नामांकन कराके किया जाता है। अन्य बालको और शिक्षकों की सोहबत में अब बालक का समाजीकरण एक चरणबद्ध तरीके से प्रारंभ हो जाता है। नए नए हमजोली बनने का क्रम शुरू होता है, जिनका अचार-विचार-वय-व्यवहार-उत्साह-ललक-समझ काफी मिलती जुलती है। इन सब के बीच विद्यालय में बालक अपनी तारतम्यता एवं समन्वय का अभ्यास उन परिस्थितियों में करना सीखता है जहाँ पर उसकी इच्छा-अनिच्छा को दरकिनार कर सभी पर एक समान नियम लागू होते है। इस तरह अलग अलग परिवारों और अलग अलग पारिवारिक माहौल से आए बच्चे आपस से विचार-व्यवहार का आदान-प्रदान करके अपने अपने विशिष्ट व्यक्तित्व के शिल्पकार खुद बनने लगते है। ये प्रक्रिया 4/5 से 12/14 वर्ष की उम्र तक चलती रहती है और जैसे जैसे किशोरावस्था बच्चे के जीवन मे दस्तक देना शुरू करती है वैसे वैसे उसके अंदर ही अंदर पक रहा व्यक्तित्व भी बाहर आने के लिए दस्तक देना शुरू कर देता है।

12-18 वर्ष के बीच का समय बालक के उस नव उन्मादी व्यक्तित्व का होता है जिसका विकास 5-12 वर्ष के बीच होता है। इस दौरान वो अपने अलग विचारो और मान्यताओं को बिना किसी लाग-लपेट के व्यक्त करना शुरू कर देता है। माता पिता को लगता है कि बालक का ये व्यवहारिक परिवर्तन यकायक हुए जैविक परिवर्तनों के कारण हुआ है, परंतु वास्तविकता तो कुछ और होती है। इसलिए माता पिता लगता है कि बच्चो में उत्पन्न इन नई विद्रोही प्रवृतियों का दमन जितनी जल्दी कर दिया जाए उतना ही अच्छा है। इस क्रम में माता पिता कठोरता से पेश आना शुरू कर देते है औए जाने अनजाने में अपने ही बच्चो के दुश्मन बन जाते है। ऐसी स्थिति का सामना उन माता पिता को करना पड़ता है जो शुरू में तो अपने बच्चो की बाल प्रवृतियों का निरक्षण कर उनको समन्वयित और मार्गदर्शित नही करते है। माता पिता अपने बच्चो का पालन पोषण किस तरह करते है, इसका सीधा संबंध उनके खुद के पालन पोषण से होता है। दूसरे तरह के माता पिता जो शुरू से ही अपने बच्चो में नैतिकता का पुट भरते रहते है और सही गलत में भेद करने की शिक्षा देते रहते है, उन्हें इस दौरान ज्यादा चिंतित नही होना पड़ता है।

अब तक माता पिता ने बच्चो के साथ क्या किया, कैसे किया, इन सब बातों से चिंतित होने का कोई फायदा तो नही है। इसीलिए अब इन सब से इतर माता पिता कोे बहुत ही सावधानी से बच्चो की मनोस्थिति और व्यहवार पर बारीकी से निरीक्षण कर उनको सही और गलत में अंतर करने की क्षमता विकसित करने में मार्गदर्शन करें। इस करने पर निःसंदेह काफी सुधार की गुंजाइश रहेगी और कुछ समय पश्चात वो खुद से ही सही और गलत में भेद करना सीख जाएगा और ज़रूरी और गैरज़रूरी चीजो को प्राथमिकता के आधार पर महत्व देना शुरू कर देगा जोकि दोनो के लिए अच्छा ही होगा।

18 वर्ष के पश्चात तो घड़ा पक कर रंगा जा चुका होता है। अब इसने जो रूप,रंग,आकर धारण कर लिया होता है, उसमे ज्यादा फेरबदल की गुंजाइस नही होती है। अब इसपर ही कई अलग अलग तरह के डिज़ाइन बनाए जा सकते है। इसी तरह युवावस्था तक आते आते बच्चो में मूलभूत व्यवहारिक और नैतिक गुण ठोस रूप लेकर काफी हद तक स्थिर हो जाते है अर्थात उनके व्यक्तित्व का अभिन्न अंग हो जाते है, जिसमे ज्यादा फेरबदल की गुंजाइश नही होती है।

आज एक समाज के रूप में हम उन्नत हो रहे है। उन्नति का अर्थ है सकारात्मक बदलाव जो जीवन को उच्च से उच्चतर की ओर उन्मुख करे पर हम अपने बच्चो को अगर उन्ही पुराने ढर्रे पर चलने के लिए मजबूर करेंगे तो ये एक तनातनी बनकर रह जाएगी जिसमें किसी का लाभ नही होगा। इसका मतलब ये कतई नही है कि अपने बच्चो को मनमानी करने दे बल्कि हमे चाहिए कि बच्चो को जीवन का ज्ञान दे और हम ऐसा तभी कर पाएंगे जब हम खुद जीवन के नैसर्गिक रूप को समझेंगे, जोकि सभी के लिए सर्वोत्तम होगा। बच्चे पालना कोई एक दिन का खेल नही है बल्कि एक माता पिता को एक अच्छा बच्चा समाज को देने के लिए पूरी तन्मयता से अपने जीवन के कम से कम 18 साल कुर्बान करने के लिए तैयार रहना होगा।

किसी त्रुटि के लिए क्षमा करें।

धन्यवाद।

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© Arvind Maurya

ये सृजन कहीं विध्वंस न हो।

कुछ मानवीय गुणो को सास्वत मानकर जिनके कारण कुछ विशेष नैतिक आचरणों का पालन संभव नहीं था; उसके लिए कुछ परम्पराए और मान्यताए बनाई गई, जिससे कि सामाजिक और प्राकृतिक व्यस्थाओं का संचालन नैसर्गिक रूप से बिना किसी टकराव के संपन्न हो सकें।ये मान्यताएं एवं परम्पराए समाज के कोप से इंसान को और इंसान के लोभ से प्रकृति को बचाने के लिए स्थापित की गई थी। इन पम्पराओ और मान्यताओं को आधुनिक लोग रूढ़िवादी मानते है। इन तथाकथित आधुनिक लोगो का पुरानी परम्पराओ तथा मान्यताओं को रूढ़िवादी कहना, स्वयं में एक रूढ़िवादी मान्यता है जो बिना किसी तार्किक और प्रामाणिक आधार के गढ़ी गई है ।

आज का आधुनिक मानव जो अपने आप को सबसे बुद्धिमान और श्रेष्ठ मानता है, नें वास्तव में अबतक के इतिहास में पृथ्वी का सबसे ज्यादा नुकसान किया है। इससे पूर्व किसी भी जीवन-धारी ने भी पृथ्वी को इतने संकट में नहीं डाला था जितना कि इस तथाकथित आधुनिक मानव ने डाला है।

हम इंसान धरती पर पनपे सभी तरह के जीवन मे अपने आप को श्रेष्ठ मानते है, क्योंकि हमारा ही सिर ऊर्ध्वाधर हो पाया है। हम सोच सकते है। हम सही-गलत में अंतर कर पाते है। हम सभ्य और सामाजिक है। हम व्यस्थित-सुरक्षित घरो में रहते है, जहाँ p की सुरक्षा और गरिमा को बनाए रखने के लिए सभी साधन उपलब्ध होते है। हमारे बनाए सामाजिक ढांचे में सभी वर्गानुसार जीवन-संघर्ष में भाग लेकर अपने पुरुषार्थ से जीवन को एक ऊँचा स्थान प्रदान करते है। लेकिन विडम्बना ये है कि इतना सब कुछ होने के बावजूद एक बहुत बड़ा वर्ग अभी भी जीवन के मूलभूत साधन नही जुटा पा रहा है। ऐसा नही है कि उसमें पुरुषार्थ नहीं है बल्कि वो वर्ग ही मूलभूत जीवन के साधनों को तैयार करने में सबसे ज्यादा मेहनत करता है। फिर भी उसको अत्यंत दयनीय अवस्था में जीवनयापन करना होता है। ऐसा होने के दो कारण है; पहला, कुछ बहुत ही कम लोगो का संसाधनों के एक बड़े भाग पर अधिक अधिकार; दूसरा, जनसंख्या और उपलब्ध संसाधनों के अनुपात में भारी अंतर का होना है। इन सब के बीच दूसरे जीव-जंतुओं की क्या दशा हो सकती है, ये बताने की ज़रूरत नही है।

दूसरी तरफ सुख, सन्तुष्टि, साख, सम्मान के नए नए प्रतिमान गढ़े जा रहे हैं, जिन्हें बहुत लुभावने तरीको से प्रस्तुत किया जा रहा है। इन आभासी प्रतिमानों को जीवन का मूल लक्ष्य मानकर, इन्हें पाने के लि पूरा जी जान लगा देता है। जब इन प्रतिमानों के अनुरूप अपनी जीवन शैली को बनाने की दौड़ शुरू होती है, तो एक बहुत बड़ी आकस्मिक माँग उठती है, जिसकी पूर्ति प्राकृतिक चक्र को बनाए रखकर नही की जा सकती है। तब जाकर नए-नए तरीकों को अपनाकर इस आकस्मिक अप्राकृतिक माँग को पूरी करने की कोशिश की जाती है।इस बढ़ी हुई माँग की पूर्ति के लिए जो नए-नए तरीके ईजाद किए और अपनाए जाते है, उन्हें मानव दम्भ से फूलकर सृजन की संज्ञा देता है। ये साधन बढ़ी हुई माँग को कुछ ही समय तक पूरा कर पाते है, क्योंकि मनुष्य के ज़रूरत की एक सीमा होती है जिन्हे पूरा किया जा सकता है। लेकिन लालच की कोई सीमा नही होती जिसकी पूर्ति असंभव है।

इस तरह लोभ लालच पर आधारित ये प्रतिमान पूरी मानवता को एक भयंकर दुष्चक्र में गूँथते जाते है जोकि धरती पर जीवन के लिए एक बहुत ही बड़ा खतरा लेकर आ रहा है।

आधुनिक मानव जाति आज जिस बात की सबसे ज्यादा डींगे हाँकती है, वो उसके सृजन की क्षमता ही है। पर इस सृजन ने जीवन को इतना दुष्कर और जटिल बना दिया है कि व्यक्ति अपनी नैसर्गिकता को त्यागकर कई प्रकार की छद्म और आभासी अभिलाषाओं की पूर्ति के लिए जहाँ-तहाँ भटक रहा है। अभिलाषाओं की पूर्ति के लिए भटकाव की जो चरणबद्ध प्रक्रिया शुरू होती है, वही जीवन की सभी अव्यस्थाओं की जन्मदात्री और प्रकृति की प्रनहंता हैं। इस अव्यस्था की चरणबद्ध प्रक्रिया बहुत पहले शुरू हो गई थी; लेकिन अब जाकर यह स्पष्ट रूप से दिख रही है क्योकि यह तथाकथित सृजन का चक्र बिना किसी रुकावट के एक लंबे समय से अत्यंत तीव्रता से घूम रहा है और इस सृजन चक्र के दुष्प्रभावों को मापने के साधन भी उपलब्ध हैं।

इस मानव कृत सृजन-चक्र ने प्राकृतिक सृजन-चक्र को रोककर अपने कब्जे में लेने का जो दुस्साहस किया है; प्रकृति समय-समय पर उसका प्रतिकार करती रहती है, लेकिन अब तक इसपर मनुष्य की पकड़ ठीक ठाक रही हैं, इसीलिए ज्यादा नुकसान नहीं उठाना पड़ा है। लेकिन प्रकृति के धैर्य को जिस तरह से इंसान लगातार चुनौती दे रहा है, उससे प्रतीत होता है कि प्रकृति के सब्र के बाँध को टूटने में ज्यादा वक़्त नहीं लगेगा, जोकि मानवता के लिए किसी महानाशकारी महाप्रलय से कम नही होगा।

इसीलिए किसी भावी संकट को टालने के लिए मनुष्य को मानवीकृत सृजन के चक्र की गति को नियंत्रित करके प्राकृतिक सृजन चक्र को गतिमान करना ही होगा। हर बीतते पल के साथ इस दुष्चक्र को रोक पाना मुश्किल होगा, इसीलिए पूरे विश्व समुदाय को इस पर त्वरित एवं प्रभावी कार्यवाही अत्यावश्यक है।

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© Arvind Maurya